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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

=८१८= ☸ योगवाशिष्ठ ☸

जगत् न हुआ है और न आगे होगा, केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है। वह अद्वैत है, और उसी का सब आभास है। जो आभास को सत्य जानते हो तो स्मृति को भी सत्य जानो। और जो आभास को असत्य जानते हो, तो स्मृति को भी असत्य जानो। जैसे स्वप्न में सृष्टि का आभास होता है। और उसमें अनुभव और स्मृति होती है, पर जागने से सृष्टि के अनुभव और स्मृति का अभाव हो जाता है, वैसे ही अद्वैत परमात्मसत्ता के जाग्रत् में अनुभव और स्मृति का अभाव है। उसमें जगत् कुछ बना नहीं। जैसे कोई पुरुष मरुस्थल में भ्रम से नदी देखता है, और उसे सत्य जानकर उसकी स्मृति करता है, पर वह नदी तो कुछ नहीं है। जब नदी ही असत्य है तो उसकी स्मृति कैसे सत्य हो, वैसे ही अज्ञानी के निश्चय में जो जगत् भासित हुआ है, वह जगत् ही जब असत्य है तो उसकी स्मृति और अनुभव कैसे हो? ज्ञानवान् के निश्चय में ऐसे ही भासित होता है।

हे राम! स्मृति पदार्थ की होती है। पर पदार्थ कोई नहीं, सब ब्रह्म ही अपने आप में स्थित है। और जैसा-जैसा उनमें फुरना होता है, वैसे ही होकर वे भासित होते हैं। परन्तु और कुछ वस्तु नहीं। जैसे वायु चलता भी है और ठहरता भी है, पर चलने और ठहरने में वायु को कुछ भेद नहीं, वैसे ही ज्ञानवान् को जगत् के फुरने या न फुरने में ब्रह्मसत्ता अभेद भासती है और कारण-कार्य नहीं भासित होता है। जैसे पत्ते, टहनी, फूल और फल, सब वृक्ष के अंग हैं, वैसे ही जगत् आत्मा के अंग हैं। आत्मा में प्रकट होते हैं और फिर आत्मा में ही लीन भी हो जाते हैं। भिन्न कुछ नहीं। जब चित्त में स्वभाव जगता है, तब जगत् होकर भासित होता है। कुछ आरम्भ और परिणाम से नहीं होता—आभासमात्र है।

जैसे घट-पट आदि आत्मा का आभास है, वैसे ही स्मृति भी आभास है। स्मृति भी जगत् में उदय हुई है। जब जगत् ही असत्य है तो स्मृति कैसे सत्य हो? जो यथार्थदर्शी हैं, उनको सब ब्रह्मरूप दिखता है। मुझको न कुछ मोक्ष का उपाय दिखता है और न इसका कोई अधिकारी दिखता है। मेरे निश्चय में अद्वैत ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है।

*** निर्वाण प्रकरण *** ८१६

जैसे नट स्वाँग भरता है, पर सब स्वाँगों को आभासमात्र जानता है, किसी को सत्य नहीं जानता, पर उससे भिन्न कुछ होता नहीं, वैसे ही मुझको ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । अज्ञानी के निश्चय को हम नहीं जानते । जिस प्रकार उसके लिए जगत् शब्द है, उसके उस निश्चय को कोई नहीं जानता । मेरे निश्चय में सब चिन्मात्र है । अज्ञानी को जगत् द्वैतरूप दिखता है और उसे विपर्यय भावना होती है और ज्ञानवान् को चिन्मात्र से भिन्न कुछ नहीं भासित होती । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने अनुभव में स्थित होती है और सबका अधिष्ठान अनुभवसत्ता है, परन्तु निद्रादोष से भिन्न-भिन्न भासित होती है, वैसे ही अज्ञानी को जगत् भिन्न-भिन्न लगता है । पर जो जागे हुए ज्ञानवान् हैं, उनको भिन्न कुछ नहीं भासित होता । उनको न अविद्या, न मूर्खता और न मोह भासित होता है । उन्हें सब अपना रूप ब्रह्म-स्वरूप ही दिखता है । जहाँ कुछ दूसरी वस्तु नहीं बनी, वहाँ स्मृति और अनुभव किसका कहिये ? यह सभी कलना मिथ्या है ।

हे राम ! सब अर्थों का जो अर्थभूत है, सो ब्रह्म है । उसी में सब पदार्थ कल्पित हैं । स्मृति और अनुभव मन में होता है । वह मन आत्मा में ऐसे है, जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है । तो उसमें स्मृति और अनुभव क्या कहिये ? सब कल्पित है । पृथ्वी आदिक तत्त्व आत्मा में कुछ बने नहीं । ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है—ज्ञानवान् को सदा ऐसे ही भासित होता है । आभास भी आत्मा में आभास है और कारण-कार्य भाव कभी नहीं भासित होता । जैसे सूर्य को अन्धकार कभी नहीं दिखता, वैसे ही ज्ञानवान् को कारण-कार्यभाव नहीं दिखाई देता । जैसे स्वप्न के आदि में अद्वैतसत्ता होती है और उसमें अकारण स्वप्न की सृष्टि जग जाती है, वैसे ही अद्वैतसत्ता में अकारण आदि सृष्टि प्रकट हुई है । न पृथ्वी है और न कोई दूसरा पदार्थ है, सब चिदाकाशरूप है, और कुछ बना नहीं तो आभासमात्र जगत् में स्मृति की कल्पना कैसे हो ?

इति नि० वर्शननामद्विशताधिकषट्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५६ ॥

८२० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिसमें सब अनुभव होता है, उसके देह में अहंप्रत्यय किस प्रकार होता है? वह तो सर्वात्मा है। उस सर्वात्मा को एक देह में अहंप्रत्यय क्योंकर होता है, और काष्ठ, पाषाण, पर्वत और चेतनता का अनुभव किस प्रकार हो गया है? वह तो अद्भुत स्वरूप है। उसमें जड़ और चैतन्य, ये दोनों भेद कैसे हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे शरीर में हाथ आदि अपने अङ्ग हैं और उन सब अंगों में एक शरीर का भाव व्यापा हुआ है, पर जो उन अंगों में एक अङ्ग को पकड़कर कहे कौन है, सब प्राणी उसका नाम कहता है; तो तुम देखो कि उस एक अङ्ग को भिन्न कहा, परन्तु सब अंगों में उसकी आत्मा का तो नाश नहीं हो जाता है; वैसे ही आत्मा अनुभवरूप है तो भी एक अंग में उसकी आत्मता होते हुए सर्वात्मता खण्डित नहीं हो जाती। जैसे पत्ते, फूल, फल और टहनी आदि सब अंगों में एक ही वृक्ष व्यापा हुआ है परन्तु जो एक टहनी अथवा पत्ते को पकड़कर कहता है कि यह वृक्ष है, तो उसके एक अंग में वृक्षभावना कहने से वृक्ष का सर्वात्मभाव नष्ट नहीं होता; वैसे ही सर्वात्मा का एक देह में अहंभाव सिद्ध होता है। जड़ और चैतन्य, दोनों भाव एक ही ने धारण किये हैं और एक ही के दोनों स्वरूप हैं।

