योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1643, कुल 1734 में से
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सब निराकार और आकाशरूप है। आकार कुछ बने नहीं। आत्मसत्ता निराकार है, और वही परमशुद्धसत्ता इस प्रकार दिखती है। वह शान्त-रूप, अनन्त और चिन्मात्र है। इन्द्रियाँ भी ज्ञानरूप हैं और हाड़, मांस, रुधिर, हाथ, पैर, शिर आदि सम्पूर्ण शरीर भी ज्ञानमात्र है—ज्ञान से भिन्न कुछ नहीं-चिन्मात्र ही इस प्रकार भासित होता है। जैसे स्वप्न में शरीरा-दिक और पहाड़, नदियाँ और वृक्ष जो दिखते हैं, वे अपना ही अनुभव है, कुछ और नहीं बना, वैसे ही यह सब जगत् अनुभवरूप है। यह कारण से रहित कार्य दिखता है। तुम अपने अनुभव में जागकर देखो कि सब अनुभवरूप है। आकाश में आकाश भी आकाशरूप है। सत्य में सत्य है, भाव में भाव है। अभाव में अभाव है। सब आत्मरूप है, भिन्न कुछ नहीं। जो तुम कहो कि वस्तु कारण ही से उत्पन्न होती है सो सत्य होती है, परन्तु जगत् का कारण कहीं नहीं मिलता, इससे यह मिथ्या है, तो कारण भी इसका तब कहिये, जब यह कुछ वस्तु हो और कार्य भी तब कहिये, जब इसका कारण, सत्य हो। हे राम ! ब्रह्मसत्ता तो न किसी का समवाय कारण है और न किसी का निमित्त कारण। वह तो केवल अच्युत है। इसी से समवाय कारण नहीं। और अद्वैत है, इससे निमित्त कारण भी नहीं। वह तो सब इच्छाओं से रहित है। उसको किसका कारण कहिये ? और जब कारण नहीं, तो कार्य किसका हो ? इससे सब जगत् जो दिखता है, वह आभासमात्र है—उसी ब्रह्मसत्ता का नाम जगत् है।
जैसे निद्रा एक है, और उसके दो स्वरूप हैं—एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति। स्फुरणरूप का नाम स्वप्नस्फुरण है और न फुरने के रूप का नाम सुषुप्ति है। वैसे ही चैतन्य के भी दो स्वरूप हैं—स्फुरणरूप चैतन्य का नाम जगत् है और न फुरनेवाले रूप का नाम ब्रह्म है। जैसे एक ही वायु के चलना और ठहरना, दो पर्याय हैं—जब चलती है तब देखने में आती है और जब ठहरती है, तब अलक्ष्य हो जाती है और शब्द का विषय नहीं होती, वैसे ही स्फुरण-रहित ब्रह्मसत्ता में शब्द की प्रवृत्ति नहीं होती। जब फुरती है, तब द्रष्टा, दर्शन और दृश्य, त्रिपुटीरूप