योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1621, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें=८१८= ☸ योगवाशिष्ठ ☸
जगत् न हुआ है और न आगे होगा, केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है। वह अद्वैत है, और उसी का सब आभास है। जो आभास को सत्य जानते हो तो स्मृति को भी सत्य जानो। और जो आभास को असत्य जानते हो, तो स्मृति को भी असत्य जानो। जैसे स्वप्न में सृष्टि का आभास होता है। और उसमें अनुभव और स्मृति होती है, पर जागने से सृष्टि के अनुभव और स्मृति का अभाव हो जाता है, वैसे ही अद्वैत परमात्मसत्ता के जाग्रत् में अनुभव और स्मृति का अभाव है। उसमें जगत् कुछ बना नहीं। जैसे कोई पुरुष मरुस्थल में भ्रम से नदी देखता है, और उसे सत्य जानकर उसकी स्मृति करता है, पर वह नदी तो कुछ नहीं है। जब नदी ही असत्य है तो उसकी स्मृति कैसे सत्य हो, वैसे ही अज्ञानी के निश्चय में जो जगत् भासित हुआ है, वह जगत् ही जब असत्य है तो उसकी स्मृति और अनुभव कैसे हो? ज्ञानवान् के निश्चय में ऐसे ही भासित होता है।
हे राम! स्मृति पदार्थ की होती है। पर पदार्थ कोई नहीं, सब ब्रह्म ही अपने आप में स्थित है। और जैसा-जैसा उनमें फुरना होता है, वैसे ही होकर वे भासित होते हैं। परन्तु और कुछ वस्तु नहीं। जैसे वायु चलता भी है और ठहरता भी है, पर चलने और ठहरने में वायु को कुछ भेद नहीं, वैसे ही ज्ञानवान् को जगत् के फुरने या न फुरने में ब्रह्मसत्ता अभेद भासती है और कारण-कार्य नहीं भासित होता है। जैसे पत्ते, टहनी, फूल और फल, सब वृक्ष के अंग हैं, वैसे ही जगत् आत्मा के अंग हैं। आत्मा में प्रकट होते हैं और फिर आत्मा में ही लीन भी हो जाते हैं। भिन्न कुछ नहीं। जब चित्त में स्वभाव जगता है, तब जगत् होकर भासित होता है। कुछ आरम्भ और परिणाम से नहीं होता—आभासमात्र है।
जैसे घट-पट आदि आत्मा का आभास है, वैसे ही स्मृति भी आभास है। स्मृति भी जगत् में उदय हुई है। जब जगत् ही असत्य है तो स्मृति कैसे सत्य हो? जो यथार्थदर्शी हैं, उनको सब ब्रह्मरूप दिखता है। मुझको न कुछ मोक्ष का उपाय दिखता है और न इसका कोई अधिकारी दिखता है। मेरे निश्चय में अद्वैत ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है।