योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1641, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८३८ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
वृक्ष, जड़-चेतन जो कुछ पदार्थ दिखते हैं, वे सब ब्रह्मस्वरूप हैं। उनसे भिन्न कुछ नहीं। हे राम! महाभूत जो वृक्ष, पृथ्वी, आकाश, पहाड़ आदि हैं, ये सब चिदाकाशरूप हैं—चिदाकाश से भिन्न कुछ नहीं। जैसे इन्द्र के पुत्र एक से अनेक हो गये, वैसे ही यह सृष्टि भी एक से अनेक हुई है और प्रलय में अनेक से एक हो जाती है। जैसे एक तुम स्वप्न में अनेक हो जाते हो और सुषुप्ति में अनेक से एक हो जाते हो, वैसे ही यह जगत् भी है। यह अकारण है। यदि इसे सकारण भी मानिये तो आत्मारूपी कुम्हार है, संकल्प चक्र है और अनुभव-चैतन्य-रूपी घट उससे उपजते हैं। आभास भी वही है, कुछ दूसरी वस्तु नहीं। यह सब जगत् वही रूप है। जैसे इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों को अपने अनुभव ही से सृष्टि प्रकट हो आई, और वह अनुभवरूप ही में दिखने लगी, इससे और कुछ न हुई, वैसे ही इस सृष्टि को भी जानो।
हे राम! घट, वृक्ष, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु सब चैतन्यरूप हैं—चैतन्य से भिन्न कुछ नहीं। जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही घट, पहाड़, नदियाँ और पदार्थ होकर दिखता है—अनुभव से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् अनुभव से भिन्न नहीं—ज्ञानी को सदा यही निश्चय रहता है। अब एक-अनेक का उत्तर सुनो। हे राम! जैसे मनोराज्य में एक से अनेक हो जाते हैं और अनेक से एक हो जाता है, एवम् चैतन्य से जड़ हो जाता है, पर जड़ कोई पदार्थ नहीं भाषित होता। सब पदार्थ चैतन्यरूप हैं। जहाँ अन्तःकरण प्रकट होता है वह चैतन्य भाषित होता है, और जहाँ अन्तःकरण नहीं मिलता, वह जड़ दिखता है—चैतन्य का आभास अन्तःकरण में मिलता है, पर जब पुर्यष्टका निकल जाती है, तब जड़ दिखता है। यह अज्ञानी की दृष्टि कही है। पर मुझसे पूछो तो जिनको जड़ कहते हैं, जिनको चेतन कहते हैं, जिनको पहाड़, वृक्ष, पृथ्वी कहते हैं, वे सब ब्रह्मरूप हैं—ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। जैसे स्वप्न में कितने ही जड़ और कितने ही चेतन पदार्थ दिखते हैं, और नाना प्रकार के पदार्थ भिन्न-भिन्न दिखते हैं, पर सब आत्मरूप हैं, भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मरूप है।