योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1638, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊
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श्रीरामजी ने पूछा, हे भगवन् ! सब जगतों में तीन प्रकार के पदार्थ हैं—एक अप्रत्यक्ष पदार्थ, दूसरे प्रत्यक्ष पदार्थ और तीसरे मध्यभावी । जैसे वायु अप्रत्यक्ष है, क्योंकि रूप से रहित है, परन्तु स्पर्श में प्रतीत होती है, इसलिये मध्यभावी प्रत्यक्ष है । अप्रत्यक्ष वह जो किसी को मिले नहीं । ऐसी यह संवित् अप्रत्यक्ष है । हे मुनीश्वर ! चन्द्रमा के मण्डल में भी यह संवेदन जाता है और फिर गिरता है और चित्त से चन्द्रमा को देखता है और फिर आता है, इससे जाना कि यह निराकार है; जो साकार होता तो चन्द्रमारूप हो जाता, फिर लौटकर न आता । जैसे जल में डाला हुआ जल फिर नहीं निकलता । इस कारण जानता हूँ कि यह अप्रत्यक्ष अर्थात् निराकार है । हे मुनीश्वर ! अज्ञानी का आशय लेकर मैं पूछता हूँ कि इस शरीर में जो प्राण आते-जाते हैं, वे कैसे आते-जाते हैं ? जो तुम कहो कि संवित्, जो ज्ञानशक्ति है, इस शरीर और प्राण को लिये फिरती है-जैसे मजदूर भार को लिये फिरता है-तो ऐसे कहना ठीक नहीं, क्योंकि संवित् अप्रत्यक्ष निराकार है । अप्रत्यक्ष साकार से नहीं मिलता । तब वह चेष्टा क्योंकर करे ? जो कहो कि निराकार संवित् ही चेष्टा कराती है, तो पुरुष की संवित् चाहती है कि पर्वत नृत्य करे, पर वह तो इसका चलाया नहीं चलता । और कहते हैं कि ये पदार्थ उठ आवें, परन्तु वे तो नहीं उठते, क्योंकि पदार्थ साकार हैं और वृत्ति निराकार है । इसका क्या उत्तर है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस शरीर में एक नाड़ी है । जब वह अवकाशरूपी होती है, तब उसमें से प्राणवायु निकलता है और जब संकोचरूप होती है, तब प्राणवायु भीतर आता है । जैसे लोहार की धौंकनी होती है, वैसे ही इसके भीतर पुरुषबल है, उससे चेष्टा होती है ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! धौंकनी भी तब चलती है तब उसके साथ बल का स्पर्श होता है,और स्पर्श तब होता है, जब प्रत्यक्ष वस्तु होती है । पर चेतनता तो निराकार है । उसको स्पर्श क्योंकर कहिये ? जो तुम कहो कि उसकी इच्छा ही से स्पर्श होता है, तो हे मुनीश्वर ! मैं चाहता हूँ कि मेरे सम्मुख जो वृक्ष है, वह गिर पड़े, पर वह तो नहीं गिरता, क्योंकि