योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1652, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇
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अब तुम्हारा वर निवृत्त होगा। जो वर तुमको प्राप्त हुआ है वह न फलेगा, उसके विपरीत हो जावेगा। तब उन्होंने कहा, हे मुनीश्वर ! यह तुम कैसे कहते हो ? हमारे ऊपर क्षमा करो। ये ऐसे ही कह रहे थे कि वह अन्तर्धान हो गये और ब्राह्मण अपने घर में आये और शोकग्रस्त हुए। हे ब्राह्मण ! देखो, जब तक आत्मबोध से शून्य है, तब तक अनेक दुःख उपजेंगे; कई प्रकार के आश्चर्य भासित होंगे और सन्देह दूर न होगा। जब आत्मबोध होगा, तब कोई आश्चर्य न भासित होगा। हे ब्राह्मण ! यह सब चिदाकाश में मायामात्र ही रचना बनती है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्राह्मणकथावर्णनं नाम द्विशताधिकपञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ २६५ ॥
कुन्ददन्त ने कहा, हे भगवन् ! मुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ है। मुझे एक संशय उत्पन्न हुआ है, उसे निवृत्त कीजिये। तुमने कहा कि एक द्वीप में आठों इकट्ठे सप्तद्वीप के राजा होंगे। पर सातों द्वीप तो एक ही हैं, और राज्य करनेवाले आठ हैं, ये कैसे राज्य करेंगे ? और इन्होंने वर और शाप दोनों पाये हैं, ये इकट्ठे क्योंकर होंगे ? जैसे धूप और छाया, दिन और रात्रि इकट्ठे होने कठिन हैं, वैसे ही वर और शाप एक होने कठिन हैं। कदम्बतपा बोले, हे साधु ! जो कुछ इनका भविष्य है, वह मैं कहता हूँ। जब कुछ काल गृहस्थी में व्यतीत होगा, तब इनके शरीर छूट जावेंगे, और इनको कुटुम्बी जला देंगे। इनकी पुर्यष्टका अनुभव से मिली हुई है, इस कारण एक मुहूर्त तक इनको जड़ीभूत सुपुप्ति होगी। उसके बाद चेतनता जग आवेगी। तब शंख, चक्र, गदा, पद्म सहित चतुर्भुज विष्णु का रूप रखकर वरदान आवेंगे, और त्रिनेत्र, हाथ में त्रिशूल लिये और भ्रुकुटी चढ़ाये क्रोधित सदाशिव का रूप धारण कर शाप आवेंगे।
वर कहेंगे कि हे शाप ! तुम क्यों आये हो ? अब तो हमारा समय है। जैसे एक ऋतु के समय में ऋतु दूसरी नहीं आती, वैसे ही तुम न आओ। तब शाप कहेंगे, हे वर ! तुम क्यों आये हो, अब तो हमारा