योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1656, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण * ८५३
तालाव होगा, जिसमें वह विद्याधरों के साथ क्रीड़ा करता फिरेगा । फिर दिग्विजय कर आवेगा। उसकी प्रजा बड़ी धर्मात्मा और मानसी पीड़ा से रहित होगी। छठा गोमेदक नाम द्वीप में होगा। पुष्कर-द्वीपवाले से उसका युद्ध होगा । सातवाँ पुष्करद्वीप का राजा होगा जो गोमेदकवाले राजा से युद्ध करेगा। आठवाँ लोकालोक पर्वत का राजा होगा । हे कुन्ददन्त ! इस प्रकार वे अपने अन्तःपुर में सृष्टि देखेंगे और राज्य भोगेंगे; परन्तु उनकी सृष्टि परस्पर अदृश्य होगी । सबकी राजधानी भी मैंने तुमसे कही कि एक की जम्बूद्वीप के उज्जैननगर में, दूसरे की कुशद्वीप में, तीसरे की क्रौंचद्वीप में चौथे की शाकद्वीप में, पाँचवें की शाल्मलिद्वीप में, छठे की गोमेदकद्वीप में, सातवें की पुष्करद्वीप में और आठवें की लोकालोक पर्वत की स्वर्णमय पृथ्वी में होगी । हे साधु ! इस प्रकार उनका भविष्य होगा । वह सब मैंने तुमसे कहा । हृदय में जैसा निश्चय होता है, वैसा ही फल होता है । बाहर कैसी ही क्रिया करो और भीतर सत्ता नहीं, तो वह फलदायक नहीं होती, जैसे नट स्वाँग बनाकर चेष्टा करता है, परन्तु उसके भीतर उसका सद्भाव नहीं होता, इससे वह फलदायक नहीं होता । हे साधु ! हृदय में जैसा निश्चय होता है, वही वरदायक होता है, इसलिए परमार्थ का निश्चय करना चाहिए ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्राह्मणभविष्यवर्णनंनाम द्विशताधिकषट्षष्टितमसर्गः ॥ २६६ ॥
कुन्ददन्त बोले, हे मुनीश्वर ! मुझको बड़ा संशय है कि उनमो अन्तःपुर में अपने-अपने द्वीपों का राज्य वे क्योंकर करेंगे ? कदम्बतपा बोले, हे साधु ! यह सब जगत्, जो तुमको दिखता है, वह कुछ बना नहीं; शुद्ध चिन्मात्रसत्ता अपने आपमें स्थित है। उनका जो अन्तःपुर में अपनी-अपनी सृष्टि भासित होती, उसका क्या रूप होगा ? उनका जो अपना अनुभव है, वही सृष्टिरूप हो भासित होगा, आप ही सृष्टि-रूप और आप ही राजा होंगे। यह जो कुछ जगत् तुमको दिखता है, वह भी परब्रह्म है, भिन्न कुछ नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग स्वाभाविक उठते