योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
८४६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
कहाँ गया ? वृक्ष, बावलियाँ, कमल और सुन्दर स्थान और बड़े ऋषी- श्वर और मुनीश्वरों के स्थान थे, वे कहाँ गये ? हे साधु ! यह क्या आश्चर्य हुआ, सो तुम कहो ? तब हमने कहा, हे मुनीश्वर ! हम नहीं जानते, हम तो अभी आये हैं । इसको तो तुम्हीं जानों । तब उसने कहा—बड़ा आश्चर्य है । हे राम ! ऐसे कहकर वह फिर ध्यान में स्थित हो गया और व्यतीत वृत्तान्त को ध्यान करके देखने लगा । एक मुहूर्त पर्यन्त देखकर उसने फिर नेत्र खोलकर कहा कि बड़ा आश्चर्य हुआ है । तब हमने कहा, हे भगवन् ! जो कुछ वृत्तान्त हुआ है, सो कृपा करके हमसे कहो । तब तपस्वी ने कहा, हे साधु ! एक समय वागीश्वरी भवानी इस वन में आई और उन्होंने रहने का एक स्थान बनाया, जिसमें वह शिव का अर्धशरीर गौरी रही । उस स्थान के निकट बहुत सुन्दर कल्पवृक्ष, तमालवृक्ष, कदम्बवृक्ष इत्यादि बहुत वृक्ष लगाये, कमलफूल आदि सब ऋतुओं के फूल लगाये और बावलियाँ और बगीचे अति रमणीय रचे, जिन पर कोयल, भँवरे, तोते, मोर, बगले आदि पक्षी विश्राम और शब्द करने लगे । उनके निकट इन्द्र के नन्दनवन सदृश ऋषीश्वरों, मुनीश्वरों और तपस्वियों की कुटियाँ थीं । निकट में गाँव की बस्ती बहुत हुई । हे साधु ! यहाँ आठ ब्राह्मण तप के लिए आये थे और वे छः महीने यहीं रहे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मगीतागौर्युद्यानवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुःषष्टितमस्सर्गः ॥ २६४ ॥
कदम्ब बोले, हे साधु ! मुझसे पूछो तो अपना वृत्तान्त मैं कहता हूँ । मैं मालव देश का राजा था और खेद से रहित मैंने चिरकाल तक विषयभोग भोगे । तब मुझको यह विचार आया कि यह संसार स्वप्न- मात्र है । और इसको सत्य जानना मूर्खता है । इतनी मेरी आयु बीती, पर मैंने सुकृत कुछ न किया । ये विषयभोग आपातरमणीय और नाशवान् हैं । इनको मैं चिरकाल तक भोगता रहा हूँ, पर मुझको शान्ति न प्राप्त हुई—तृष्णा बढ़ती गई—इससे वही उपाय करूँ, जिससे मुझको शान्ति मिले और फिर कभी दुखी न होऊँ । हे साधु ! जब यह
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ =४७
विचार मुझको उदय हुआ, तब मैंने वैराग्य धारणकर राज्य की लक्ष्मी त्याग की और ऋषि और मुनियों के स्थान देवता इस कदम्बवृक्ष के नीचे आया। यहाँ आठ भाई ब्राह्मण आये थे। उनमें से एक यह तो इसी पर्वत पर तप करने लगा था; दूसरा स्वामिकार्त्तिक के पर्वत पर तप करने गया; तीसरा काशी में तप करने लगा और चौथा हिमालय पर तप करने गया। चार भाई तो इस प्रकार चारों स्थानों को गये और चार भाई यहीं तप करने लगे। उन सबकी यही कामना थी कि हम पृथ्वी के सातों द्वीपों के राजा हों। हे साधु! इसको तो सूर्य ने वर दिया है, और बाकी जो सात थे, उन्होंने वागीश्वरी भवानी का इष्ट करके तप किया। जब वह प्रसन्न हुईं और बोलीं कि वर माँगो, तब उन्होंने कहा कि हम सप्तद्वीप पृथ्वी के राजा हों।
निदान उन सातों ने एक ही वर माँगा। उनको वर देकर परमेश्वरी अन्तर्धान हो गईं। उन्होंने यह भी वर माँगा था कि यहाँ के निवासियों का स्थान भी हमारे पास हो। हे साधु! इस वर को पाकर वे वहाँ से चले और अपने घर गये। वागीश्वरी वहाँ बारह वर्ष तक रहकर फिर उनकी मर्यादा थापने के लिए यहाँ से अन्तर्धान हो गईं, और यहाँ के निवासी भी सब जाते रहे। वागीश्वरी के जाने से यह स्थान शून्य हो गया। एक यह कदम्ब का वृक्ष रह गया है और मैं ध्यान में स्थित रहा हूँ। यह कदम्ब का वृक्ष वागीश्वरी ने अपने हाथ से लगाया था, इस कारण यह नष्ट नहीं हुआ और जर्जर भी नहीं हुआ। हे साधु! और सब जीव यहाँ आकर अदृष्ट हो गये, इस कारण सब शुभ आचार न रहे। उन आठों भाइयों में सात आगे गये हैं और एक यह बैठा है। इसको भी घर जाना है। वहाँ सब इकट्ठे होंगे, जैसे अष्टवसु ब्रह्मपुरी में एकत्र हों।
हे साधु! जब वे घर से तप करने के लिए निकले, तब उनकी स्त्रियों ने विचार किया कि हमारे भर्त्ता तो तप करने गये हैं, हम भी जाकर तप करें। इसलिए उन आठों ने तप आरम्भ किया और सौ सौ चन्द्रायणव्रत किये। तब उनका शरीर जैसे वसन्तऋतु की मञ्जरी जेठ आषाढ़ में कृश हो जाती है, वैसा ही हो गया। एक तो भर्त्ता का
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वियोग. दूसरे तप से वे कृश हो गई। तब पार्वती वागीश्वरी प्रसन्न हुई और बोलीं कि कुछ वर माँगो। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होकर बोलता है, वैसे ही वे प्रसन्न होकर बोलीं, हे देवताओं की ईश्वरी ! हम यह वर माँगती हूँ कि हमारे भर्त्ता अमर हों और जैसे तुम्हारा और शिव का संयोग है, वैसे ही हमारा और उनका हो। तब भवानी ने कहा, हे सुभद्रे ! इस शरीर से तो कोई अमर नहीं होता। आदि में जो सृष्टि हुई है, उसमें नीति हुई है कि शरीर में कोई अमर न रहेगा। जितना कुछ जगत् देखता हो, वह सब नाशवान् है। कोई पदार्थ स्थिर नहीं रहता। इसलिए और कुछ वर माँगो। तब ब्राह्मणियों ने कहा, हे देवि ! अच्छा, जो हमारे भर्त्ता मरें तो उनके जीव हमारे घर में रहें और उनकी संवित् बाहर न जाय, तब वागीश्वरी ने कहा, ऐसा ही होगा। उनके जीव तुम्हारे ही घर में रहेंगे और उनको जो लोकान्तर भासित होगा, उसके साथ ही तुम भी उनकी स्त्री होकर रहोगी। ऐसे कहकर वागीश्वरी अन्तर्धान हो गई। कुन्ददन्त बोले, हे राम ! यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। तब मैंने कहा, हे मुनीश्वर ! यह तो तुमने बड़े आश्चर्य की कथा सुनाई कि आठों भाइयों ने एक ही वर पाया। उनको एक पृथ्वी में सातौं द्वीपों का राज्य क्योंकर प्राप्त होगा ? हे राम ! जब इस प्रकार उससे मैंने पूछा तब कदम्बतपा ने कहा, हे साधु ! यह क्या आश्चर्य है, और आश्चर्य सुनो।
हे ब्राह्मण ! जब ये आठों भाई तप के लिए घर से निकले तब उनके पिता-माता ने भी विचार किया कि हमारे पुत्र तो तप करने गये हैं, इसलिए हम भी उनके लिए जाकर तप करें, और उनकी स्त्रियों को अपने साथ लेकर तीर्थ और ठाकुरद्वारे दिखाते फिरें। निदान उन्होंने भी बैठकर तप किया और चान्द्रायणव्रत करके देवी को प्रसन्न किया। देवी से वर लेकर जब वे अपने घर को आने लगे, तब एक स्थान में दुर्वासा ऋषीश्वर बैठे थे, जिनके दुर्बल अंग और विभूति लगी थी और जटा खुली हुई थी। उनको देखकर वे पास से ही चले गये, पर उन्हें नमस्कार न किया। तब उन्होंने कहा, हे ब्राह्मण ! तुम क्यों दुष्ट स्वभाव से हमारे पास से चले गये और हमको नमस्कार भी न किया ?
