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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

८५२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

स्वप्ननिद्रा में फुरता है। आत्मसत्ता सदा अद्वैत, परमशान्त और अनन्त है। उसमें जगत् आभासमात्र है। जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही सूक्ष्म से सूक्ष्म होता है, और उसमें त्रिलोकी भासित होती है। यदि सूक्ष्म संवित् में त्रिलोकी भासित होती है तो मन्दिर में उसका भासित होना क्या आश्चर्य है? हे साधु! जब यह पुरुष मर जाता है, तब इसकी सूक्ष्म पुर्यष्टका जड़ हो जाती है, और उसमें फिर त्रिलोकी जग आती है। तुम देखो कि यदि सूक्ष्म ही में भासित होती है और अति परमसूक्ष्म में सृष्टि बन जाती है तो मन्दिर में ऐसा होना क्या आश्चर्य है। हे साधु! यह सब जगत् जो दिखता है, वह आत्मा में स्थित है, और उसका किञ्चन इस प्रकार भासित होता है। अब तुम जाओ, उनको राज्य भोग कराओ। हे कुन्ददन्त! जब इस प्रकार ब्रह्माजी कहेंगे, तब वर नमस्कार करके आधिभौतिक शरीर त्याग देंगे और आन्तवाहक शरीर से उनके हृदय में स्थित होंगे। जैसे एक शत्रु को दूर करके दूसरा स्थित हो वैसे ही शाप को दूर करके उनके हृदय में वर आकर स्थित हुए। तब उनको त्रिलोकी भासित होने लगी और पुर्यष्टका को अन्तःपुर में वर ने रोक छोड़ा। जैसे बाँध जल को रोकता है, वैसे ही उनकी पुर्यष्टका को वर ने रोका। हे कुन्ददन्त! इस प्रकार उनको अपने अन्तःकरण में सृष्टि भासित हुई, और उन्होंने जाना कि हम सातों द्वीप के राजा हुए हैं। इस प्रकार आठों उस अन्तःपुर में सातों द्वीप पृथ्वी के राजा हुए, परन्तु परस्पर अज्ञात रहे। एक सप्तद्वीप का राजा हुआ और जम्बूद्वीप में जो उज्जैननगर है, वह उसकी राजधानी हुई। दूसरा कुशद्वीप में रहने लगा। तीसरा क्रौंचद्वीप में रहने लगा। चौथा शाकद्वीप का राजा हुआ और उससे हरकारे कहने लगे कि पाताल के नाग बड़े दुष्ट हैं, उनको किस प्रकार जीतो। तब वह समुद्र के मार्ग से पाताल में नागों को जीतने जावेगा और एक द्वीप में अपनी स्त्री से शान्त हो जावेगा। पाँचवाँ शाल्मलीद्वीप में स्थित होगा, जहाँ बड़ी प्रकाशयुक्त स्वर्ण की पृथ्वी है। वहाँ एक पर्वत होगा। उसके ऊपर एक

