योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1650, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ =४७
विचार मुझको उदय हुआ, तब मैंने वैराग्य धारणकर राज्य की लक्ष्मी त्याग की और ऋषि और मुनियों के स्थान देवता इस कदम्बवृक्ष के नीचे आया। यहाँ आठ भाई ब्राह्मण आये थे। उनमें से एक यह तो इसी पर्वत पर तप करने लगा था; दूसरा स्वामिकार्त्तिक के पर्वत पर तप करने गया; तीसरा काशी में तप करने लगा और चौथा हिमालय पर तप करने गया। चार भाई तो इस प्रकार चारों स्थानों को गये और चार भाई यहीं तप करने लगे। उन सबकी यही कामना थी कि हम पृथ्वी के सातों द्वीपों के राजा हों। हे साधु! इसको तो सूर्य ने वर दिया है, और बाकी जो सात थे, उन्होंने वागीश्वरी भवानी का इष्ट करके तप किया। जब वह प्रसन्न हुईं और बोलीं कि वर माँगो, तब उन्होंने कहा कि हम सप्तद्वीप पृथ्वी के राजा हों।
निदान उन सातों ने एक ही वर माँगा। उनको वर देकर परमेश्वरी अन्तर्धान हो गईं। उन्होंने यह भी वर माँगा था कि यहाँ के निवासियों का स्थान भी हमारे पास हो। हे साधु! इस वर को पाकर वे वहाँ से चले और अपने घर गये। वागीश्वरी वहाँ बारह वर्ष तक रहकर फिर उनकी मर्यादा थापने के लिए यहाँ से अन्तर्धान हो गईं, और यहाँ के निवासी भी सब जाते रहे। वागीश्वरी के जाने से यह स्थान शून्य हो गया। एक यह कदम्ब का वृक्ष रह गया है और मैं ध्यान में स्थित रहा हूँ। यह कदम्ब का वृक्ष वागीश्वरी ने अपने हाथ से लगाया था, इस कारण यह नष्ट नहीं हुआ और जर्जर भी नहीं हुआ। हे साधु! और सब जीव यहाँ आकर अदृष्ट हो गये, इस कारण सब शुभ आचार न रहे। उन आठों भाइयों में सात आगे गये हैं और एक यह बैठा है। इसको भी घर जाना है। वहाँ सब इकट्ठे होंगे, जैसे अष्टवसु ब्रह्मपुरी में एकत्र हों।
हे साधु! जब वे घर से तप करने के लिए निकले, तब उनकी स्त्रियों ने विचार किया कि हमारे भर्त्ता तो तप करने गये हैं, हम भी जाकर तप करें। इसलिए उन आठों ने तप आरम्भ किया और सौ सौ चन्द्रायणव्रत किये। तब उनका शरीर जैसे वसन्तऋतु की मञ्जरी जेठ आषाढ़ में कृश हो जाती है, वैसा ही हो गया। एक तो भर्त्ता का