जैसे एक ही शरीर में दोनों सिद्ध होते हैं, तथा हाथ, पाँव आदि जड़ हैं और नेत्र इसके द्रष्टा चेतन हैं, सो एक ही शरीर दोनों हैं और दोनों एक ही शरीर के स्वरूप हैं, वैसे ही एक आत्मा ने दोनों धारण किये हैं और एक ही के स्वरूप हैं। जैसे वृक्ष अपने अंग को रखता है और वृक्ष स्वभाव को भी रखता है, वैसे ही सर्वात्मा सबको धारण करता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि को अनुभव ही धारण करता है और सब क्रियाओं को भी धारण करता है, वैसे ही आत्मसत्ता सब जगत् और जगत् की सब क्रिया को धारण करती है, क्योंकि वह सर्वात्मा है और जो सर्वात्मा है वह क्यों न धारण करे? जैसे एक ही समुद्र में अनेक तरंग उठते हैं, परन्तु सभी समुद्र के आश्रित हैं और वही रूप हैं, वैसे ही सब जीव परमात्मा में प्रकट होते हैं। परमात्मा के आश्रित

⚙ निर्वाण प्रकरण ⚙ <span style="float:right;">८२१</span>

हैं और वही रूप हैं। जैसे तरंग अपने को जाने कि मैं जल ही हूँ तो उसकी तरंग संज्ञा जाती रहती है, जलरूप ही दिखता है, वैसे ही जीव जब परमात्मा से अपने को अभिन्न जाने, जाने कि 'मैं आत्मा ही हूँ' तब उसके जीवत्वभाव का अभाव हो जाता है, परमात्मा ही दिखता है।

हे राम! जैसे जल में द्रवता से तरङ्ग उठते हैं, परन्तु तरङ्ग जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में संवेदन से आदि-ब्रह्मा उपजे हैं और उन्होंने इस जगत् की मनोराज्य से कल्पना की है। वह आकाशरूप निराकार है, और कुछ बना नहीं। जो विराट् ही आकाश-रूप हुआ तो उसका शरीर कैसे साकार हो। वह भी निराकार है जैसे अपना अनुभव स्वप्न में पर्वत, नदियाँ, जड़ और चैतन्य होकर दिखता है, वैसे ही सब जगत् जो दिखता है, वह भी आत्मरूप है। हे राम! जैसे एक निद्रा के दो स्वरूप हैं—स्वप्न और सुषुप्ति, वैसे ही एक ही आत्मा ने जड़ और चैतन्य, दो स्वरूप धारण किये हैं। जगत् आत्मा में कुछ बना नहीं, यह आभासरूप हैं, और आत्मसत्ता ही अपने किञ्चन द्वारा जगत्रूप होकर दिखाई देती है। जैसे आकाश में घन शून्यता के कारण नीलता दिखती है, सो वह अविचारसिद्ध है-नीलता कुछ बनी नहीं, वैसे ही आत्मा में घन चैतन्यता से जगत् दिखता है, परन्तु जगत् का आकार कुछ बना नहीं, सर्वदा आत्मा अद्वैत निराकार है।

अनन्त सृष्टि आत्मा में आभासरूप उपज कर लीन हो जाती है, और आत्मा ज्यों का त्यों है। जैसे समुद्र में तरंग उपजकर लीन हो जाते हैं, परन्तु जलरूप हैं, वैसे ही परब्रह्म में सृष्टि परब्रह्मरूप है। हे राम! यह जगत् विराट् का शरीर है। महाकाश उसका शीश है। दसों दिशा उसकी भुजा हैं। पृथ्वी उसके चरण हैं। पातालरूप तली हैं। मध्यलोक अन्तरिक्ष उदर है। सब जीव उसकी रोमावली हैं और सब पदार्थ विराट् के अंग हैं। वह विराट् आकाशरूप है। जैसे विराट् ब्रह्माजी आकाशरूप हैं, वैसे ही उनका जगत् भी आकाशरूप है। इससे सब जगत् विराटरूप है। वह ब्रह्म ही है, और कुछ बना नहीं। चन्द्रमा

८२२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

और सूर्य उसके नेत्र हैं। सुभासे और तुषसे लेकर सब शब्दों का अधि- ष्ठान ब्रह्म ही है। वह ब्रह्म में हूँ। जिसमें दूसरा बना नहीं, सदा में अपने ही आपमें स्थित हूँ। हे राम! शून्यवादी पांचरात्रिक, शैव, शक्ति आदि जो शास्त्र हैं, उन सबका अधिष्ठान ब्रह्मरूप है, और सबका सार- रूप वही सर्वात्मरूप है। जैसा किसी को निश्चय होता है, वैसा ही उसको वह सर्वरूप होकर फल देता है और कुछ बना नहीं। इति श्रीनि० ब्रह्मजगदेकता नामद्विशताधिकसप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥५७॥

वशिष्टजी बोले, हे राम! इस जगत् के आदि में शुद्ध ब्रह्मसत्ता थी। उसमें जो जगत् का आभास फुरा है, उसको भी तुम वही स्वरूप जानो। जैसे स्वप्न में आदि-अनुभव आकाश होता है, और उसमें स्वप्न की सृष्टि प्रकट होती है, सो वह अनुभवरूप है, भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है, भिन्न नहीं। जैसे समुद्र द्रवता से तरंगरूप होकर दिखता है, वैसे ही चैतन्य ब्रह्म जगतरूप होकर भासित होता है। सो यह जगत् भी वही रूप है। हे राम! वास्तव में कोई दुःख नहीं है। दुःख और सुख अज्ञान से प्रतीत होते हैं। जैसे एक निद्रा में दो वृत्तियाँ दिखती हैं—एक स्वप्नावृत्ति और दूसरी सुषुप्तिवृत्ति; वैसे ही अज्ञानी की दो वृत्तियाँ होती हैं—सुख की और दुःख की। किन्तु ज्ञानवान् ब्रह्मरूप है। जैसे कोई पुरुष स्वप्न से जाग उठता है तो उसको स्वप्न की सृष्टि असत्यरूप दिखती है, वैसे ही ज्ञानवान् को यह सृष्टि असत्य दिखती है। जैसे जिसने मरुस्थल को नदी के जल का अत्यन्ताभाव जाना है, वह जल- पान की इच्छा नहीं करता, वैसे ही सम्यक्दर्शी पुरुष जगत् को असत्य जानता है, इसलिए वह जगत् के पदार्थों की इच्छा भी नहीं करता। जो असम्यक्दर्शी हैं, उनको जगत् सत्य प्रतीत होता है और वे किसी पदार्थ को ग्रहण करते हैं और किसी का त्याग करते हैं।

हे राम! परमात्मा ईश्वर है। उसमें जगत् इसी प्रकार है, जैसे समुद्र में तरंग होते हैं। जैसे समुद्र और तरंग में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। जो तुम कहो कि अविद्या ही जगत् का कारण है तो अविद्या जगत् का कारण तब कहलाती, जब वह जगत् से प्रथम

