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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1648, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1648

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">८४५</span>

तब वह बोला, हे साधु ! हम देश को जाते हैं। जबतक शरीर है; तब- तक शरीर के स्वभाव भी है । फिर आगे एक वन आया, जिसमें बहुत सुन्दर फूल, फल और बूटे लगे हुए थे और उन पर भौंरे विचरते थे, जल के प्रवाह बहते थे । कोयल, तोते, बगले आदि पक्षियों से युक्त वृक्ष हमने देखे । आगे फिर ताड़ के वृक्ष बहुत देखे । जो जो स्थान आये, उन्हें हम नाँघते गये । हे राम ! इसी प्रकार हम राजसी, तामसी और सात्त्विकी, तीनों गुणों के रचे स्थानों को नाँघते-नाँघते मथुरानगर के मार्ग पर आये, जो सीधा था । पर उसको छोड़कर वह टेढ़े मार्ग को चला । तब मैंने कहा, हे साधु ! सीधे मार्ग को छोड़कर तू टेढ़े मार्ग से क्यों चलता है ? उसने कहा, हे साधु ! चला आ, इस मार्ग में भगवती गौरी का स्थान है । उनका दर्शन करते चलें । मेरे और सात भाई जो गौरी के स्थान पर इसी कामना को लेकर तप करते थे, उनकी भी सुध लें । हे राम ! जब हम उस मार्ग के सम्मुख चले, तब आगे एक महाशून्य वन आया, जो मानो शून्य आकाश था । वहाँ बड़ा अंधकार था । वहाँ वृक्ष, पशु, पक्षी और मनुष्य कोई न दिखता था । उस वन में पहुँचकर उसने मुझसे कहा, हे ब्राह्मण ! इस स्थान में मैं आगे छः मास रहा हूँ । मेरे सात भाई और थे । उन्होंने भी यही कामना करके देवी का तप आरम्भ किया था । चलो देखें । वह महापवित्र स्थान है, जिसके दर्शन से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं । तब मैंने कहा, चलिये, पवित्र स्थान को अवश्य देखना चाहिए । हे राम ! ऐसे विचार कर हम चले और जाते-जाते मरुस्थल की तपी हुई पृथ्वी पर जा निकले । तब वह ब्राह्मण यह देखकर गिर पड़ा और कहने लगा कि "हा कष्ट-कष्ट ! हम कहाँ आ पड़े !" तब तो मुझको भी भ्रम हुआ कि यह क्या हुआ ।

निदान वह फिर उठा । दोनों आगे गये तो एक वृक्ष हमको देख पड़ा । उसके नीचे एक तपस्वी ध्यान में बैठा था । हम उसके निकट गये और कहा, हे मुनीश्वर ! जागो, जागो । जब हमने बहुत बार कहा, तब उसने नेत्र खोलकर हमको देखा और कहा, तुम कौन हो ? ऐसे कहकर फिर कहा—बहुत आश्चर्य है कि यहाँ गौरी का स्थान था, वह