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
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अब तुम्हारा वर निवृत्त होगा। जो वर तुमको प्राप्त हुआ है वह न फलेगा, उसके विपरीत हो जावेगा। तब उन्होंने कहा, हे मुनीश्वर ! यह तुम कैसे कहते हो ? हमारे ऊपर क्षमा करो। ये ऐसे ही कह रहे थे कि वह अन्तर्धान हो गये और ब्राह्मण अपने घर में आये और शोकग्रस्त हुए। हे ब्राह्मण ! देखो, जब तक आत्मबोध से शून्य है, तब तक अनेक दुःख उपजेंगे; कई प्रकार के आश्चर्य भासित होंगे और सन्देह दूर न होगा। जब आत्मबोध होगा, तब कोई आश्चर्य न भासित होगा। हे ब्राह्मण ! यह सब चिदाकाश में मायामात्र ही रचना बनती है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्राह्मणकथावर्णनं नाम द्विशताधिकपञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ २६५ ॥
कुन्ददन्त ने कहा, हे भगवन् ! मुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ है। मुझे एक संशय उत्पन्न हुआ है, उसे निवृत्त कीजिये। तुमने कहा कि एक द्वीप में आठों इकट्ठे सप्तद्वीप के राजा होंगे। पर सातों द्वीप तो एक ही हैं, और राज्य करनेवाले आठ हैं, ये कैसे राज्य करेंगे ? और इन्होंने वर और शाप दोनों पाये हैं, ये इकट्ठे क्योंकर होंगे ? जैसे धूप और छाया, दिन और रात्रि इकट्ठे होने कठिन हैं, वैसे ही वर और शाप एक होने कठिन हैं। कदम्बतपा बोले, हे साधु ! जो कुछ इनका भविष्य है, वह मैं कहता हूँ। जब कुछ काल गृहस्थी में व्यतीत होगा, तब इनके शरीर छूट जावेंगे, और इनको कुटुम्बी जला देंगे। इनकी पुर्यष्टका अनुभव से मिली हुई है, इस कारण एक मुहूर्त तक इनको जड़ीभूत सुपुप्ति होगी। उसके बाद चेतनता जग आवेगी। तब शंख, चक्र, गदा, पद्म सहित चतुर्भुज विष्णु का रूप रखकर वरदान आवेंगे, और त्रिनेत्र, हाथ में त्रिशूल लिये और भ्रुकुटी चढ़ाये क्रोधित सदाशिव का रूप धारण कर शाप आवेंगे।
वर कहेंगे कि हे शाप ! तुम क्यों आये हो ? अब तो हमारा समय है। जैसे एक ऋतु के समय में ऋतु दूसरी नहीं आती, वैसे ही तुम न आओ। तब शाप कहेंगे, हे वर ! तुम क्यों आये हो, अब तो हमारा
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❇ योगवासिष्ठ ❇
समय है । जैसे एक ऋतु के होते दूसरे का आना नहीं होता, वैसे । तुम्हारा आना ठीक नहीं । तब वर कहेंगे, हे शाप ! तुम्हारा क ऋषि मनुष्य है, और हमारा कर्त्ता देवता । मनुष्य के देवता पूजनी हैं, क्योंकि बड़े हैं, इससे तुम जाओ । जब इस प्रकार वर कहेंगे, त शाप क्रोधित होंगे और मारने के लिए त्रिशूल हाथ में उठावेंगे, त वर कहेंगे, हे शाप ! यदि तुम और हम लड़ेंगे तो पीछे किसी वृ न्यायकर्त्ता के पास जावेंगे, जो हमारा न्याय चुका देगा । इससे प्रथ ही क्यों न जावें, तब शाप कहेंगे, हे वर ! जो कोई युक्तिसहित वचन कहता है, उसे सब कोई मानते हैं । तुमने अच्छा कहा, चलो । ऐसे चर्चा करके दोनों ब्रह्मपुरी में जावेंगे और ब्रह्माजी को प्रणाम करेंगे फिर सब वृत्तान्त कहकर कहेंगे, हे देव ! हमारा न्याय करो । उन ब्राह्मणों को वर स्पर्श करे अथवा शाप स्पर्श करे ? तब ब्रह्माजी कहेंगे, हे साधु ! जिसका अभ्यास उनके भीतर दृढ़ हो, वह प्रवेश करे । तब वर के स्थान शाप जाकर ढूँढ़ेंगे और शाप के स्थान वर जाकर ढूँढ़ेंगे और ढूँढ़कर शाप आकर कहेंगे, हे स्वामी ! हमारी हार हुई और वरों की जय हुई, क्योंकि उनके भीतर वर ही स्थित है । जिसका अभ्यास हृदय में स्थित है, उसी की जय होती है । सो इनके भीतर वज्रसार की नाईं वर स्थित है । हे स्वामी ! हमारा आधिभौतिक शरीर कोई नहीं; हम तो संकल्प- रूप हैं । जिस संकल्प की दृढ़ता होती है, वही उदय होता है । वर का दाताभी भी ज्ञानमात्र होता है; वर को लेता भी वही ज्ञानरूप है और वर को ग्रहण करनेवाला जानता है कि यह हमारा स्वामी है । उस संकल्प से वर का कर्त्ता देवता जानता है कि मैंने वर दिया है और ग्रहण करनेवाला जानता है कि मैंने वर लिया है । हे ईश्वर ! उनका जो वररूप संकल्प है, वह उनके निश्चय में दृढ़ हो जाता है । जिस संकल्प की संवित् से एकता होती है, वही प्रकट होता है । इसी प्रकार शाप भी है । परन्तु न कोई वर है, न शाप है । दोनों संकल्परूप हैं । जैसा संकल्प का अनुभव आकाश में दृढ़ होता है, वही भासित होता है । वर देने वाला भी अनुभवसत्ता है, और लेनेवाला भी आत्मसत्ता
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८५१
है। वही सत्ता वररूप होती है और वही सत्ता शापरूप होती है। जिस संकल्प की दृढ़ता होती है, उसी का अनुभव होता है। हे स्वामी! यह तुमसे सुना हुआ हम कहते हैं कि जीव को कोई बाहर का कर्म फलदायक नहीं होता, जो कुछ भीतर सार होता है, वही फल होता है। इनके भीतर तो वर का संकल्प दृढ़ है, और हमारा नहीं है। अब आप को हमारा नमस्कार है—अब हम जाते हैं।