⚙️ निर्वाण प्रकरण ८२३

सिद्ध होती है, पर अविद्या तो अविद्यमान है । जैसे परमात्मा में जगत् आभासमात्र है, वैसे ही अविद्या भी आभासमात्र है । जो आप ही आभासमात्र हो, उसे जगत् का कारण कैसे कहिये ? जगत् आभास और अविद्या का आभास इकट्ठा ही जगा है । जैसे स्वप्न में सृष्टि दिखती है और उसमें घट-घटादि पदार्थ दिखते हैं । वे किसी कुम्हार ने मृत्तिका लेकर तो नहीं बनाये । जैसे घट उपजा है, वैसे ही कुम्हार और मृत्तिका भी उपजे हैं । जैसे इन सबका भासित होना इकट्ठा ही होता है, वैसे ही जगत् और अविद्या एक साथ ही उपजे हैं । अविद्या पहले तो सिद्ध नहीं होती, तब उसको जगत् का कारण कैसे मानिये ? हे राम ! परमात्मा से जगत् और अविद्या एक साथ ही आभासमात्र उपजे हैं, पर वह आभास कुछ वस्तु नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । न कहीं अविद्या है, न जगत् है । आत्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों स्थित है । हे राम ! निर्विकल्प में जगत् का अत्यन्ता-भाव होता है, तब निर्विकल्प कैसे हो ? जब निर्विकल्प होता है, तब जड़ता आती है और जब विकल्प उठता है, तब संसार उदय होता है । जब ध्यान लगाता है, तब ध्याता, ध्यान और ध्येय त्रिपुटी हो जाती है । इस प्रकार तो निर्विकल्पता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि निर्विकल्प से भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती । निर्विकल्प वह है, जहाँ चित्त की वृत्ति न स्फुरे । पर तब भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि वहाँ भी अभाव वृत्ति सुषुप्ति सी रहती है । सुषुप्तरूप जड़ात्मक है । सविकल्प सुषुप्ति में भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए सम्यक् बोध का नाम निर्विकल्प है ।

जिसको सम्यकबोध निर्विकल्पता से जगत् का अत्यन्ताभाव हुआ है, वह जीवन्मुक्त है । वही निर्विकल्प पद कहलाता है और वही परम जड़ता है, जहाँ जगत् का होना असम्भव है । हे राम ! निर्विकल्प और सविकल्प स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि ये दोनों मन की वृत्तियाँ हैं । जैसे एक निद्रा की वृत्ति स्वप्न और सुषुप्तिरूप है, वैसे ही यह निर्विकल्प और सविकल्प मन की वृत्ति है । निर्विकल्प सुषुप्तिरूप और

८२४ योगवाशिष्ट

पत्थर सदृश है और सविकल्प स्वप्नसदृश चञ्चलरूप है। निर्विकल्प में भी अभाववृत्ति रहती है, इससे उससे भी मुक्ति नहीं होती। मुक्ति तब होती है, जब दृश्य का अत्यन्ताभाव होता है। हे राम! जहाँ आत्म-अनुभव में आकाश से इतर उत्थान नहीं होता—उसका नाम अत्यन्त सुषुप्ति निर्विकल्पता है। हे राम! ऐसे होकर तुम चेष्टा करोगे, तो भी तुमको कर्तृत्व और भोक्तृत्व का अभिमान न होगा। आत्मा को अद्वैत और जगत का अत्यन्ताभाव जानने ही का नाम बोध है। जब बोध और ध्यान की दृढ़ता हो, उसका नाम परमपद है। उसी का नाम निर्वाण है और उसी को मोक्ष भी कहते हैं। जो पद किञ्चन और अकिञ्चन है और सर्वदा अपने आपमें स्थित है, उसमें न नानात्व कहना है, न अनाना शब्द है। न सविकल्प है, न निर्विकल्प है। वह न सत्य है, न असत्य है। न एक है और न दो। उसमें सब शब्दों का अन्त है और किसी शब्द से वाणी प्रवृत्त नहीं होती। उसी सत्ता को प्राप्त होने का उपाय में कहता हूँ।

हे राम! यह मोक्ष का उपाय ग्रन्थ जो मैंने तुमसे कहा है, इसको विचारना। जो पुरुष अर्धप्रबुद्ध और पदपदार्थ जाननेवाला है, उसको यदि मोक्ष की इच्छा है तो वह इस ग्रन्थ को विचारता है, शुभ आचार करके बुद्धि को निर्मल करता है और अशुभ क्रिया का त्याग करता है। तब उसको शीघ्र आत्मपद की प्राप्ति होती है। हे राम! जो मोक्ष का उपाय शास्त्र के विचार से प्राप्त होता है, वह तीर्थ-स्नान, तप और दान से नहीं प्राप्त होता। तप, दानादिक करके स्वर्ग प्राप्त होता है, मोक्ष नहीं मिलता। मोक्षपद अध्यात्मशास्त्र के अर्थ के अभ्यास से ही प्राप्त होता है। यह जगत आभासमात्र है। वही ब्रह्मसत्ता जगतरूप होकर भासित होती है। जैसे जल ही तरङ्गरूप होकर दिखता है और वायु ही स्पन्दन-रूप है, वैसे ही ब्रह्म जगतरूप होकर भासित होता है। जैसे स्पन्दन और निष्स्पन्द में वायु ज्यों की त्यों है, परन्तु स्पन्दन होता है, तब भासित होती है, और निष्स्पन्द होती है तब नहीं भासित होती, वैसे ही ब्रह्म में संवेदन फुरता है तब जगत होकर भासित होता है और जब निर्वेदन

* निर्वाण प्रकरण * ८२५

होता है और अन्तर्मुख अधिष्ठान की ओर आता है, तब जगत् समेटा जाता है। परन्तु संवेदन के फुरने में भी वही है और न फुरने में भी वही है।

