योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1640, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें# ❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ८३७
थे । कुछ काल में वह ब्राह्मण मृतक हुआ । उसकी स्त्री पतिव्रता थी, इसलिए उसके प्राण भी छूट गये जैसे दिन के पीछे संध्या आ जाती है । तब उन पुत्रों ने यथाशास्त्रक्रम से उनकी क्रिया की और फिर एक पहाड़ की कन्दरा में पहुँचे और विचारने लगे कि किसी प्रकार हम ऊँचे पद को पावें । हे राम ! पहले मैंने तुमको सुनाया है कि प्रथम उन्होंने मण्डलेश्वर, चक्रवर्ती राजा और इन्द्रादिक के पद को पाने का विचार किया । फिर बड़े भाई ने निर्णय करके यही कहा कि सबसे ऊँचा ब्रह्माजी का पद है, जिनकी यह सब सृष्टि रची हुई है, इसलिए हम दसों ब्रह्मा हों । ऐसे विचार करके वे दसों पद्मासन लगाकर बैठे और यह निश्चय किया कि हम चतुर्मुख ब्रह्मा हैं, और सब सृष्टि हमारी रची है । निदान वे ऐसे निश्चय हो गये, मानो पुतलियाँ लिखी हुई हैं । उन्हें खान-पान छोड़े मास, वर्ष और युग वर्ष व्यतीत हो गये, पर वे ज्यों के त्यों रहे, चलायमान न हुए । जैसे जल नीची जगह में जाता है, ऊँचे को नहीं जाता, वैसे ही उन्होंने अपना निश्चय न त्यागा और दृढ़ रहे । जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब उनके शरीर गिर पड़े और उनको पक्षी खा गये, पर उनकी जो ब्रह्मा की वासना से युक्त संवित् थी, उस वासना से दसों ब्रह्मा हो गये, और उनकी देश, काल, पदार्थ और नीति सहित दस ही सृष्टियाँ हो गईं । जैसे हमारी सृष्टि है, वैसे ही वे सृष्टियाँ हुईं ।
हे राम ! वे सृष्टियाँ क्या हुईं, आत्मा ही वस्तु हुई और तो कुछ नहीं; कुछ और हो तो कहूँ । इससे सृष्टि का और रूप कुछ नहीं, अपना अनुभव ही सृष्टिरूप भासित होता है और जो कुछ पदार्थ भासित होते हैं वे सब आत्मरूप है । हे राम ! जैसे हम ब्रह्म के संकल्प में रचे गये हैं, वैसे ही उन्होंने भी रच लिये, और वे भी इस प्रकार स्थित हो गये । इससे सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है । जो किसी कारण से जगत् बना होता तो जाना जाता कि कुछ हुआ है, पर इसका कारण कोई नहीं पाया जाता, इससे यह जगत् संकल्पमात्र और आभासमात्र है । इससे कहता हूँ कि सब ब्रह्म ही है, और कुछ वस्तु नहीं । पाषाण