योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1644, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✹ निर्वाण प्रकरण ✹
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होकर भासित होती है और एक से अनेक रूप होकर भासित होती है, अनेक से एक रूप है। जैसे एक ही जल, नदी, नाला, तालाब आदि भिन्न-भिन्न संज्ञा पाता है और जब समुद्र में मिलता है तब एकरूप दिखता है, एवम् जैसे एक ही काल के दिन, मास, वर्ष, युग, कल्प, घड़ी मुहूर्त आदिक बहुत नाम होते हैं, परन्तु काल तो एक ही है; एक मृत्तिका की सेना के हाथी, घोड़े आदि बहुत नाम होते हैं, परन्तु मृत्तिका तो एक ही है; एक वृक्ष के फूल, फल, टास, पत्ते आदि भिन्न-भिन्न नाम होते हैं, परन्तु वृक्ष तो एक ही है, एक जल के तरङ्ग, बुल-बुले, आवर्त, फेन आदि नाम होते हैं, परन्तु जल तो एक ही है; वैसे ही परमात्मा में जगत् अनेक नाम-रूप पाता है, परन्तु सदा एक ही रूप है। जैसे स्वप्न में एक ही अद्वैत अनुभवसत्ता होती है और उसमें भिन्न-भिन्न नामरूप भासित होते हैं, पर जब जागता है, तब अद्वैतरूप होता है, वैसे ही यह जगत् भी भिन्न-भिन्न नाम रूप में भासित होता है, परन्तु आत्मसत्ता एक ही है। हे राम ! जब तुम उसमें जागोगे, तब तुमको सब अपना अनुभव ही भासित होगा, जो केवल आत्मतत्त्वमात्र और अनन्य अनुभवरूप है। आत्मरूपी समुद्र में जगतरूपी जल के कण हैं, जैसे आकाश में नक्षत्र निकलते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् प्रकट होते हैं। तारे तो आकाश से भिन्न हैं, परन्तु जगत् आत्मा से भिन्न नहीं—जैसे जल से बूँद अभिन्न है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सर्वब्रह्मप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकत्रिषष्टितमस्सर्गः ॥ २६३ ॥
श्रीराम ने पूछा, हे भगवन् ! अन्धकार में जो पदार्थ होता है, वह ज्यों का त्यों क्यों नहीं दिखता, पर जब सूर्य का प्रकाश होता है, तब ज्यों का त्यों दिखता है, इसलिए कहता हूँ कि संशयरूपी तम के कारण जगत् ज्यों का त्यों नहीं दिखता। पर तुम्हारे वचनरूपी सूर्य के प्रकाश से जो पदार्थ सत्य है, उसे सम्यक्ज्ञान से जानूँगा। हे भगवन् ! पहले का एक इतिहास है, उसमें मुझको संशय है, उसे दूर कीजिये। एक समय में अध्ययनशाला में विपश्चित् पण्डित से