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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1647, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1647

=८४ ❄ योगवासिष्ठ ❄

और इन्द्रियों से विषयों का त्याग कर मन निश्चल किया। तब मैंने उससे कहा कि हे मुनीश्वर ! मैं भी तुम्हारे पास बैठा हूँ, जब तक तुम्हें वर की प्राप्ति नहीं होती, तब तक मैं तुम्हारी सेवा-टहल करूँगा। मुझे तुम्हारे ऊपर दया आई है।

हे राम ! इस प्रकार उससे कहकर मैं उद्वेग से रहित छः महीने तक उसके पास बैठा रहा और उसकी रक्षा करता रहा। जब धूप आवे तो छाया करता था, आँधी और वर्षा में अपने शरीर को कष्ट देकर भी उसे बचाता था। निदान छः महीने बीते, तब सूर्य के मण्डल से एक पुरुष निकला, जो बड़ा तेजस्वी—जैसे विष्णु भगवान् का तेज था। वह मेरे निकट आया। उसे देखकर मैंने मन, वाणी और शरीर, तीनों से उसकी पूजा की। तब उस पुरुष ने कहा, हे तपस्वी ! अब इस तप को त्याग और जो कुछ इच्छा हो सो माँग। तेरी इच्छा तो यही है कि मैं सप्तद्वीपों का राजा होऊँ। सो तू सप्तद्वीप पृथ्वी का राजा और जन्म में होगा और सप्त सहस्रवर्ष तक राज्य करेगा। परन्तु यह और शरीर से होगा। हे राम ! इस प्रकार कहकर वह पुरुष सूर्य के मण्डल में अन्तर्धान हो गया। जैसे समुद्र से तरङ्ग निकलकर लय हो जावे, वैसे ही वह लीन हुआ। तब मैंने उससे कहा, हे ब्राह्मण ! अब तुम क्यों कष्ट सहते हो ? जिस लिए तुम तप करते थे वह वर तो तुमको प्राप्त हुआ—अब क्यों कष्ट सहते हो ? हे राम ! जब इस प्रकार मैंने कहा कि सूर्य के मण्डल से निकलकर एक बड़ा तेजस्वी पुरुष तुमको वर दे गया है, तब उसने नेत्र खोल दिये। मैंने उसके चरणों में रस्सी खोल दी। उसका तेज उस समय बड़ा हो गया और उसके शरीर की कान्ति प्रकाशयुक्त हुई।

उस स्थान के निकट एक जल से रहित तालाब था, वह उसके पुण्य से जल पूर्ण हो गया। उसमें हम दोनों ने स्नान किया और मन्त्र पाठ करके सन्ध्या की। फिर हम दोनों वृक्ष के नीचे आये। जो वृक्ष फल में रहित थे, वे उसकी पुण्यवासना से फल से पूर्ण हो गये। निदान उन फलों को हमने खाया और तीन दिन तक वहाँ रहकर फिर चले।