इसलिए हे राम ! सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है । ब्रह्म से इतर कुछ नहीं बना । और जो इतर भासित होता है उसे भ्रममात्र ही जानना । जब आत्मपद का अभ्यास होता है, तब भ्रान्ति शान्त हो जाती है । जैसे प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मपद के अभ्यास से भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है । यद्यपि नाना प्रकार की सृष्टि दिखती है, परन्तु कुछ हुई नहीं । जैसे स्वप्न में सृष्टि दिखती है, परन्तु कुछ बनी नहीं, वही अनुभवरूप आत्मसत्ता सृष्टि आकार होकर दिखती है, वैसे ही यह जगत् सब अनुभवरूप है । जैसे रत्न और रत्न की चमक में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । हे राम ! तुम निश्चय करके स्वभाव को देखो, तो भ्रम मिट जावेगा । सृष्टि, स्थिति और प्रलय, सब उसी की संज्ञा है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मगीतापरमनिर्वाणवर्णन-
नाम द्विशताधिकाष्टपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ? ये सब आकार जो तुमको दिखते हैं, संवेदनरूप हैं, कुछ बने नहीं । सृष्टि के आदि में भी अद्वैतसत्ता थी, अन्त में भी वही रहती है और मध्य में जो आकार दिखते हैं, उन्हें भी वही रूप जानो । जैसे स्वप्न की सृष्टि के आदि में जो शुद्ध संवित् होती है और उसमें आकार प्रकट होता है, वह भी अनुभवरूप है, और कुछ नहीं बना, आत्मसत्ता ही पिण्डाकार होकर भासित होती है, और जितने पदार्थ दिखते हैं, सो आकाशरूप आभासमात्र हैं । आत्मसत्ता सदा शुद्ध है, परन्तु अज्ञान से अशुद्ध की नाईं लगती है; विकार से रहित है, परन्तु विकारसहित लगती है; अनाना है परन्तु नाना की नाईं दिखती है और आकार से रहित है परन्तु आकार-सहित प्रतीत होती, जैसे स्वप्न की सृष्टि अपना अनुभवरूप होती है, परन्तु स्वरूप के प्रमाद से नाना प्रकार की भिन्न-भिन्न भासित होती है और जागने पर एक आत्मरूप हो जाती है, वैसे ही यह सृष्टि भी अज्ञान से नाना

८२६ * योगवाशिष्ठ *

एकार को भासित होती है और ज्ञान में एकरूप भासित होती है । विद्यमान लगती है, पर उसे असत्य हो जाना । आत्मसत्ता सदा शुद्धरूप, शान्त और अनन्त है । उसमें देश, काल और पदार्थ आभासमात्र है ।

जो तुम कहो कि आभासमात्र है तो अर्थक्रिया क्यों होती है ? तो उसका उत्तर यह है कि जैसे स्वप्न में कोई नारी गले में लगती है और उसमे प्रत्यक्ष राग और विषयरस होता है, सो वह आभासमात्र होता है, वैसे ही जाग्रत् में विषय, क्षुधा को अन्न, तृषा को जल और और भी सब ऐसे ही होते हैं, और मन पदार्थ प्रत्यक्ष लगते हैं, पर जो इनका कारण विचारिये तो कारण कोई नहीं मिलता । जिसका कोई कारण न मिले, उसे आभासमात्र जानिये । हे राम ! यह जगत् बुद्धिपूर्वक नहीं बना । आदि में जो आभास जगा है, वह बुद्धिपूर्वक नहीं हुआ । उसमें जब जगत् का संकल्प दृढ़ हुआ है, तब कारण से कार्य भासित होने लगा । परन्तु जिनको स्वरूप का प्रमाद हुआ है, उनको कारण में कार्य दिखने लगे । पर जो आत्मस्वभाव में स्थित हैं, उनका सब जगत् आत्मस्वरूप है । हे राम ! कारण से कार्य तब हो, जब पदार्थ भी कुछ वस्तु हो । जैसे पिता की संज्ञा तब होती है, जब पुत्र होता है, और जो पुत्र ही न हो तो पिता कैसे कहिये ! वैसे ही कारण तब कहिये जब कार्य हो । जो कार्य जगत् ही कुछ नहीं, तो कारण कैसे कहिये ?

हे राम ! कारण और कार्य अज्ञानी के निश्चय में होते हैं । जैसे चरखे पर बालक घूमता है तो उसको सब पृथ्वी घूमती लगती है वैसे ही अज्ञानी को मोह दृष्टि से कारण-कार्यभाव दिखता है, पर ज्ञानी को कारण-कार्य भाव नहीं भासित होता । स्मृति को भी जगत् का कारण तब कहिये, जब स्मृति जगत् से पहले हो । पर स्मृति अनुभव भी जगत् में ही उपजे हैं । ये भी आभासमात्र हैं । परन्तु जिनको प्रतीत हुए हैं उनको वैसे ही हैं । हे राम ! स्मृति, संस्कार और अनुभव ये तीनों आभासमात्र हैं । जैसे सूर्य की किरणों में जल भासित होता है, वैसे ही आत्मा में तीनों भासित होते हैं । इसलिए इस कल्पना को त्यागकर

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८२७

जगत् को आभासमात्र जानो। जैसे स्वप्न में घट दिखते हैं, पर उनका कारण मृत्तिका को कहिये तो नहीं बनता, क्योंकि घट और मृत्तिका का आभास इकट्ठा जगा है, इसलिए वे आभासमात्र हुए। उनमें कारण किसे कहिये और कार्य किसे कहिये। वैसे ही स्मृति, संस्कार, अनुभव और जगत् सब इकट्ठे प्रगटे हैं, इनमें कारण किसे कहिये और कार्य किसे कहिये? इसलिए सब जगत् आभासमात्र है।

हे राम! यह सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह आत्मसत्ता का आभास है; आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है। जैसे नेत्र का खोलना और मूँदना होता है, वैसे ही परमात्मा में जगत् की उत्पत्ति और प्रलय होता है। जब चित्तसंवेदन फुरता है, तब जगत्रूप दिखता है और जब फुरने से रहित होता है, तब जगत् का आभास मिट जाता है। जगत् की उत्पत्ति और प्रलय में आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है। जैसे खुलना और मूँदना नेत्रों का स्वभाव है वैसे ही फुरना और न फुरना संवेदन के स्वभाव हैं। जैसे चलना और ठहर जाना दोनों वायु के स्वभाव हैं, जब चलती है तब जान पड़ती है और जब नहीं चलती तब नहीं जान पड़ती। चलने में वायु की तीन संज्ञा होती हैं—एक मन्द-मन्द चलती है अथवा बहुत चलती है, दूसरी का शीतल अथवा उष्ण स्पर्श होती है और तीसरी सुगन्ध अथवा दुर्गन्धयुक्त होती है। ये तीनों संज्ञा फुरने में होती हैं। पर जब फुरने से रहित होती है, तब तीनों संज्ञा मिट जाती हैं। जैसे एक ही अनुभव में स्वप्न और सुषुप्ति की कल्पना होती है। स्वप्न में जगत् ही भासित होता है और सुषुप्ति में नहीं भासित होता, परन्तु दोनों में अनुभव एक ही है—वैसे ही संवित् के फुरने से जगत् भासित होता है और ठहरने में अच्युतरूप हो जाता है। पर आत्मसत्ता ज्यों की त्यों एकरूप है। इसलिए जो कुछ जगत् दिखता है, वह आत्मा से भिन्न नहीं, वही रूप है। जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय, तीनों आत्मा के आभास हैं—उनमें आस्था न करना।

हे राम! मैंने इस परम सिद्धान्त का तुमको उपदेश किया है। जिन युक्तियों से कहा है, वैसी कोई नहीं कहेगा। अज्ञानी को संसाररूपी