* निर्वाण प्रकरण * ८५३

तालाव होगा, जिसमें वह विद्याधरों के साथ क्रीड़ा करता फिरेगा । फिर दिग्विजय कर आवेगा। उसकी प्रजा बड़ी धर्मात्मा और मानसी पीड़ा से रहित होगी। छठा गोमेदक नाम द्वीप में होगा। पुष्कर-द्वीपवाले से उसका युद्ध होगा । सातवाँ पुष्करद्वीप का राजा होगा जो गोमेदकवाले राजा से युद्ध करेगा। आठवाँ लोकालोक पर्वत का राजा होगा । हे कुन्ददन्त ! इस प्रकार वे अपने अन्तःपुर में सृष्टि देखेंगे और राज्य भोगेंगे; परन्तु उनकी सृष्टि परस्पर अदृश्य होगी । सबकी राजधानी भी मैंने तुमसे कही कि एक की जम्बूद्वीप के उज्जैननगर में, दूसरे की कुशद्वीप में, तीसरे की क्रौंचद्वीप में चौथे की शाकद्वीप में, पाँचवें की शाल्मलिद्वीप में, छठे की गोमेदकद्वीप में, सातवें की पुष्करद्वीप में और आठवें की लोकालोक पर्वत की स्वर्णमय पृथ्वी में होगी । हे साधु ! इस प्रकार उनका भविष्य होगा । वह सब मैंने तुमसे कहा । हृदय में जैसा निश्चय होता है, वैसा ही फल होता है । बाहर कैसी ही क्रिया करो और भीतर सत्ता नहीं, तो वह फलदायक नहीं होती, जैसे नट स्वाँग बनाकर चेष्टा करता है, परन्तु उसके भीतर उसका सद्भाव नहीं होता, इससे वह फलदायक नहीं होता । हे साधु ! हृदय में जैसा निश्चय होता है, वही वरदायक होता है, इसलिए परमार्थ का निश्चय करना चाहिए ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्राह्मणभविष्यवर्णनंनाम द्विशताधिकषट्षष्टितमसर्गः ॥ २६६ ॥

कुन्ददन्त बोले, हे मुनीश्वर ! मुझको बड़ा संशय है कि उनमो अन्तःपुर में अपने-अपने द्वीपों का राज्य वे क्योंकर करेंगे ? कदम्बतपा बोले, हे साधु ! यह सब जगत्, जो तुमको दिखता है, वह कुछ बना नहीं; शुद्ध चिन्मात्रसत्ता अपने आपमें स्थित है। उनका जो अन्तःपुर में अपनी-अपनी सृष्टि भासित होती, उसका क्या रूप होगा ? उनका जो अपना अनुभव है, वही सृष्टिरूप हो भासित होगा, आप ही सृष्टि-रूप और आप ही राजा होंगे। यह जो कुछ जगत् तुमको दिखता है, वह भी परब्रह्म है, भिन्न कुछ नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग स्वाभाविक उठते

८५४ ❋ योगवाशिष्ट ❋

है, वे जलरूप ही हैं और लीन होते हैं तो भी जलरूप ही हैं, जल से भिन्न नहीं। न कुछ उपजता है, न मिटता है। वैसे ही ब्रह्म में जगत् न उपजता है और न लीन होता है। परब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। इसमें वे ब्राह्मण भी अजरूप अपने आपको फुरने में जगतरूप देखेंगे। हे साधु! जब सुषुप्ति होती है, तब आप ही अद्वैत अनुभव होता है और फिर उसमें स्वप्न की सृष्टि प्रकट होती है। पर वही सुषुप्तिरूप है। वैसे ही परम सुषुप्तिरूप आत्मा है। जहाँ सुषुप्ति भी लीन हो जाती है और उसमें यह जगत् प्रकट होता है, सो सब वही रूप है। आधारआधेय से रहित ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। हे साधु! जैसे एक ही मन्दिर में बहुत पुरुष शयन करें तो उनको अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि दिखती है, इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, वैसे ही उनको अपनी-अपनी सृष्टि दिखेगी। तो इसमें आश्चर्य क्या है? जो कुछ जगत् दिखता है, वह ब्रह्म में है, और ब्रह्मरूप ही अपने आपमें स्थित है।