हे कुन्ददन्त! इस प्रकार शाप आधिभौतिक शरीर त्यागकर अन्त-वाहक शरीर से अन्तर्धान हो जावेंगे। जैसे आकाश में भ्रम से तरुवर दिखें और सम्यक्ज्ञान से अन्तर्धान हो जावें, वैसे ही शाप अन्तर्धान हो जावेंगे। तब ब्रह्माजी कहेंगे, हे वर! तुम शीघ्र उनके पास जाओ। तब वह वर और दूसरा वर, जो उनकी स्त्रियों ने पाया था कि उनकी पुर्यष्टका अन्तःपुर में रहे, फिर पूछेंगे कि हे भगवन्! हमको क्या आज्ञा है? हमको तो उनको उसी मन्दिर में रखना है, उनको सप्तद्वीप पृथ्वी का राज्य भी भोगना है और दिग्विजय करना है। यह कैसे होगा? तब ब्रह्माजी कहेंगे, हे साधु! यह क्या है? जो उन्हें सप्तद्वीप की पृथ्वी का राज्य करना है तो उनका तुम्हारे साथ कुछ विरोध नहीं। तुमको उसी मन्दिर में उनकी पुर्यष्टका रखनी है और वहीं राज्य भोग कराना है, इसलिए जो कुछ तुम्हारा स्वभाव है, वही करना। कुन्ददन्त ने पूछा, हे भगवन्! इससे तो हमको यह बड़ा संशय उत्पन्न हुआ कि उसी मन्दिर में आठों भाई सप्तद्वीप पृथ्वी का राज्य कैसे करेंगे? इतनी पृथ्वी उस मन्दिर में क्योंकर समायगी, यही आश्चर्य है? जैसे कोई कहे कि कमल के फूल की कली में हाथी शयन करे, या उसमें हाथियों की पंक्ति है तो यह आश्चर्य होगा, वैसे ही यह भी आश्चर्य की बात है। ब्राह्मण बोले, हे साधु! आकाश ब्रह्मरूपी है। उसके अणु का जो सूक्ष्म अणु है, उसमें जो स्वप्न जगा है, वह हमारा जगत् है। यदि स्वप्न में यह सृष्टि समा रही है, तो उस मन्दिर में उसका समाना क्या आश्चर्य है?
हे साधु! यह सब जगत् स्वप्नमात्र है, और अहंत्व आदिक सब जगत्
८५२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
स्वप्ननिद्रा में फुरता है। आत्मसत्ता सदा अद्वैत, परमशान्त और अनन्त है। उसमें जगत् आभासमात्र है। जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही सूक्ष्म से सूक्ष्म होता है, और उसमें त्रिलोकी भासित होती है। यदि सूक्ष्म संवित् में त्रिलोकी भासित होती है तो मन्दिर में उसका भासित होना क्या आश्चर्य है? हे साधु! जब यह पुरुष मर जाता है, तब इसकी सूक्ष्म पुर्यष्टका जड़ हो जाती है, और उसमें फिर त्रिलोकी जग आती है। तुम देखो कि यदि सूक्ष्म ही में भासित होती है और अति परमसूक्ष्म में सृष्टि बन जाती है तो मन्दिर में ऐसा होना क्या आश्चर्य है। हे साधु! यह सब जगत् जो दिखता है, वह आत्मा में स्थित है, और उसका किञ्चन इस प्रकार भासित होता है। अब तुम जाओ, उनको राज्य भोग कराओ। हे कुन्ददन्त! जब इस प्रकार ब्रह्माजी कहेंगे, तब वर नमस्कार करके आधिभौतिक शरीर त्याग देंगे और आन्तवाहक शरीर से उनके हृदय में स्थित होंगे। जैसे एक शत्रु को दूर करके दूसरा स्थित हो वैसे ही शाप को दूर करके उनके हृदय में वर आकर स्थित हुए। तब उनको त्रिलोकी भासित होने लगी और पुर्यष्टका को अन्तःपुर में वर ने रोक छोड़ा। जैसे बाँध जल को रोकता है, वैसे ही उनकी पुर्यष्टका को वर ने रोका। हे कुन्ददन्त! इस प्रकार उनको अपने अन्तःकरण में सृष्टि भासित हुई, और उन्होंने जाना कि हम सातों द्वीप के राजा हुए हैं। इस प्रकार आठों उस अन्तःपुर में सातों द्वीप पृथ्वी के राजा हुए, परन्तु परस्पर अज्ञात रहे। एक सप्तद्वीप का राजा हुआ और जम्बूद्वीप में जो उज्जैननगर है, वह उसकी राजधानी हुई। दूसरा कुशद्वीप में रहने लगा। तीसरा क्रौंचद्वीप में रहने लगा। चौथा शाकद्वीप का राजा हुआ और उससे हरकारे कहने लगे कि पाताल के नाग बड़े दुष्ट हैं, उनको किस प्रकार जीतो। तब वह समुद्र के मार्ग से पाताल में नागों को जीतने जावेगा और एक द्वीप में अपनी स्त्री से शान्त हो जावेगा। पाँचवाँ शाल्मलीद्वीप में स्थित होगा, जहाँ बड़ी प्रकाशयुक्त स्वर्ण की पृथ्वी है। वहाँ एक पर्वत होगा। उसके ऊपर एक
* निर्वाण प्रकरण * ८५३
तालाव होगा, जिसमें वह विद्याधरों के साथ क्रीड़ा करता फिरेगा । फिर दिग्विजय कर आवेगा। उसकी प्रजा बड़ी धर्मात्मा और मानसी पीड़ा से रहित होगी। छठा गोमेदक नाम द्वीप में होगा। पुष्कर-द्वीपवाले से उसका युद्ध होगा । सातवाँ पुष्करद्वीप का राजा होगा जो गोमेदकवाले राजा से युद्ध करेगा। आठवाँ लोकालोक पर्वत का राजा होगा । हे कुन्ददन्त ! इस प्रकार वे अपने अन्तःपुर में सृष्टि देखेंगे और राज्य भोगेंगे; परन्तु उनकी सृष्टि परस्पर अदृश्य होगी । सबकी राजधानी भी मैंने तुमसे कही कि एक की जम्बूद्वीप के उज्जैननगर में, दूसरे की कुशद्वीप में, तीसरे की क्रौंचद्वीप में चौथे की शाकद्वीप में, पाँचवें की शाल्मलिद्वीप में, छठे की गोमेदकद्वीप में, सातवें की पुष्करद्वीप में और आठवें की लोकालोक पर्वत की स्वर्णमय पृथ्वी में होगी । हे साधु ! इस प्रकार उनका भविष्य होगा । वह सब मैंने तुमसे कहा । हृदय में जैसा निश्चय होता है, वैसा ही फल होता है । बाहर कैसी ही क्रिया करो और भीतर सत्ता नहीं, तो वह फलदायक नहीं होती, जैसे नट स्वाँग बनाकर चेष्टा करता है, परन्तु उसके भीतर उसका सद्भाव नहीं होता, इससे वह फलदायक नहीं होता । हे साधु ! हृदय में जैसा निश्चय होता है, वही वरदायक होता है, इसलिए परमार्थ का निश्चय करना चाहिए ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्राह्मणभविष्यवर्णनंनाम द्विशताधिकषट्षष्टितमसर्गः ॥ २६६ ॥
कुन्ददन्त बोले, हे मुनीश्वर ! मुझको बड़ा संशय है कि उनमो अन्तःपुर में अपने-अपने द्वीपों का राज्य वे क्योंकर करेंगे ? कदम्बतपा बोले, हे साधु ! यह सब जगत्, जो तुमको दिखता है, वह कुछ बना नहीं; शुद्ध चिन्मात्रसत्ता अपने आपमें स्थित है। उनका जो अन्तःपुर में अपनी-अपनी सृष्टि भासित होती, उसका क्या रूप होगा ? उनका जो अपना अनुभव है, वही सृष्टिरूप हो भासित होगा, आप ही सृष्टि-रूप और आप ही राजा होंगे। यह जो कुछ जगत् तुमको दिखता है, वह भी परब्रह्म है, भिन्न कुछ नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग स्वाभाविक उठते
८५४ ❋ योगवाशिष्ट ❋