८२ = ❊ योगवाशिष्ठ ❊

बड़ी भ्रान्ति उदय हुई है, परन्तु जो मेरे शास्त्र को बारम्बार विचारेगा, उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। दिन के दो भाग करे। आधे दिन तक मेरा शास्त्र विचारे और आधा दिन अपने आचार में व्यतीत करे। जो आधे दिन इस शास्त्र का विचार न कर सके तो एक पहर ही विचारे। जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार निवृत्त होता है, वैसे ही उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। जो मेरे वचनों को वृथा जानकर उनकी निन्दा करेगा, उसको आत्मपद की प्राप्ति न होगी, क्योंकि उसने शास्त्र के तत्त्व को नहीं जाना। जीव का यह कर्तव्य है कि प्रथम और शास्त्रों को विचार ले, फिर पीछे से इसको विचारे, जिसमें उसे इस शास्त्र की महिमा ज्ञात हो। हे राम ! यह मोक्षोपाय शास्त्र आत्म-बोध का परम कारण है। यदि जीव पदपदार्थों का जाननेवाला हो और इस शास्त्र को बारम्बार विचारे तो उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। जो सम्पूर्ण ग्रन्थ के आशय को न समझ सके तो थोड़ा-थोड़ा बाँचै और विचारे तो उसको सब समझ पड़ेगा।

हे राम ! यदि मनुष्य कुल भी पदार्थ जानता है तो इसके विचारने और पढ़ने से बुद्धिमान हो जाता है और इस शास्त्र में उसे प्रीति होती है। इसको विचारनेवाले की बुद्धि और शास्त्रों की ओर नहीं जाती, इससे यह विचारने योग्य है। जो पुरुष आत्मविचार से रहित है, उसका जीवन वृथा है। जिनको यह तत्त्व विचार है, उनको सब पदार्थ आत्म-रूप हो जाते हैं । । जो एक साँस भी आत्मविचार से रहित होती है, वह वृथा जाती है। मनुष्य की ऐसी एक साँस के समान सम्पूर्ण पृथ्वी का धन भी नहीं है। यदि एक साँस निष्फल जाय तो फिर माँगे नहीं मिलती। ऐसी साँस को जो वृथा गँवाते हैं, उनको तुम पशु जानो। हे राम ! आयु बिजली की चमक के समान है। जैसे बिजली की चमक तुरन्त मिट जाती है, वैसे ही आयु नष्ट हो जाती है। ऐसे शरीर को पाकर जो सुख की तृष्णा करते हैं, वे महामूर्ख हैं। हे राम ! यह सम्पूर्ण जगत् आभासमात्र है। सत्य लगता है तो भी इसको असत्य जानो जैसे स्वप्न की सृष्टि में कोई मृतक होता है, उसके बान्धव रुदन करते हैं

✹ निर्वाण प्रकरण ✹ [८२६]

और इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है, परन्तु हुआ कुछ नहीं, सब भ्रान्ति-मात्र है, वैसे ही इस जगत् को भ्रममात्र जानो ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे परमार्थगीतावर्णनं नाम द्विशताधिकैकोनषष्टितमसर्गः ॥ २५६ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जगत् तो अनेक और असंख्य हुए हैं और आगे होंगे, पर उन जगतों की कथाओं से आपने मुझे उपदेश करके क्यों न जगाया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये जो जगज्जाल के समूह हैं, उनमें जो पदार्थ हैं, वे सब शब्द-अर्थ से रहित हैं । और जब शब्द-अर्थ से रहित हुए तो कुछ न हुए । इसलिए व्यर्थ कहने का क्या प्रयोजन है । हे राम ! जब तुम विदितवेद्य और निर्मल त्रिकालदर्शी होगे, तब इन जगतों को स्वयं जानोगे । मैंने पहले भी तुमसे बहुत बार कहा है । बारम्बार वही वर्णन करने में पुनरुक्ति दोष होता है । परन्तु समझाने के लिए मैंने ऐसा किया है । जैसे एक सृष्टि को जाना, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टियों को जानो । जैसे अन्न के ढेर में एक मुट्ठी भर को देखकर जान लिया जाता है कि सब दाने ऐसे ही हैं, वैसे ही एक ही सृष्टि का यथार्थ स्वरूप जाना तो सब सृष्टियों को भी जान लिया । हे राम ! यह सब जगत् किसी कारण से नहीं उत्पन्न हुआ । जिसमें कारण बिना पदार्थ भासित हो, उसे जानिये कि वही रूप है । सृष्टि के आदि में भी वही सत्ता थी; अन्त में भी वही होगी और मध्य में जो कुछ दिखता है, उसे भी वही रूप जानिये । स्वप्न के आदि में भी अपना निर्मल अनुभव होता है, स्वप्न के निवृत्त होने पर भी वही रहता है और स्वप्न के बीच जो पदार्थ भासित होता है, उसे भी वही जानिये । और वस्तु कुछ नहीं, अनुभवसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है । जब तुम विदितवेद्य होगे, तब सब जगत् तुमको अपना रूप भासित होगा । हे राम ! एक-एक अणु में अनेक सृष्टियाँ हैं । वे सब आकाशरूप हैं, कुछ हुई नहीं । इस पर एक आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो । एक समय मैंने ब्रह्माजी को एकान्त में पाकर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! ये सृष्टियाँ कितनी हैं और किसमें हैं ।

८३० योगवाशिष्ट

तब पितामह ने कहा, हे मुनीश्वर ! सब जगतों के सब शब्द-अर्थ ब्रह्मरूप हैं, ब्रह्म से इतर कुछ नहीं। जो अज्ञानी हैं, उनको नाना प्रकार का जगत् दिखता है, और जो ज्ञानवान् हैं उनको सब जगत् आत्मरूप भासित होता है। जिस प्रकार जगत् हुआ है, वह भी सुनो। हे राम ! ब्रह्मरूपी आकाश के सूक्ष्म अणु में स्फुरण हुआ कि 'अहमस्मि' (मैं हूँ)। तब उस अणु ने अपने को जीव जाना। जैसे अपने स्वप्न में अपने को जीव जाने और सर्वात्मा हो वैसे ही चित् अणु सर्वात्मा अहंकार को अङ्गीकार करके अपने को जीव जानने लगा। उसमें जो निश्चय हो गया, वही बुद्धि हुई। जैसे वायु में स्फुरण होता है, वैसे ही उसमें संकल्प-विकल्परूपी स्फुरण हुआ। उसका नाम मन हुआ। तब मन के साथ मिलकर चितअणु ने देह को चेता और अपने में देह और इन्द्रियाँ भासित होने लगीं। उसने अपने साथ शरीर देखा कि यह शरीर मेरा है। जैसे स्वप्न में अपने साथ कोई शरीर को देखे और बड़ा स्थूल देख पड़े, वैसे ही उसने अपने साथ स्थूल शरीर देखा। जैसे स्वप्न में सूक्ष्म अनुभव से बड़े पर्वत दिखते हैं, वैसे ही सूक्ष्म अणु में स्थूल विराट् शरीर भासित होने लगा। फिर देश-काल की कल्पना की, तब नाना प्रकार के स्थावर-जङ्गम प्राणी और विराट् भासित होने लगा। जैसे स्वप्न में दिखनेवाले देश, काल और पदार्थ कुछ नहीं हैं वैसे ही देश-काल पदार्थ भासित हुए परन्तु हैं कुछ नहीं। जब चित्तसंवित् बहिर्मुख जगती है, तब नाना प्रकार का जगत् दिखता है, और जब अन्तर्मुख होती है, तब अवाच्यरूप हो जाती है। जैसे वायु चलने और ठहरने में एकरूप होती है, वैसे ही फुरने और न फुरने में संवित् एक तथा अभेद है।

