योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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स्वप्ननिद्रा में फुरता है। आत्मसत्ता सदा अद्वैत, परमशान्त और अनन्त है। उसमें जगत् आभासमात्र है। जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही सूक्ष्म से सूक्ष्म होता है, और उसमें त्रिलोकी भासित होती है। यदि सूक्ष्म संवित् में त्रिलोकी भासित होती है तो मन्दिर में उसका भासित होना क्या आश्चर्य है? हे साधु! जब यह पुरुष मर जाता है, तब इसकी सूक्ष्म पुर्यष्टका जड़ हो जाती है, और उसमें फिर त्रिलोकी जग आती है। तुम देखो कि यदि सूक्ष्म ही में भासित होती है और अति परमसूक्ष्म में सृष्टि बन जाती है तो मन्दिर में ऐसा होना क्या आश्चर्य है। हे साधु! यह सब जगत् जो दिखता है, वह आत्मा में स्थित है, और उसका किञ्चन इस प्रकार भासित होता है। अब तुम जाओ, उनको राज्य भोग कराओ। हे कुन्ददन्त! जब इस प्रकार ब्रह्माजी कहेंगे, तब वर नमस्कार करके आधिभौतिक शरीर त्याग देंगे और आन्तवाहक शरीर से उनके हृदय में स्थित होंगे। जैसे एक शत्रु को दूर करके दूसरा स्थित हो वैसे ही शाप को दूर करके उनके हृदय में वर आकर स्थित हुए। तब उनको त्रिलोकी भासित होने लगी और पुर्यष्टका को अन्तःपुर में वर ने रोक छोड़ा। जैसे बाँध जल को रोकता है, वैसे ही उनकी पुर्यष्टका को वर ने रोका। हे कुन्ददन्त! इस प्रकार उनको अपने अन्तःकरण में सृष्टि भासित हुई, और उन्होंने जाना कि हम सातों द्वीप के राजा हुए हैं। इस प्रकार आठों उस अन्तःपुर में सातों द्वीप पृथ्वी के राजा हुए, परन्तु परस्पर अज्ञात रहे। एक सप्तद्वीप का राजा हुआ और जम्बूद्वीप में जो उज्जैननगर है, वह उसकी राजधानी हुई। दूसरा कुशद्वीप में रहने लगा। तीसरा क्रौंचद्वीप में रहने लगा। चौथा शाकद्वीप का राजा हुआ और उससे हरकारे कहने लगे कि पाताल के नाग बड़े दुष्ट हैं, उनको किस प्रकार जीतो। तब वह समुद्र के मार्ग से पाताल में नागों को जीतने जावेगा और एक द्वीप में अपनी स्त्री से शान्त हो जावेगा। पाँचवाँ शाल्मलीद्वीप में स्थित होगा, जहाँ बड़ी प्रकाशयुक्त स्वर्ण की पृथ्वी है। वहाँ एक पर्वत होगा। उसके ऊपर एक