सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1639, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1639

८३६ 🏵 योगवाशिष्ठ 🏵

इच्छा निराकार है। जो साकार से स्पर्श हो तब उसकी शक्ति में गिर पड़े। यदि इच्छा से ही चेष्टा होती है तो कर्मइन्द्रियाँ किस लिए हैं? इच्छा ही से जगत् की चेष्टा हो? यह भी संशय है कि एक के बहुत क्योंकर हो जाते हैं और बहुत का एक क्योंकर हो जाता है? एक चैतन्य है, पर जब प्राण निकल जाते हैं, तब पाषाण और वृक्ष की नांई जड़ हो जाता है। आत्मा तो सर्वव्यापी है, वह जड़ कैसे हो जाता है? कोई पाषाण और वृक्षरूप जड़ है और कोई चेतन है। यह भेद एक आत्मा में कैसे हुआ! वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुम्हारे संशयरूपी वृक्षों को मैं वचनरूपी कुल्हाड़े से काटता हूँ। जिनको तुम प्रत्यक्ष साकार कहते हो, सो उनमें आकार कोई नहीं; सब निराकार हैं। वह शुद्ध आत्मा अद्वैतसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है- ये आकार कुछ बने नहीं। जैसे स्वप्ननगर में जो आकार दिखते हैं, वे सब आकाश रूप निराकार हैं, वैसे ही ये आकार भी जो तुमको दिखते हैं, सब निराकार हैं। स्वप्न में जो पर्वत दिखते हैं, वे किसके आश्रय होते हैं और देहादिक दिखते हैं, वे किसके आश्रय हैं? इसलिए वे कुछ बने नहीं, अनुभवसत्ता ही आकाररूप हो दिखती है। वैसे इसे भी जानो कि आकार कोई नहीं।

हे राम! जब इन पदार्थों का कारण विचारिये तो कारण कोई नहीं निकलता, इसी से जाना जाता है कि आभासमात्र हैं, बने कुछ नहीं। आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है। आत्मसत्ता अद्वैत और परमशुद्ध है। उसमें जगत् कुछ बना नहीं, तो मैं आकार क्या कहूँ और निराकार क्या कहूँ? पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश भी द्वैत कुछ नहीं, शुद्ध आत्मसत्ता ही इस प्रकार दिखती है। जैसे संकल्प के रचे पदार्थ अनुभवरूप होते हैं, वैसे ही ये सब पदार्थ अनुभवरूप हैं-अनुभव से भिन्न कुछ नहीं। इस पर एक आख्यान कहता हूँ। उसे मन लगाकर सुनो। हे राम! पहले भी मैंने तुमसे कहा है, और अब भी प्रसंगवश कहता हूँ। एक समय एक सृष्टि में एक इन्द्र ब्राह्मण था जो मानो ब्रह्मा ही था। उसके दस पुत्र हुए, जो मानों दसों दिशा