हे राम ! सब जगत् आकाश में आकाशरूप अपने आपमें स्थित है और अणु-अणु प्रति सर्वदा सृष्टि है। परन्तु सब आभासमात्र है। जो चेत्य सम्बन्धी होकर जीव सृष्टि का अन्त ले तो सृष्टि अनन्त है। इसका अन्त कहीं नहीं आता। यह सृष्टि अविद्यारूप है। वह अविद्या ही चेत्य है। जब जीव अविद्यासम्बन्धी होकर जगतों का अन्त देखेगा, तब

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ =३१

अन्त कहीं न आवेगा । किन्तु संस्मरण का नाम संसार है । जब स्वरूप में स्थित होगे, तब सब जगत् ब्रह्मरूप हो जावेगा और जगत् की कल्पना कुछ न भासित होगी । हे राम ! इस जगत् के आदि में भी अद्वैतसत्ता थी, अन्त में भी अद्वैतसत्ता रहेगी और मध्य में जो कुछ दिखता है, उसको भी वही रूप जानो, और कुछ बना नहीं । यह जगत् अकारण है, अधिष्ठानसत्ता के अज्ञान से भासित होता है । इसी का नाम जगत् और इसी का नाम अविद्या है । अधिष्ठान को जानने का नाम विद्या है । हे राम ! न कोई अविद्या है और न जगत् है, ब्रह्म ही अपने आप में स्थित है । चाहे जगत् कहो और चाहे ब्रह्म कहो, दोनों एक ही वस्तु के नाम हैं ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्माण्डोपाख्यानं नाम द्विशताधिकषष्टितमसर्गः ॥ २६० ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह मैंने जाना कि जगत् अकारण है । जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर होता है, वैसे ही यह जगत् है । पर जो अकारण ही है तो अब यहाँ सब पदार्थ कारण से उपजते क्यों देख पड़ते हैं ? कारण बिना तो नहीं होते, फिर ये क्यों भासित होते हैं ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्रह्मसत्ता सर्वात्म है । उसमें जैसे निश्चय होता है, वैसा ही होकर दिखता है । पर क्या दिखता है ? अपना अनुभव ही ऐसे होकर दिखता है । जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही नाना प्रकार के पदार्थ होकर दिखता है, परन्तु उपजा कुछ नहीं, सब पदार्थ आकाश-रूप हैं, वैसे ही यह जगत् कुछ उपजा नहीं, कारण से रहित आकाश रूप है । हे राम ! आदि सृष्टि अकारण हुई है; पीछे से सृष्टि में आभास-रूप मन ने जैसा-जैसा निश्चय किया है, वैसा ही दिखता है, क्योंकि मन सर्व-शक्तिरूप है । आदि-सृष्टि जो उपजती है, वह अकारणरूप है । पीछे से सृष्टिकाल में कारण-कार्यरूप हुए हैं । जैसे स्वप्न-सृष्टि आदि कारण बिना होती है और पीछे से कारण-कार्य दिखता है, पर वास्तव में न कोई आकाश है, न शून्य है, न अशून्य है, न सत्य है, न असत्य है, न असत्य सत्य के मध्य है, न नित्य है, न अनित्य है, न परम है,

८३२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

न अपरम् है, न शुद्ध है, न अशुद्ध है। द्वैत कुछ नहीं, सब भ्रम है। हे राम! ज्ञानवान् को सब शब्द और अर्थ ब्रह्मरूप भासित होते हैं। मुझको तो कारण-कार्य-भाव की कल्पना कुछ नहीं। जैसे सूर्य में अन्धकार का अभाव है, वैसे ही ज्ञानवान् के लिए कारण-कार्य का अभाव है। जो सब आत्मा ही है तो कारण या कार्य किसको कहिये?

राम ने कहा, हे भगवन्! मैं ज्ञानी की बात पूछता हूँ। उनको कारणकार्यभाव किस कारण नहीं भासित होता? जो कारण-कार्य नहीं तो मृत्तिका और कुम्हार आदि द्वारा घटादिक क्योंकर उत्पन्न होते देख पड़ते हैं? बताइये ज्ञानवान् को अकारण कैसे दिखता है और अज्ञानी को सकारण क्योंकर भासित होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई कारण है, न कार्य है और न कोई अज्ञानी है। मैं तुमसे क्या कहूँ? जो ज्ञानवान् पुरुष है, उनके निश्चय में जगत् की कोई कल्पना नहीं फुरती। उनके निश्चय में तो जगत् है ही नहीं। तब ज्ञानी और अज्ञानी क्या? हे राम! आकाश में वृक्ष हो नहीं तो उसका वर्णन क्या कीजिये! जैसे हिमालय पर्वत में अग्नि का कण नहीं पाया जाता, वैसे ही ज्ञानी के निश्चय में जगत् नहीं है। ज्ञानी और अज्ञानी, कारण और कार्य, ये शब्द जगत् में होते हैं। पर जब जगत् ही नहीं उपजा तो कारण, कार्य, ज्ञानी और अज्ञानी तुमसे क्या कहूँ? जैसे स्वप्न की सृष्टि सुषुप्ति में लीन हो जाती है और वहाँ शब्द और अर्थ कोई नहीं फुरता, वैसे ही ज्ञानवान् के निश्चय में जगत् ही नहीं फुरता। हे राम! मुझको तो सब ब्रह्म ही भासित होता है। मुझको कुछ कहना नहीं। परन्तु तुमने पूछा है, इसलिए अज्ञानी के निश्चय को अङ्गीकार करके कुछ कहता हूँ।

हे राम! यह जगत् अकारण और आभासमात्र है; किसी आरम्भ और परिणाम से नहीं हुआ। जब पदार्थों का कारण विचारिये तो सबका अधिष्ठान ब्रह्म ही निकलता है। वह अद्वैत, अच्युत और सब इच्छाओं से रहित है। तब उसको कारण कैसे कहिये? इससे जाना जाता है कि जगत् आभासमात्र है। और कुछ वस्तु नहीं, आत्मसत्ता