कुन्ददन्त बोले, हे भगवन्! आत्मसत्ता तो एक और केवल है—बल्कि उसको एक भी नहीं कह सकते—वह परम शान्तरूप, शिवपद और अद्वैतरूप है। तब नाना प्रकार की क्यों भासित होती है? यह तो स्वभावसिद्ध है, तब नाना होकर वास्तव क्यों लगती है? कदम्ब-तपा बोले, हे साधु! यह सब शान्तरूप और चैतन्य आकाश है। नाना प्रकार की जो भासित होती है, सो और कोई नहीं, आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न सृष्टि दिखती है, सो कुछ बनी नहीं, अपना अनुभव ही सृष्टिरूप होकर दिखता है, वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है। हे साधो! सृष्टि के आदि में अद्वैत आत्मसत्ता थी, उसमें जो जगत् प्रकट हुआ, उसे भी तुम वही रूप जानो। जैसे समुद्र ही तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही आत्मसत्ता सृष्टिरूप होकर भासित होती है। जैसे कोई खम्भे से रहित स्थान में सोया हो, उसको बहुत खम्भों से युक्त मन्दिर दिख पड़े तो वहाँ बना तो कुछ नहीं, अनुभव आकाश ही खम्भरूप होकर दिखता है, वैसे ही जो कुछ जगत् तुमको दिखता है, वह अपना अनुभवरूप जानो। जैसे आकाश में शून्यता, अग्नि में उष्णता और बर्फ में

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८५५

शीतलता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है । चाहे कोई जगत् कहो अथवा ब्रह्म कहो, ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है । जैसे वृक्ष और तरु एक ही वस्तु के नाम हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् एक ही वस्तु के दो नाम हैं । इन्द्रियों और मन से अतीत आत्मा को ही जगत् जानो । और जो इन तीनों का विषय है, वह भी आत्मा को जानो । दूसरी वस्तु कुछ नहीं है । नानारूप जो दिखता है, वह नानात्व नहीं हुआ दूसरा नहीं दिखता । जैसे स्वप्न में बड़े आरम्भ दिखते हैं । और सेना तथा नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं वैसे ही यह जगत् नाना प्रकार दिखता है, परन्तु कुछ हुआ नहीं सब चिदाकाशरूप है । जैसे एक निद्रा की दो वृत्तियाँ हैं-एक स्वप्न और दूसरी सुषुप्ति-स्वप्न में नानात्व भासित होता है और सुषुप्ति में एक सत्ता होती है, वैसे ही चित्तसंवित् के फुरने में नानात्व दिखता है और न फुरने में एक है ।

हे साधो ! वह तो सब काल में एकरूप है, परन्तु प्रमाद से भेद दिखता है । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपना ही अनुभवरूप है, परन्तु प्रमाद से भिन्न-भिन्न दिखती है, वैसे ही यह जगत् है । हमको तो सर्वदा वही भासित होता है । जैसे पत्ते, फूल, फल, और टहनी एक ही वृक्ष के नाम हैं-जो वृक्ष का ज्ञाता है, उसको सब वृक्षरूप ही दिखते हैं-वैसे ही सब नामरूपों से हमको आत्मा ही दिखता है-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । आदि स्फुरण में जैसा निश्चय हुआ है, वह और निश्चय पर्यन्त वैसा ही रहता है । यह सब विश्व संकल्परूप है और संकल्प का अधिष्ठान ब्रह्म है-ब्रह्म ही संकल्परूप होकर भासित होता है । संकल्प से जगत् दिखता है, सो सब ब्रह्मरूप है । ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं-एक ही वस्तु के दो नाम हैं । जैसे वृक्ष और तरु दोनों एक वस्तु के दो नाम हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् दोनों एक चैतन्य के नाम हैं । हे साधो ! जो वाणी से अकथ है उसको ब्रह्म जानो और जो शब्द व वाणी में आता है, उसको भी तुम ब्रह्म जानो-ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । जो ज्ञानवान् है, उसको सब ब्रह्म ही दिखता है, पर अज्ञानी को नानात्व भासित होता है । जब अध्यात्म का अभ्यास करोगे, तब सब