है, वे जलरूप ही हैं और लीन होते हैं तो भी जलरूप ही हैं, जल से भिन्न नहीं। न कुछ उपजता है, न मिटता है। वैसे ही ब्रह्म में जगत् न उपजता है और न लीन होता है। परब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। इसमें वे ब्राह्मण भी अजरूप अपने आपको फुरने में जगतरूप देखेंगे। हे साधु! जब सुषुप्ति होती है, तब आप ही अद्वैत अनुभव होता है और फिर उसमें स्वप्न की सृष्टि प्रकट होती है। पर वही सुषुप्तिरूप है। वैसे ही परम सुषुप्तिरूप आत्मा है। जहाँ सुषुप्ति भी लीन हो जाती है और उसमें यह जगत् प्रकट होता है, सो सब वही रूप है। आधारआधेय से रहित ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। हे साधु! जैसे एक ही मन्दिर में बहुत पुरुष शयन करें तो उनको अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि दिखती है, इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, वैसे ही उनको अपनी-अपनी सृष्टि दिखेगी। तो इसमें आश्चर्य क्या है? जो कुछ जगत् दिखता है, वह ब्रह्म में है, और ब्रह्मरूप ही अपने आपमें स्थित है।
कुन्ददन्त बोले, हे भगवन्! आत्मसत्ता तो एक और केवल है—बल्कि उसको एक भी नहीं कह सकते—वह परम शान्तरूप, शिवपद और अद्वैतरूप है। तब नाना प्रकार की क्यों भासित होती है? यह तो स्वभावसिद्ध है, तब नाना होकर वास्तव क्यों लगती है? कदम्ब-तपा बोले, हे साधु! यह सब शान्तरूप और चैतन्य आकाश है। नाना प्रकार की जो भासित होती है, सो और कोई नहीं, आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न सृष्टि दिखती है, सो कुछ बनी नहीं, अपना अनुभव ही सृष्टिरूप होकर दिखता है, वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है। हे साधो! सृष्टि के आदि में अद्वैत आत्मसत्ता थी, उसमें जो जगत् प्रकट हुआ, उसे भी तुम वही रूप जानो। जैसे समुद्र ही तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही आत्मसत्ता सृष्टिरूप होकर भासित होती है। जैसे कोई खम्भे से रहित स्थान में सोया हो, उसको बहुत खम्भों से युक्त मन्दिर दिख पड़े तो वहाँ बना तो कुछ नहीं, अनुभव आकाश ही खम्भरूप होकर दिखता है, वैसे ही जो कुछ जगत् तुमको दिखता है, वह अपना अनुभवरूप जानो। जैसे आकाश में शून्यता, अग्नि में उष्णता और बर्फ में
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८५५
शीतलता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है । चाहे कोई जगत् कहो अथवा ब्रह्म कहो, ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है । जैसे वृक्ष और तरु एक ही वस्तु के नाम हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् एक ही वस्तु के दो नाम हैं । इन्द्रियों और मन से अतीत आत्मा को ही जगत् जानो । और जो इन तीनों का विषय है, वह भी आत्मा को जानो । दूसरी वस्तु कुछ नहीं है । नानारूप जो दिखता है, वह नानात्व नहीं हुआ दूसरा नहीं दिखता । जैसे स्वप्न में बड़े आरम्भ दिखते हैं । और सेना तथा नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं वैसे ही यह जगत् नाना प्रकार दिखता है, परन्तु कुछ हुआ नहीं सब चिदाकाशरूप है । जैसे एक निद्रा की दो वृत्तियाँ हैं-एक स्वप्न और दूसरी सुषुप्ति-स्वप्न में नानात्व भासित होता है और सुषुप्ति में एक सत्ता होती है, वैसे ही चित्तसंवित् के फुरने में नानात्व दिखता है और न फुरने में एक है ।
हे साधो ! वह तो सब काल में एकरूप है, परन्तु प्रमाद से भेद दिखता है । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपना ही अनुभवरूप है, परन्तु प्रमाद से भिन्न-भिन्न दिखती है, वैसे ही यह जगत् है । हमको तो सर्वदा वही भासित होता है । जैसे पत्ते, फूल, फल, और टहनी एक ही वृक्ष के नाम हैं-जो वृक्ष का ज्ञाता है, उसको सब वृक्षरूप ही दिखते हैं-वैसे ही सब नामरूपों से हमको आत्मा ही दिखता है-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । आदि स्फुरण में जैसा निश्चय हुआ है, वह और निश्चय पर्यन्त वैसा ही रहता है । यह सब विश्व संकल्परूप है और संकल्प का अधिष्ठान ब्रह्म है-ब्रह्म ही संकल्परूप होकर भासित होता है । संकल्प से जगत् दिखता है, सो सब ब्रह्मरूप है । ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं-एक ही वस्तु के दो नाम हैं । जैसे वृक्ष और तरु दोनों एक वस्तु के दो नाम हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् दोनों एक चैतन्य के नाम हैं । हे साधो ! जो वाणी से अकथ है उसको ब्रह्म जानो और जो शब्द व वाणी में आता है, उसको भी तुम ब्रह्म जानो-ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । जो ज्ञानवान् है, उसको सब ब्रह्म ही दिखता है, पर अज्ञानी को नानात्व भासित होता है । जब अध्यात्म का अभ्यास करोगे, तब सब
८५६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
