योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1649, कुल 1734 में से
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कहाँ गया ? वृक्ष, बावलियाँ, कमल और सुन्दर स्थान और बड़े ऋषी- श्वर और मुनीश्वरों के स्थान थे, वे कहाँ गये ? हे साधु ! यह क्या आश्चर्य हुआ, सो तुम कहो ? तब हमने कहा, हे मुनीश्वर ! हम नहीं जानते, हम तो अभी आये हैं । इसको तो तुम्हीं जानों । तब उसने कहा—बड़ा आश्चर्य है । हे राम ! ऐसे कहकर वह फिर ध्यान में स्थित हो गया और व्यतीत वृत्तान्त को ध्यान करके देखने लगा । एक मुहूर्त पर्यन्त देखकर उसने फिर नेत्र खोलकर कहा कि बड़ा आश्चर्य हुआ है । तब हमने कहा, हे भगवन् ! जो कुछ वृत्तान्त हुआ है, सो कृपा करके हमसे कहो । तब तपस्वी ने कहा, हे साधु ! एक समय वागीश्वरी भवानी इस वन में आई और उन्होंने रहने का एक स्थान बनाया, जिसमें वह शिव का अर्धशरीर गौरी रही । उस स्थान के निकट बहुत सुन्दर कल्पवृक्ष, तमालवृक्ष, कदम्बवृक्ष इत्यादि बहुत वृक्ष लगाये, कमलफूल आदि सब ऋतुओं के फूल लगाये और बावलियाँ और बगीचे अति रमणीय रचे, जिन पर कोयल, भँवरे, तोते, मोर, बगले आदि पक्षी विश्राम और शब्द करने लगे । उनके निकट इन्द्र के नन्दनवन सदृश ऋषीश्वरों, मुनीश्वरों और तपस्वियों की कुटियाँ थीं । निकट में गाँव की बस्ती बहुत हुई । हे साधु ! यहाँ आठ ब्राह्मण तप के लिए आये थे और वे छः महीने यहीं रहे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मगीतागौर्युद्यानवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुःषष्टितमस्सर्गः ॥ २६४ ॥
कदम्ब बोले, हे साधु ! मुझसे पूछो तो अपना वृत्तान्त मैं कहता हूँ । मैं मालव देश का राजा था और खेद से रहित मैंने चिरकाल तक विषयभोग भोगे । तब मुझको यह विचार आया कि यह संसार स्वप्न- मात्र है । और इसको सत्य जानना मूर्खता है । इतनी मेरी आयु बीती, पर मैंने सुकृत कुछ न किया । ये विषयभोग आपातरमणीय और नाशवान् हैं । इनको मैं चिरकाल तक भोगता रहा हूँ, पर मुझको शान्ति न प्राप्त हुई—तृष्णा बढ़ती गई—इससे वही उपाय करूँ, जिससे मुझको शान्ति मिले और फिर कभी दुखी न होऊँ । हे साधु ! जब यह