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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1651, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1651

८४= ☀ योगवाशिष्ठ ☀

वियोग. दूसरे तप से वे कृश हो गई। तब पार्वती वागीश्वरी प्रसन्न हुई और बोलीं कि कुछ वर माँगो। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होकर बोलता है, वैसे ही वे प्रसन्न होकर बोलीं, हे देवताओं की ईश्वरी ! हम यह वर माँगती हूँ कि हमारे भर्त्ता अमर हों और जैसे तुम्हारा और शिव का संयोग है, वैसे ही हमारा और उनका हो। तब भवानी ने कहा, हे सुभद्रे ! इस शरीर से तो कोई अमर नहीं होता। आदि में जो सृष्टि हुई है, उसमें नीति हुई है कि शरीर में कोई अमर न रहेगा। जितना कुछ जगत् देखता हो, वह सब नाशवान् है। कोई पदार्थ स्थिर नहीं रहता। इसलिए और कुछ वर माँगो। तब ब्राह्मणियों ने कहा, हे देवि ! अच्छा, जो हमारे भर्त्ता मरें तो उनके जीव हमारे घर में रहें और उनकी संवित् बाहर न जाय, तब वागीश्वरी ने कहा, ऐसा ही होगा। उनके जीव तुम्हारे ही घर में रहेंगे और उनको जो लोकान्तर भासित होगा, उसके साथ ही तुम भी उनकी स्त्री होकर रहोगी। ऐसे कहकर वागीश्वरी अन्तर्धान हो गई। कुन्ददन्त बोले, हे राम ! यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। तब मैंने कहा, हे मुनीश्वर ! यह तो तुमने बड़े आश्चर्य की कथा सुनाई कि आठों भाइयों ने एक ही वर पाया। उनको एक पृथ्वी में सातौं द्वीपों का राज्य क्योंकर प्राप्त होगा ? हे राम ! जब इस प्रकार उससे मैंने पूछा तब कदम्बतपा ने कहा, हे साधु ! यह क्या आश्चर्य है, और आश्चर्य सुनो।

हे ब्राह्मण ! जब ये आठों भाई तप के लिए घर से निकले तब उनके पिता-माता ने भी विचार किया कि हमारे पुत्र तो तप करने गये हैं, इसलिए हम भी उनके लिए जाकर तप करें, और उनकी स्त्रियों को अपने साथ लेकर तीर्थ और ठाकुरद्वारे दिखाते फिरें। निदान उन्होंने भी बैठकर तप किया और चान्द्रायणव्रत करके देवी को प्रसन्न किया। देवी से वर लेकर जब वे अपने घर को आने लगे, तब एक स्थान में दुर्वासा ऋषीश्वर बैठे थे, जिनके दुर्बल अंग और विभूति लगी थी और जटा खुली हुई थी। उनको देखकर वे पास से ही चले गये, पर उन्हें नमस्कार न किया। तब उन्होंने कहा, हे ब्राह्मण ! तुम क्यों दुष्ट स्वभाव से हमारे पास से चले गये और हमको नमस्कार भी न किया ?