जगत ब्रह्मरूप ही दिखेगा—इसी का नाम बोध है। हे साधो ! जगत् नाना प्रकार का होकर दिखाई देता है, तो भी नानात्व कुछ नहीं। जैसे समुद्र में द्रवता से नाना प्रकार के तरङ्ग, बुलबुले और भँवर दिखते हैं, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं वैसे ही जो पदार्थ दिखते हैं, वे सब आत्मरूप हैं। और जितने जीव बोलते दिखते हैं वे भी महा मौनरूप हैं, कुछ बने नहीं। चित्त के फुरने मे नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, परन्तु आत्मा से भिन्न कुछ नहीं—वही चिदाकाश ज्यों का त्यों स्थित है। जो कुछ आत्मा से भिन्न विद्यमान दिखता है, उसको अविद्यमान जानो। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि जितना जगत् भासित होता है वह सब स्वप्न का विलास है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही भ्रमदृष्टि से आत्मा में जगत् दिखता है—कुछ बना नहीं। जैसे सुषुप्ति में पुरुष सोया होता है, उसको फुरना नहीं फुरता और फिर उसी सुषुप्ति से स्वप्न की सृष्टि उपज आती है, सो वह बनी कुछ नहीं, वही सुषुप्तिरूप है, पर स्वप्न में स्थित पुरुष को सत्य लगता है, और जो अनुभव में जागा है उसको सुषुप्तिरूप है, वैसे ही इस जगत् को जानो।
आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जब जागकर देखोगे, तब सब चिन्मात्र ही भासित होगा, जो शान्तरूप, अनन्त और सदा अपने आपमें स्थित है। उसमें जो जगत् दिखता है, वह सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं। सत्य इस कारण से नहीं कि आभासमात्र और नाशवान् है और असत्य इस कारण नहीं कि प्रकट दिखता है। पर वास्तव में आत्मसत्ता से भिन्न नहीं है। भाव, अभाव, सुख, दुःख, उदय, अस्त सब वही आत्मसत्ता इस प्रकार भासित होती है। जैसे एक ही निद्रा के स्वप्न और सुषुप्ति दो पर्याय हैं, वैसे ही जगत् और आत्मा, दोनों एक ही सत्ता के पर्याय हैं। जैसे एक ही वायु स्पन्दन और निष्पन्द दो रूप होती है, वैसे ही आत्मसत्ता के दोनों रूप हैं। जब संवेदन नहीं फुरता, तब अनिर्वचनीय होती है और जब अहंभाव को लेकर फुरती है, तब संकल्परूपी सृष्टि बन जाती है—आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, तत्त्व, नक्षत्र, चक्र, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, जल का नीचे चलना, अग्नि का ऊपर जाना,
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ =५७
तारागण का प्रकाशमान होना आदि। पृथ्वी-स्थित भूत आदि स्थावर जङ्गमरूप सृष्टि अपने स्वभाव सहित भासित होती है और शुभ-अशुभ कर्म होते हैं। उनमें सुख-दुःख फल की नीति होती है। परन्तु आत्म-सत्ता ही इस प्रकार भासित होती है। जैसे तू मनोराज्य से स्वप्ननगर कल्पित कर ले और उसमें अनेक प्रकार की चेष्टा करे, तो जब तक संकल्प होता है, तब तक वही सृष्टि स्थित होती है और संकल्प मिट जाने पर सृष्टि लय हो जाती है। तो और वस्तु कुछ न हुई, तेरा अनुभव ही सृष्टिरूप होकर स्थित हुआ। वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है, और कुछ नहीं।
कुन्ददन्त ने पूछा, हे तपस्वी! संकल्प तो पूर्वस्मृति को लेकर फुरता है। ब्रह्मा में मनोराज्य संकल्प की सृष्टि किस संस्कार को लेकर फुरती है? यह संशय मेरा निवृत्त करो। कदम्बतपा बोले, हे साधु! यह सम्पूर्ण सृष्टि किसी संस्कार से नहीं उत्पन्न हुई, भ्रम से भासित होती है। जैसे स्वप्न में यदि मनुष्य अपने को मृतक हुआ जानता है, तब उसको पूर्व के संस्कार की स्मृति तो नहीं होती, वह अपूर्व ही लगती है, वैसे ही ये पदार्थ जो तुझको दिखते हैं, सो अपूर्व हैं, किसी स्मृति से नहीं हुए। स्मृति और अनुभव तो जगत् ही में उत्पन्न हुए हैं, पर जब जगत् का फुरना न था तब स्मृति और अनुभव भी न थे। जब जगत् प्रगटा, तब ये भी प्रगटे हैं, इससे सम्पूर्ण जगत् अपूर्व है और भ्रम से भासित होता है। जैसे स्वप्न में मरा व्यक्ति किसी कुल में अपना जन्म देखे और उसको ऐसे जान पड़े कि कुल चिरकाल से चला आता है, पर जब जाग उठे, तब पूर्व जन्म किसको कहे और स्मृति किसकी करे? न कहीं जन्म रहता है और न कुल रहता है। वैसे ही ज्ञानवान् को यह जगत् आकाशरूप दिखता है। तब मैं तुझको पूर्व की स्मृति क्या कहूँ? हे ब्राह्मण! और कुछ बना नहीं, आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है। जिससे यह सब जगत् हुआ है, जिसमें यह सब है और जो सब है, वही सर्वात्मा है। जो वही है तो दूसरा किसको कहूँ? इससे यह जानकर तुम विचारो, तब सब दुःख तुम्हारे नष्ट होंगे। हे साधु! कर्ता, कर्म, करण संप्रदान, अपादान और अधिकरण ये छः
८५८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
कारक ब्रह्मरूप है। कर्त्ता कर्म के करनेवाले को कहते हैं। कर्म करने की संज्ञा है। कारण क्रिया का साधक है। सम्प्रदान जिस निमित्त हो। अपादान जिसमे लय कीजिये और अधिकरण जिसमें कीजिये।
हे साधु! ये छः कारक ब्रह्मरूप हैं। विश्व का कर्त्ता भी ब्रह्म है; विश्वकर्मा भी ब्रह्म है; विश्व का साधक भी ब्रह्म है; जिसके निमित्त यह विश्व है, वह भी ब्रह्म है और जिसमें यह विश्व होता है वह भी ब्रह्म है। ऐसे सर्वात्मा को नमस्कार है। उस सर्वात्मा को ऐसे जानना ही उसकी परम पूजा है। ऐसे ही तुम भी पूजन करो। हे साधु! अब तुम जाओ और अपने मनोवाञ्छित में विचरो। तुम्हारे बान्धव तुम्हारा राह देखते होंगे। उनके पास जावो—जैसे कमल के पास भ्रमर जाते हैं-और मैं भी समाधि में स्थित होता हूँ। जो कुछ गुह्य बात है वह भी मैं कहता हूँ। जिसमे कोई सुख पाता है, वही करता है। मुझको तो जगत् दुःखदायक देख पड़ता है, इस कारण मैं समाधि में लगता हूँ। हे साधु! यद्यपि मुझे सब अवस्था तुल्य हैं; तो भी चित्त की वृत्ति जो संसार के कष्ट से दुःखित होकर आत्मपद में स्थित हुई है, उस स्थिति के सुख के संस्कार से वह फिर उसी ओर दौड़ती है। अब तुम जाओ मैं समाधि में स्थित होता हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिक-सप्तषष्टितमसर्गः ॥ २६७ ॥
