योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1642, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८३६
इच्छा, अनिच्छा सब ब्रह्मरूप है । सब नामरूप आत्मा के हैं, और दूसरी वस्तु कुछ नहीं । शून्य, अशून्य, सत्य असत्य, सब आत्मा के नाम हैं-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं ।
हे राम ! मूर्ख जिसको जड़ कहते हैं, वह जड़ नहीं है । सब चैतन्य-रूप हैं । सृष्टिकाल में जड़ ही हैं । वे संवेदन में जड़रूप होकर रचित हुए हैं; वे चैतन्य में रचे हैं । जिसको अपने वास्तव स्वरूप का प्रमाद होता है, उसको ये जड़-चैतन्य भिन्न-भिन्न दिखते हैं, पर जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको एक ब्रह्मसत्ता ही दिखती है । हे राम ! यह जो मैंने तुमको उपदेश किया है, वह बारम्बार विचारने योग्य है । जो कोई इसको नित्य विचारता रहेगा, उसके दोष घटते जावेंगे और हृदय शुद्ध होगा । जो ब्रह्मविद्या को त्यागकर जगत् की ओर चित्त लगावेगा, उसके दोष बढ़ते जावेंगे । हे राम ! ज्यों-ज्यों जीव को ब्रह्मविचार उदय होता जावेगा, त्यों-त्यों दुःख नष्ट होते जावेंगे, जैसे ज्यों-ज्यों दिन का उदय होता है त्यों-त्यों तम नष्ट हो जाता है । विचार के त्यागने से दुःख बढ़ते जाते हैं । जो महापापी हैं, उनके पाप मेरे शास्त्र का अभ्यास न करने देंगे । उनको यह जगत् वज्रसार की नाई दिखता है और संसार-भ्रम कभी निवृत्त नहीं होता । मैं, तुम आदि यह सब जगत् आकाश-रूप हैं । भाव-अभाव आदि सब शब्द ब्रह्मसत्ता के नाम हैं, जो परमशुद्ध, निरामय, अद्वैत और सदा अपने ही आपमें स्थित है । जितने पदार्थ उसमें भासित होते हैं, वे ऐसे हैं, जैसे शिला में शिल्पी जिन पुतलियों की कल्पना करता है, वे सब शिल्पी के चित्त में होती हैं । तैसे ही जगत् के पदार्थों की प्रतिभा जो सब मन में है, वह उसी का किञ्चनरूप है, कुछ भिन्न वस्तु नहीं । वह सदा अपने आपमें स्थित है और परम मौन-रूप है । उसमें विकल्प कोई नहीं प्रवेश कर सकता ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इन्द्राख्यानवर्णनं नाम द्विशताधिकद्विषष्टितमस्सर्गः ॥ २६२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब लोक चिन्मात्र हैं, इसी से शान्त और अद्वैतरूप हैं । अज्ञानी को भिन्न-भिन्न जगत् दिखता है और ज्ञानी को