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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1645, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1645

८४२ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

अध्ययन करता था। वहाँ बहुत ब्राह्मण बैठे थे कि एक ब्राह्मण विदित- वेद, बहुत सुन्दर, वेदान्त सांख्य आदि शास्त्रों के अर्थ का ज्ञाता, बड़ा तपस्वी और ब्रह्म तेज से युक्त मानों दुर्वासा ब्राह्मण है-सभा में आकर परस्पर नमस्कार करके आसन पर बैठा । हम सबने उसको प्रणाम किया । उस समय वेदान्त, सांख्य, योग आदि शास्त्रों की चर्चा चल रही थी । परन्तु उसे देखकर सब चुप हो गये । तब में उससे बोला कि हे ब्राह्मण ! तुम बड़ी दूर से आये हो । तुमने किस पर- मार्थ के निमित्त इतना कष्ट उठाया और तुम कहाँ से आते हो, सो कहो । ब्राह्मण बोला, हे भगवन् ! जो कुछ वृतान्त है, सो में कहता हूँ । हे राम ! विदेहनगर का मैं ब्राह्मण हूँ-वहाँ मैंने जन्म लिया था । कुन्द के श्वेत फूलों के समान मेरे दाँत हैं, इस कारण मेरे माता-पिता ने मेरा नाम कुन्ददन्त रक्खा है । विदेह राजा जनक के नगर से मैं आया हूँ । वह नगर आकाश के स्वर्ग का प्रतिविम्ब सा है । वहाँ रहनेवाले शान्ति- मान् और निर्मल हैं । वहाँ मैं विद्या पढ़ने लगा । मेरा मन उद्विग्न हुआ कि यह संसार महाक्रूर बन्धन है, इसलिए किसी प्रकार इस बन्धन से छूटूँ ।

हे राम ! ऐसा वैराग्य मुझको उत्पन्न हुआ कि किसी प्रकार शान्ति न हुई । तब मैं वहाँ से निकला और जो-जो शुभ स्थान थे, वहाँ विचरने लगा । सन्तों और ऋषियों के स्थान, ठाकुरद्वारे और तीर्थ आदि जो- जो पवित्र स्थान थे, उनका दर्शन किया । वहाँ से आते हुए एक पर्वत मिला । उस पर मैं चढ़ गया और एक उत्तम स्थान पर चिरकाल तक तप किया । फिर वहाँ से एकान्त के लिए चला तो आगे एक आश्चर्य देखा । वही कहता हूँ । हे राम ! मैं वहाँ से चला जाता था कि बड़ा श्याम वन दिखलाई दिया, जो मानों आकाश ही था । वह शून्य और तमरूप था । उस वन में एक वृक्ष मुझको देख पड़ा, जिसके कोमल पत्ते और सुन्दर टहनियाँ थीं । उसमें एक पुरुष लटकता था, जिसके पाँव में मूँज का रस्सा बँधा था । वह वृक्ष से बँधा हुआ था । उसका शीश नीचे, चरण ऊपर और दोनों हाथ छाती पर पड़े हुए थे । तब