कुन्ददन्त बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर वह फिर समाधि में लगा और मन तथा इन्द्रियों की क्रिया से रहित हुआ-मानो कागज पर मूर्ति लिखी हो। तब फिर हम उसे बहुत जगाते रहे और बड़े शब्द किये, परन्तु वह न जागा। निदान हम वहाँ से चले और उस ब्राह्मण के घर आये तो उसके घर में बड़ा उत्साह हुआ। यथासमय क्रम से वे सातों भाई मर गये, पर आठवाँ मेरा मित्र जीता रहा। वह भी कुछ दिन में मृतक हो गया। तब मुझे बहुत शोक हुआ कि मेरा प्रियतम भी मर गया, अब मैं क्या करूँ। हे राम! तब मैंने विचार किया कि फिर मैं कदम्बतपा के पास जाऊँ तो मेरा दुःख नष्ट होगा। निदान मैं
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८५६
वहाँ गया और तीन मास पर्यन्त उसके पास रहा। उसको मैं जगाता रहा, परन्तु वह न जागा। पर जब तीन मास हो चुके, तब वह जागा। मैंने उसको प्रणाम करके कहा, हे मुनीश्वर ! वे तो अपने-अपने राज्य को भोगने लगे और मैं अकेला कष्ट पा रहा हूँ। इससे मेरा दुःख तुम नष्ट करो-मैं तुम्हारी शरण आया हूँ। कदम्बतपा बोले, हे साधु ! मेरे उपदेश से तुझको स्वरूप का साक्षात्कार न होगा; क्योंकि तुझको अभ्यास नहीं है। अभ्यास के बिना स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता। इससे मेरा कहना भी व्यर्थ होगा। मैं दुःख नष्ट होने का एक उपाय तुझसे कहता हूँ, उससे तू मेरे समान दुःख से रहित होकर अनन्त आत्मा होगा। हे साधु ! अयोध्यानगरी के राजा दशरथ के गृह में रामजी पुत्र हुए हैं, जिनको वशिष्ठजी बड़ी सभा में मोक्ष उपाय का उपदेश करेंगे। वहाँ तू जा तो तुझको भी स्वरूप की प्राप्ति होगी—संशय मत कर। हे राम ! जब इस प्रकार तपस्वी ने मुझसे कहा, तब मैं वहाँ से चलकर तुम्हारे पास आया हूँ। जो कुछ तुमने पूछा था सो सब वृत्तान्त मैंने कहा और जो कुछ देखा था वह भी कहा। राम बोले, हे वशिष्ठजी ! जो वृत्तान्त मैंने उससे सुना था, वह प्रभु के आगे कहा। वह कुन्ददन्त भी आपके पास बैठा है। अब इससे पूछिये कि स्वरूप की प्राप्ति हुई अथवा नहीं हुई।
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब इस प्रकार राम ने कहा, तब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी कुन्ददन्त की ओर कृपादृष्टि करके बोले, हे ब्राह्मण ! यह जो मैंने मोक्ष का उपाय सम्पूर्ण कहा है, उसको सुनकर तूने क्या जाना ? कुन्ददन्त बोले, हे सब संशयों के निवृत्त करनेवाले ! तुम्हारे वचनरूपी प्रकाश से मेरे अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश हुआ है। जो कुछ जानने योग्य पद है वह मैंने जाना और जो कुछ पाने योग्य था वह मैंने पाया। अब मैं अपने स्वभाव में स्थित हुआ हूँ और मुझको कोई कल्पना नहीं रही। मैं अनन्त आत्मा, नित्य, शुद्ध, अच्युत, परमानन्द स्वरूप हूँ—सब जगत् मेरा ही स्वरूप है। हे भगवन् ! अन्तःपुर में इतनी सृष्टि के समा जाने का जो संशय मुझे था, वह
८६० ✻ योगवाशिष्ठ ✻
तुम्हारे वचनों से दूर हुआ और अब एक-एक राई में मुझको ब्रह्माण्ड भासित होते हैं और आत्मत्वभाव में दिखाई देते हैं। जैसे अनेक दर्पणों में अपना मुख ही दिखता है, वैसे ही मुझको सब ओर अपना आप ही भासता है। हे भगवन् ! तुम्हारे वचन मैंने आदि से अन्त तक सब सुने हैं, जो परम पावन, सार का परमसार और आत्मबोध का कारण हैं, उनको विचारने से मेरी भ्रान्ति निवृत्त हो गई। अब मैं अपने आप में स्थित हुआ हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कुन्ददन्तविश्रामप्राप्तिर्नाम द्विशताधिकाष्टषष्टितमसर्गः ॥ २६८ ॥
वाल्मीकिजी बोले, जब इस प्रकार कुन्ददन्त ने कहा, तब वशिष्ठजी परमपद पाने का कारण परम उचित वचन फिर कहने लगे कि हे राम ! अब कुन्ददन्त ने आत्म-अनुभव में विश्राम पाया है। इसको अब हस्तामलकवत् अपना आप अनुभवरूप जगत् भासित हो रहा है। आत्मा ही दृश्यरूप होकर दिखता है आत्मा ही द्रष्टारूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं। अपना अनुभव ही जगतरूप होकर दिखता है। वह अनुभव आकाश-सम शान्तरूप, अनन्त और अखण्ड सदा ज्यों का त्यों है। हे साधु ! वह नानारूप दिखता है परन्तु नाना नहीं है। वह सदा ज्यों का त्यों अचेत्य चिन्मात्र परमशून्य है, जिसमें शून्य भी शून्य हो जाता है। और चेत्य दृश्यरूप स्फुरण से रहित है, इसी कारण परमशून्य है। बोलता दिखता है, परन्तु परममौन है। हे राम ! उसमें जगत् कुछ बना नहीं। जैसे स्वप्न में पहाड़ दिखते हैं, सो न सत्य हैं और न असत्य वैसे ही यह जगत् सत्य-असत्य से विलक्षण है, क्योंकि कुछ बना नहीं—जो कुछ दिखता है सो आत्मा है। जैसे रत्नों का प्रकाश चमक होती है, वैसे ही आत्मा का प्रकाश जगत् है। और जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही ब्रह्म संवेदन से जगतरूप होकर भासित होता है। आदि में जो स्पन्दन फुर आई है, वही जगतरूप होकर स्थित है। पर आत्मा कार्य-कारण भाव से रहित है। जिसको प्रमाद है, उसको यह कार्य-कारणभाव सहित भासित होता है और उसके
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६१
लिए वैसा ही है। पर जो सत्य जानकर पाप करते हैं, उनके बड़े पाप उदय होते हैं। वे पहले स्थावररूप होकर फिर जङ्गम मनुष्य होते हैं। हे राम ! इस प्रकार यह ज्ञानसंवित् चैत्यसम्बन्धी होकर नाना प्रकार के रूप धारण करती है और प्रमाद से भिन्न-भिन्न भासित होती है, परन्तु स्वरूप से कुछ और नहीं होती, सदा अखण्डरूप है। जबतक प्रमाद होता है, तब तक जगत् का आदि और अन्त नहीं दिखता, जब प्रमाद से जागता है तब सब कल्पना मिट जाती है।
