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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1646, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1646

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८४३

मैंने विचार किया कि यह मृतक होगा, इसको देखूँ। जब मैं निकट गया, तब उसमें श्वास आती-जाती देखी। उसका शरीर युवा था। वह हृदय से सबका ज्ञाता और शीत, उष्ण, अँधेरी और वर्षा को सह रहा था। हे राम! तब मैंने जाना कि यह तपस्वी है और इसकी शूरवीरता बड़ी है। निदान मैं उसके निकट बैठ गया, और उसके चरण जो बँधे हुए थे, उनको कुछ ढीला किया। फिर उससे मैंने कहा हे साधु! ऐसी कठिन क्रूर तपस्या तुम किस लिए करते हो? अपना वृत्तान्त मुझसे कहो। उसने नेत्र खोलके कहा, हे साधु! यह तप मैं अपनी किसी कामना के लिए करता हूँ, पर वह ऐसी कामना है कि जो तुम उसे सुनोगे तो हँसोगे।

हे राम! जब इस प्रकार उसने कहा, तब मैंने कहा हे साधु! मैं हँसी न करूँगा, तू अपना वृत्तान्त कह। जो कुछ तेरा कार्य हो, वह कह, मैं कर दूँगा। जब मैंने इस प्रकार बारम्बार कहा, तब उसने कहा कि मन को उद्वेग से रहित करके सुनो, मैं कहता हूँ। मैं ब्राह्मण हूँ और मथुरा में मेरा जन्म हुआ है। वहाँ जब मेरी बाल अवस्था व्यतीत हुई और यौवन अवस्था का प्रारम्भ हुआ, तब मैंने वेदों और शास्त्रों को भली प्रकार जाना। पर एक वासना मुझे उदय हुई कि सबसे बड़ा सुख राजा भोगता है, इसलिए मैं राजा होकर सुख भोगूँ कि क्या सुख है, क्योंकि और सुख मैंने भोगे हैं। फिर विचार किया कि राज्य का सुख तो तब भोग सकता हूँ, जब राजा होऊँ, पर राजा क्योंकर हो जाऊँ? राजा तब होता है जब तप करता है। इससे तप करूँ। हे साधु! ऐसे विचारकर मैं तप करने लगा हूँ। द्वादशवर्ष मुझे तप करते व्यतीत हुए हैं, और आगे भी करूँगा। जब तक सप्तद्वीप का राज्य मुझको नहीं प्राप्त होता, तब तक मैं तप करूँगा। मैंने यही निश्चय किया है कि या तो मेरा शरीर ही नष्ट होगा अथवा सप्तद्वीप का राज्य ही मुझको प्राप्त होगा। यही मेरा निश्चय है, सो मैंने तुमसे कहा। अब जहाँ जाने की तुमको इच्छा हो, वहाँ जाओ। हे राम! इस प्रकार कहकर उस तपस्वी ने फिर नेत्र मूँदकर चित्त स्थित करने को समाधि लगाई

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