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ =३३

ही इस प्रकार भासित होती है । जैसे स्वप्न की सृष्टि अकारण होती है और उसमें अनेक पदार्थ दिखते हैं, पर उसका कारण विचारिये तो सबका अधिष्ठान अनुभव ही निकलता है । उसमें आरम्भ और परिणाम कुछ नहीं हुआ । सृष्टि अनुभवरूप भासित होती है । जो पुरुष स्वप्न देख रहा है, उसको स्वरूप के प्रमाद से कारण, कार्य, जगत् और पुण्य, पाप सब यथार्थ लगते हैं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् दिखता है । हे राम ! आदि सृष्टि अकारण हुई है । पीछे सृष्टिकाल में कारण-कार्यरूप भासित होते हैं । जिसको अपना वास्तव स्वरूप स्मरण है, उसको अकारण दिखती है और जिस अज्ञानी को अपने वास्तव स्वरूप का प्रमाद है उसको कारण-कार्यरूप सृष्टि भासित होती है । हे राम ! वास्तव में एक ही अनुभव आत्मसत्ता है, परन्तु जैसा-जैसा अनुभव में संकल्प दृढ़ होता है, उसी की सिद्धि होती है, और जिसका तीव्र संवेग होता है, वही होकर दिखता है । इसमें कुछ संदेह नहीं कि कल्पवृक्ष के पदार्थ संकल्प की तीव्रता से प्रत्यक्ष होते हैं । तो उन्हें किसका कार्य कहिये ? यदि जगत् किसी कारण से उत्पन्न होता तो महाप्रलय में भी कुछ शेष रहता—जैसे अग्नि के पीछे राख रह जाती है, पर जगत् के पीछे तो कुछ नहीं रहता । जैसे स्वप्न की सृष्टि जागने पर कुछ नहीं रहती, वैसे ही महाप्रलय में जगत् का शेष कुछ नहीं रहता । इससे जाना जाता है कि यह जगत् आभासमात्र है ।

जैसे ध्यान में ध्याता पुरुष किसी आकार को रचता है तो उसका कारण कोई नहीं होता, वह तो आकाशरूप है और अनुभवसत्ता ही फुरने से इस प्रकार होकर भासित होती है—आकार तो कोई नहीं, और जैसे गन्धर्वनगर कारण से रहित दिखता है, वैसे ही यह जगत् कारण बिना प्रकट हुआ है । न कोई पृथ्वी है, न कोई जल है । न तेज, वायु और आकाश है । सब आकाशरूप है । परन्तु संकल्प की दृढ़ता से पिण्डाकार भासित होते हैं । हे राम ! जब मनुष्य मर जाता है, तब शरीर यहीं भस्म हो जाता है, फिर जीव परलोक में अपने साथ शरीर देखता है और उस शरीर से स्वर्ग-नरक में सुख-दुःख भोगता है,

=८३४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

तो उसका कारण कौन है ? उसका कारण कोई नहीं पाया जाता केवल चेतनता में संकल्परूप वासना जो दृढ़ हुई है, उसी के अनुसार शरीर भासित होता है और स्वर्ग-नरक में दुःख-सुख भासित होते हैं और तो कुछ वस्तु नहीं । सब पदार्थ संकल्प के रचे हुए हैं । वे सब आत्मरूप हैं । जैसे आकाश, व्योम और शून्य एक ही वस्तु के नाम हैं वैसे ही कोई जगत् कहो और कोई ब्रह्म कहो, इनमें भेद नहीं । फुरने का नाम जगत् है और न फुरने का नाम ब्रह्म है । जैसे वायु के चलने और ठहरने में भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म को संवेदन के फुरने और न फुरने में कुछ भेद नहीं । जो सम्यग्दर्शी हैं, उनको सब जगत् ब्रह्मस्वरूप दिखता है, इस कारण दोष किसी में नहीं रहता । और जो बड़ा कष्ट प्राप्त होता है । तो भी उन्हें खेद नहीं होता ।

जैसे कोई पुरुष स्वप्न में युद्ध करता है और उसको अपना जाग्रत स्वरूप स्मरण हो आता है, तो वह स्वप्न को स्वप्न जानता हुआ युद्ध करता है तो भी दुःख नहीं होता, वैसे ही जो पुरुष परमपद में जागा है, उसकी सब क्रियाएँ होती हैं, परन्तु वह अपने को अक्रिय जानता है । हे राम ! ज्ञानवान् की सब चेष्टाएँ होती हैं, परन्तु उसके निश्चय में क्रिया का अभिमान नहीं होता । जैसे नट सब स्वाँग भरता है, परन्तु अपने को स्वाँग से अलग और स्वाँग की क्रिया को असत्य जानता है, क्योंकि उसको अपना स्वरूप स्मरण रहता है, वैसे ही ज्ञानवान् सब क्रियाओं को असत्य जानता है । हे राम ! ये सब पदार्थ अजातजात हैं—उपजे नहीं । जैसे स्वप्न में पदार्थ दिखते हैं, परन्तु उपजे नहीं, अपना अनुभव ही इस प्रकार दिखता है, वैसे ही ये जगत् के पदार्थ भी अनुभवरूप जानो । हे राम ! बहुत शास्त्र और वेद मैं तुमको किस लिए सुनाऊँ और किस लिए पढूँ ? वेदान्त शास्त्रों का सिद्धान्त यही है कि वासना से रहित हो । इसी का नाम मोक्ष है । वासनासहित का नाम बन्धन है । वासना किसकी कीजिए ? यह सब सृष्टि तो अकारण भ्रममात्र है । इसमें क्या आस्था बढ़ाइये ? ये विषय तो स्वप्न के पर्वत हैं ।

इति श्रीयो० नि० ब्रह्मगीतावर्णननामद्विशताधिकैकषष्टितमस्सर्गः ॥२६१॥

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

८३५

श्रीरामजी ने पूछा, हे भगवन् ! सब जगतों में तीन प्रकार के पदार्थ हैं—एक अप्रत्यक्ष पदार्थ, दूसरे प्रत्यक्ष पदार्थ और तीसरे मध्यभावी । जैसे वायु अप्रत्यक्ष है, क्योंकि रूप से रहित है, परन्तु स्पर्श में प्रतीत होती है, इसलिये मध्यभावी प्रत्यक्ष है । अप्रत्यक्ष वह जो किसी को मिले नहीं । ऐसी यह संवित् अप्रत्यक्ष है । हे मुनीश्वर ! चन्द्रमा के मण्डल में भी यह संवेदन जाता है और फिर गिरता है और चित्त से चन्द्रमा को देखता है और फिर आता है, इससे जाना कि यह निराकार है; जो साकार होता तो चन्द्रमारूप हो जाता, फिर लौटकर न आता । जैसे जल में डाला हुआ जल फिर नहीं निकलता । इस कारण जानता हूँ कि यह अप्रत्यक्ष अर्थात् निराकार है । हे मुनीश्वर ! अज्ञानी का आशय लेकर मैं पूछता हूँ कि इस शरीर में जो प्राण आते-जाते हैं, वे कैसे आते-जाते हैं ? जो तुम कहो कि संवित्, जो ज्ञानशक्ति है, इस शरीर और प्राण को लिये फिरती है-जैसे मजदूर भार को लिये फिरता है-तो ऐसे कहना ठीक नहीं, क्योंकि संवित् अप्रत्यक्ष निराकार है । अप्रत्यक्ष साकार से नहीं मिलता । तब वह चेष्टा क्योंकर करे ? जो कहो कि निराकार संवित् ही चेष्टा कराती है, तो पुरुष की संवित् चाहती है कि पर्वत नृत्य करे, पर वह तो इसका चलाया नहीं चलता । और कहते हैं कि ये पदार्थ उठ आवें, परन्तु वे तो नहीं उठते, क्योंकि पदार्थ साकार हैं और वृत्ति निराकार है । इसका क्या उत्तर है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस शरीर में एक नाड़ी है । जब वह अवकाशरूपी होती है, तब उसमें से प्राणवायु निकलता है और जब संकोचरूप होती है, तब प्राणवायु भीतर आता है । जैसे लोहार की धौंकनी होती है, वैसे ही इसके भीतर पुरुषबल है, उससे चेष्टा होती है ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! धौंकनी भी तब चलती है तब उसके साथ बल का स्पर्श होता है,और स्पर्श तब होता है, जब प्रत्यक्ष वस्तु होती है । पर चेतनता तो निराकार है । उसको स्पर्श क्योंकर कहिये ? जो तुम कहो कि उसकी इच्छा ही से स्पर्श होता है, तो हे मुनीश्वर ! मैं चाहता हूँ कि मेरे सम्मुख जो वृक्ष है, वह गिर पड़े, पर वह तो नहीं गिरता, क्योंकि