हे राम ! यह सब जगत् जो दिखता है, वह कुछ बना नहीं, वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जब जाग्रत् अवस्था का अभाव होता है और सुषुप्ति आती है तब उसमें न शुभ की कल्पना रहती है और न अशुभ की। उदय-अस्त की कल्पना से रहित केवल अद्वैतसत्ता रहती है। और जब फिर उसमें चैतन्य फुरता तब फिर स्वप्न की सृष्टि भासित होती है। कहीं स्थावर जङ्गम सृष्टि दिखती है। जिसमें संवेदन फुरता भासित होता है, वह जङ्गम कहलाता है, और जिसमें संवेदन का फुरना नहीं भासित होता वह स्थावर कहलाता है। परन्तु और कुछ नहीं, वही अद्वैत अनुभवसत्ता स्थावर-जङ्गम होकर भासित होती है। वैसे ही आत्मा का अनुभव यह जगत् भासित होता है। हे राम ! सृष्टि के आदि में परम सुषुप्तिसत्ता थी। उसमें संवेदन फुरने से जगत् प्रकट हुआ। यह वही संवेदनरूप जगत् है और जिस आत्मसत्ता में प्रकट हुआ है वही रूप है, भिन्न कुछ नहीं। जैसे हाथ, पाँव, नख, केशादिक सब अङ्ग शरीररूप हैं, वैसे ही यह स्थावरजङ्गम सृष्टि परमात्मा के अङ्ग हस्त पदादिक हैं। रोम सृष्टि और नख केशादिक स्थावर सृष्टि सब आत्म-रूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं बनी। जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभवरूप और सङ्कल्पपुर की रची सृष्टि सङ्कल्परूप होती है, वैसे ही यह सृष्टि अनुभवरूप है, और किसी कारण से नहीं उपजी-इससे ब्रह्मारूप ही है। ब्रह्म के सूक्ष्म अणु में सृष्टि उपजी है, सो उसका क्या रूप है ? ब्रह्म ही सृष्टि है और सृष्टि ही ब्रह्म है-ब्रह्म और जगत् में भेद कुछ नहीं। परन्तु अज्ञाननिद्रा से भिन्न-भिन्न भासित होता है।
८६२ ☸ योगवासिष्ठ ☸
राम ने पूछा, हे भगवन् ! निद्रा का कितना प्रमाण है और कितने काल तक वह रहती है ? सूक्ष्म अणु में सृष्टि कैसी उपजी है और कैसे स्थित है ? अणु में उसकी क्यों संज्ञा है और अनन्त क्योंकर है ? देवत असुरादिकरूप जिसे प्राप्त हुआ है वह चित्त क्या है ? वशिष्ठजी बोले हे राम ! अज्ञान-निद्रा अपने काल में तो अनादि है और नहीं जानी जाती कि कब हुई है और अन्त भी नहीं जाना जाता कि कब तक रहेगी। अज्ञानकाल में तो इसका आदि-अन्त प्रमाण कुछ नहीं भासित होता, पर बोध में इसका अत्यन्ताभाव दीखता है। चित्तसत्ता की जो अनन्तता पूछी सो वह तो अद्वैत चिन्मात्र आत्मसमुद्र है। उसमें सूक्ष्मभाव 'अहं-मस्मि' की जो संवित् फुरती है, उसका नाम चित्त है। उस चित्त ही में आगे चलकर जगत् होता है। शुद्ध चिन्मात्र में संवेदन चित्त फुरता है। उसमें यह जगत् है। वही चित्सत्ता देवता, असुर और जङ्गमरूप होकर भासित होती है। वही नाग, पिशाच, कीटादिक स्थावर-जंगमरूप दिखता है। वास्तव में चैतन्यसत्ता ही है, उससे भिन्न कुछ नहीं। सब चिदाकाश-रूप है, फुरने से नाना प्रकार का दिखता है।
हे राम ! परम शुद्ध चितअणु में मिलकर चित्त अनेक ब्रह्माण्ड धारण करता है और उस सूक्ष्म अणु में अनन्त ब्रह्माण्ड फुरते हैं, परन्तु वे उससे भिन्न नहीं हैं। जैसे एक पुरुष शयन करता है तो उसको स्वप्न में अनेक जीव दीखते हैं और उन जीवों में अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि फुरती है। तब अनेक सृष्टियाँ हो जाती हैं, वैसे ही सूक्ष्म चितअणु में अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं, परन्तु आत्मसत्ता से कुछ भिन्न नहीं बना। जैसे सूर्य की किरणों में अनन्त सूक्ष्म त्रसरेणु होते हैं, वैसे ही परमात्मसूर्य के चितअणु सूक्ष्म हैं। इस त्रसरेणु से भी सूक्ष्म चितअणु में जीवों को अपनी-अपनी अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं। हे राम ! जब तक चित्त फुरता रहता है, तबतक सृष्टियों का अन्त नहीं आता। असद्रूप जगत् भ्रम आगे देखे हैं और असत्य ही आगे देखेंगे। जब चित्त फुरने से रहित होता है, तब जगत् की कल्पना मिट जाती है। जैसे स्वप्न में सृष्टि दिखती है और बड़े व्यवहार होते हैं, पर जब प्राणी जाग उठता है, तब स्वप्न की सृष्टि व्यवहार की कल्पना
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६३
मिट जाती है और अपना अद्वैत आप ही भासित होता है, वैसे ही चित्त के ठहरने से सब भ्रम मिट जाता है। हे राम! सूक्ष्म चित्अणु की भी संज्ञा तब हुई है, जब इसको चित्त का सम्बन्ध हुआ है। जब चित् को अपने स्वभाव में स्थित करोगे, तब द्वैतकल्पना और सूक्ष्म स्थूलभाव मिट जावेंगे। इसकी सूक्ष्म संज्ञा अव्यक्त भाव से है, जो इन्द्रियों का विषय नहीं। इसमें अणुता है। यह जीव सूक्ष्म अणु में भी व्यापा हुआ है, इससे सूक्ष्म अणु कहाता है। और अनन्तता इस कारण है कि सबको धारण कर रहा है।
हे राम! यह जगत् अभावमात्र है। जैसे मरुस्थल में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जब यह जगत् ही नहीं है, तो इसका कारण किसे कहिये ? आदि-सृष्टि बिना कारण के उपजी है और फिर उसमें कारण-कार्य भासित होने लगे हैं, सो आभास की दृढ़ता से ऐसा हुआ है। जैसे बिना कारण के स्वप्न में आदि-सृष्टि बीज, वृक्ष, कुम्हार, मिट्टी और घट इकट्ठे प्रकट हो आते हैं। जब उस स्वप्न की दृढ़ता हो जाती है, तब कारण और कार्य भासित होते हैं, परन्तु जो सोया पड़ा है, उसको दृढ़ रूप से भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञानी को जगत् का कार्य-कारण दृढ़ भासित होता है और ज्ञानवान् को सब अपना रूप ही दिखता है। जैसे स्वप्न से जागने पर स्वप्न की सृष्टि अपना रूप ही दिखती है कि मैं ही था और कुछ न था, वैसे ही ज्ञानवान् को सब जगत् आकाशरूप दिखता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, पर्वत, वृक्ष, नदी आदि सब स्थावर-जङ्गम जगत् आकाशरूप है और संवेदन के फुरने से देख पड़ता है, वास्तव में भिन्न कुछ नहीं है। हे राम! यह जगत् चित्त में स्थित है। जैसे किसी पुरुष ने खम्भे में पुतलियों की कल्पना की तो उन पुतलियों के दो रूप होते हैं, एक शिल्पी के चित्त में फुरती हैं सो आकाशरूप हैं और एक खम्भे में कल्पित हैं, वे स्तम्भरूप हैं, पर शिल्पी के चित्त में नृत्य करती हैं। हे राम! और तो कुछ नहीं बना, सब स्तम्भरूप है और शिल्पी के चित्त में कल्पनामात्र है। वैसे ही चित्तरूपी शिल्पी
८६४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
की जगतरूपी पुतलियाँ कल्पनामात्र हैं। पर आत्मरूपी खम्भा ज्यों का त्यों है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसे पट के ऊपर मूर्ति लिखी हो तो उस मूर्ति का रूप पट ही है—पट से भिन्न कुछ नहीं—वह पट ही मूर्तिरूप दिखता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मा ही जगतरूप होकर भासित होता है। आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं—जैसे ब्रह्म आकाशरूप है वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है। जगत् आधार है और उसमें ब्रह्म बसनेवाला है। वैसे ही ब्रह्म आधार है और उसमें जगत् बसनेवाला है।
हे राम! जगत् में जितने विद्या और अविद्यारूप समूह हैं, वे सब संकल्प से रचित हैं और वास्तव में सब आत्मरूप हैं। समता, सत्ता और निर्विकारता आदि और इनसे विपरीत अविद्यारूप सब एक ही रूप हैं। सब एक ही में स्फुरते हैं और एक ही रूप हैं। जैसे अनुभवरूप स्वप्न-जगत् अनुभव में स्थित होता है सो सब आत्मरूप होता है, वैसे ही यह सब जगत् ब्रह्मरूप है—ब्रह्म से भिन्न न कुछ वर की कल्पना है और न शाप की कल्पना है। ब्रह्मसत्ता निर्विकार अपने आपमें स्थित है। उसमें न कारण है, न कार्य। जैसे तालाब, नदी और मेघ जल ही होते हैं, वैसे ही सब ब्रह्मरूप है। राम ने पूछा, हे भगवन्! वर और शाप के कर्त्ता तो परिच्छिन्न हैं और कारण बिना तो कार्य नहीं बनता। तब तुम कैसे कहते हो कि कारण-कार्य कोई नहीं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध आत्मसत्ता चिदाकाश का किञ्चन जगत् होता है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता में जगत् प्रकट होते हैं। और जैसे तरङ्ग जल रूप होते हैं, वैसे ही जगत् आत्मरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसे आदि में परमात्मा से सृष्टि का स्फुरण हुआ है, वैसे ही स्थित है अन्यथा नहीं होता। सब जगत् संकल्प है। अनेक प्रकार की वासना संवेदन में स्फुरती है, पर जिनको स्वरूप का विस्मरण हुआ है, उनको यह जगत् सत्यरूप दिखता है। जो उनको विचार उत्पन्न हो तो वही काम है, जिस काल में विचार उत्पन्न होता है और उसी काल में अज्ञाननिद्रा का अभाव होता है। हे राम! जब विचार अभ्यास करके
- निर्वाण प्रकरण * ८६५
मन तद्रूप होता है, तब यथाभूत दर्शन होता है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपना ही रूप भासित होता है, क्योंकि वह अपने आपमें स्थित है । सबके अधिष्ठान आत्मसत्ता में अहंप्रतीति होती है, इस कारण अपने आपमें सृष्टि भासित होती है । जैसे स्पन्दन फुरते हैं, वैसे ही उनकी सिद्धि होती है । पहले निरावरण-दृष्टि होती है, निरावरण-दृष्टि से सब संकल्प सिद्ध होते हैं, क्योंकि यह सब जगत् आत्मा में संकल्प का रचा हुआ है और उसमें इसको अहंप्रत्यय हुआ है । हे राम ! जो यह संकल्प उठता है कि यह कार्य ऐसे हो तो वह वैसे ही होता है ।
हे राम ! शुद्ध संवेदन में जैसा संकल्प होता है, वही होकर भासित होता है । यह जगत् संकल्परूप ही है, संकल्प से भिन्न नहीं । इसलिए वर और शाप का और कोई कारण नहीं; वर और शाप भी संकल्परूप हैं । उस संकल्प से जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे किसी समवायकारण से तो नहीं उत्पन्न हुए, संकल्प ही से हुए हैं, इससे सब अकारण हैं । ब्रह्मरूपी समुद्र में तरङ्ग उठते हैं तो कारण और कार्य मैं तुमसे क्या कहूँ ? सब जगत् ब्रह्मरूप है । द्वैत और एक की कल्पना कुछ नहीं । हे राम ! मुझको सदा ब्रह्मसत्ता ही दिखती है, कार्य कारण कोई नहीं दिखता । जैसे स्वप्न में किसी के घर पुत्र हुआ और वह बड़े उत्साह को प्राप्त हुआ, पर जब जाग्रत् का संस्कार चित्त में आया, तब उसका पिता ही उपजा नहीं, तो पुत्र कैसे कहिये ? तब तो सब अपने आपही हो जाता है, न कोई कारण दिखता है और न कार्य दिखता है । जो स्वप्न में सोया है, उसको जैसे दिखता है, वैसे ही यह भी है । जैसे वर और शाप का आसरा संकल्प है और संकल्प ही वर और शाप होकर भासित होता है और अकारण ही होता है । जिसको शुद्ध संवेदन से एकता हुई है, वह निवरण है और उसमें जैसे फुरने का आभास फुरता है, वैसा ही सिद्ध होता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! एक ऐसे हैं, जिनको आवरण है और उनका संकल्प जैसा फुरता है-वर दें अथवा शाप दें-वैसा ही हो जाता है । स्वरूप का साक्षात्कार उनको नहीं हुआ, पर शुभ कर्म उनमें प्रत्यक्ष मिलते हैं । तो शुभ कर्म ही वर और