८३६ 🏵 योगवाशिष्ठ 🏵

इच्छा निराकार है। जो साकार से स्पर्श हो तब उसकी शक्ति में गिर पड़े। यदि इच्छा से ही चेष्टा होती है तो कर्मइन्द्रियाँ किस लिए हैं? इच्छा ही से जगत् की चेष्टा हो? यह भी संशय है कि एक के बहुत क्योंकर हो जाते हैं और बहुत का एक क्योंकर हो जाता है? एक चैतन्य है, पर जब प्राण निकल जाते हैं, तब पाषाण और वृक्ष की नांई जड़ हो जाता है। आत्मा तो सर्वव्यापी है, वह जड़ कैसे हो जाता है? कोई पाषाण और वृक्षरूप जड़ है और कोई चेतन है। यह भेद एक आत्मा में कैसे हुआ! वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुम्हारे संशयरूपी वृक्षों को मैं वचनरूपी कुल्हाड़े से काटता हूँ। जिनको तुम प्रत्यक्ष साकार कहते हो, सो उनमें आकार कोई नहीं; सब निराकार हैं। वह शुद्ध आत्मा अद्वैतसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है- ये आकार कुछ बने नहीं। जैसे स्वप्ननगर में जो आकार दिखते हैं, वे सब आकाश रूप निराकार हैं, वैसे ही ये आकार भी जो तुमको दिखते हैं, सब निराकार हैं। स्वप्न में जो पर्वत दिखते हैं, वे किसके आश्रय होते हैं और देहादिक दिखते हैं, वे किसके आश्रय हैं? इसलिए वे कुछ बने नहीं, अनुभवसत्ता ही आकाररूप हो दिखती है। वैसे इसे भी जानो कि आकार कोई नहीं।

हे राम! जब इन पदार्थों का कारण विचारिये तो कारण कोई नहीं निकलता, इसी से जाना जाता है कि आभासमात्र हैं, बने कुछ नहीं। आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है। आत्मसत्ता अद्वैत और परमशुद्ध है। उसमें जगत् कुछ बना नहीं, तो मैं आकार क्या कहूँ और निराकार क्या कहूँ? पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश भी द्वैत कुछ नहीं, शुद्ध आत्मसत्ता ही इस प्रकार दिखती है। जैसे संकल्प के रचे पदार्थ अनुभवरूप होते हैं, वैसे ही ये सब पदार्थ अनुभवरूप हैं-अनुभव से भिन्न कुछ नहीं। इस पर एक आख्यान कहता हूँ। उसे मन लगाकर सुनो। हे राम! पहले भी मैंने तुमसे कहा है, और अब भी प्रसंगवश कहता हूँ। एक समय एक सृष्टि में एक इन्द्र ब्राह्मण था जो मानो ब्रह्मा ही था। उसके दस पुत्र हुए, जो मानों दसों दिशा

# ❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ८३७

थे । कुछ काल में वह ब्राह्मण मृतक हुआ । उसकी स्त्री पतिव्रता थी, इसलिए उसके प्राण भी छूट गये जैसे दिन के पीछे संध्या आ जाती है । तब उन पुत्रों ने यथाशास्त्रक्रम से उनकी क्रिया की और फिर एक पहाड़ की कन्दरा में पहुँचे और विचारने लगे कि किसी प्रकार हम ऊँचे पद को पावें । हे राम ! पहले मैंने तुमको सुनाया है कि प्रथम उन्होंने मण्डलेश्वर, चक्रवर्ती राजा और इन्द्रादिक के पद को पाने का विचार किया । फिर बड़े भाई ने निर्णय करके यही कहा कि सबसे ऊँचा ब्रह्माजी का पद है, जिनकी यह सब सृष्टि रची हुई है, इसलिए हम दसों ब्रह्मा हों । ऐसे विचार करके वे दसों पद्मासन लगाकर बैठे और यह निश्चय किया कि हम चतुर्मुख ब्रह्मा हैं, और सब सृष्टि हमारी रची है । निदान वे ऐसे निश्चय हो गये, मानो पुतलियाँ लिखी हुई हैं । उन्हें खान-पान छोड़े मास, वर्ष और युग वर्ष व्यतीत हो गये, पर वे ज्यों के त्यों रहे, चलायमान न हुए । जैसे जल नीची जगह में जाता है, ऊँचे को नहीं जाता, वैसे ही उन्होंने अपना निश्चय न त्यागा और दृढ़ रहे । जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब उनके शरीर गिर पड़े और उनको पक्षी खा गये, पर उनकी जो ब्रह्मा की वासना से युक्त संवित् थी, उस वासना से दसों ब्रह्मा हो गये, और उनकी देश, काल, पदार्थ और नीति सहित दस ही सृष्टियाँ हो गईं । जैसे हमारी सृष्टि है, वैसे ही वे सृष्टियाँ हुईं ।

हे राम ! वे सृष्टियाँ क्या हुईं, आत्मा ही वस्तु हुई और तो कुछ नहीं; कुछ और हो तो कहूँ । इससे सृष्टि का और रूप कुछ नहीं, अपना अनुभव ही सृष्टिरूप भासित होता है और जो कुछ पदार्थ भासित होते हैं वे सब आत्मरूप है । हे राम ! जैसे हम ब्रह्म के संकल्प में रचे गये हैं, वैसे ही उन्होंने भी रच लिये, और वे भी इस प्रकार स्थित हो गये । इससे सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है । जो किसी कारण से जगत् बना होता तो जाना जाता कि कुछ हुआ है, पर इसका कारण कोई नहीं पाया जाता, इससे यह जगत् संकल्पमात्र और आभासमात्र है । इससे कहता हूँ कि सब ब्रह्म ही है, और कुछ वस्तु नहीं । पाषाण