८५६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

जगत ब्रह्मरूप ही दिखेगा—इसी का नाम बोध है। हे साधो ! जगत् नाना प्रकार का होकर दिखाई देता है, तो भी नानात्व कुछ नहीं। जैसे समुद्र में द्रवता से नाना प्रकार के तरङ्ग, बुलबुले और भँवर दिखते हैं, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं वैसे ही जो पदार्थ दिखते हैं, वे सब आत्मरूप हैं। और जितने जीव बोलते दिखते हैं वे भी महा मौनरूप हैं, कुछ बने नहीं। चित्त के फुरने मे नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, परन्तु आत्मा से भिन्न कुछ नहीं—वही चिदाकाश ज्यों का त्यों स्थित है। जो कुछ आत्मा से भिन्न विद्यमान दिखता है, उसको अविद्यमान जानो। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि जितना जगत् भासित होता है वह सब स्वप्न का विलास है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही भ्रमदृष्टि से आत्मा में जगत् दिखता है—कुछ बना नहीं। जैसे सुषुप्ति में पुरुष सोया होता है, उसको फुरना नहीं फुरता और फिर उसी सुषुप्ति से स्वप्न की सृष्टि उपज आती है, सो वह बनी कुछ नहीं, वही सुषुप्तिरूप है, पर स्वप्न में स्थित पुरुष को सत्य लगता है, और जो अनुभव में जागा है उसको सुषुप्तिरूप है, वैसे ही इस जगत् को जानो।

आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जब जागकर देखोगे, तब सब चिन्मात्र ही भासित होगा, जो शान्तरूप, अनन्त और सदा अपने आपमें स्थित है। उसमें जो जगत् दिखता है, वह सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं। सत्य इस कारण से नहीं कि आभासमात्र और नाशवान् है और असत्य इस कारण नहीं कि प्रकट दिखता है। पर वास्तव में आत्मसत्ता से भिन्न नहीं है। भाव, अभाव, सुख, दुःख, उदय, अस्त सब वही आत्मसत्ता इस प्रकार भासित होती है। जैसे एक ही निद्रा के स्वप्न और सुषुप्ति दो पर्याय हैं, वैसे ही जगत् और आत्मा, दोनों एक ही सत्ता के पर्याय हैं। जैसे एक ही वायु स्पन्दन और निष्पन्द दो रूप होती है, वैसे ही आत्मसत्ता के दोनों रूप हैं। जब संवेदन नहीं फुरता, तब अनिर्वचनीय होती है और जब अहंभाव को लेकर फुरती है, तब संकल्परूपी सृष्टि बन जाती है—आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, तत्त्व, नक्षत्र, चक्र, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, जल का नीचे चलना, अग्नि का ऊपर जाना,

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ =५७

तारागण का प्रकाशमान होना आदि। पृथ्वी-स्थित भूत आदि स्थावर जङ्गमरूप सृष्टि अपने स्वभाव सहित भासित होती है और शुभ-अशुभ कर्म होते हैं। उनमें सुख-दुःख फल की नीति होती है। परन्तु आत्म-सत्ता ही इस प्रकार भासित होती है। जैसे तू मनोराज्य से स्वप्ननगर कल्पित कर ले और उसमें अनेक प्रकार की चेष्टा करे, तो जब तक संकल्प होता है, तब तक वही सृष्टि स्थित होती है और संकल्प मिट जाने पर सृष्टि लय हो जाती है। तो और वस्तु कुछ न हुई, तेरा अनुभव ही सृष्टिरूप होकर स्थित हुआ। वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है, और कुछ नहीं।

कुन्ददन्त ने पूछा, हे तपस्वी! संकल्प तो पूर्वस्मृति को लेकर फुरता है। ब्रह्मा में मनोराज्य संकल्प की सृष्टि किस संस्कार को लेकर फुरती है? यह संशय मेरा निवृत्त करो। कदम्बतपा बोले, हे साधु! यह सम्पूर्ण सृष्टि किसी संस्कार से नहीं उत्पन्न हुई, भ्रम से भासित होती है। जैसे स्वप्न में यदि मनुष्य अपने को मृतक हुआ जानता है, तब उसको पूर्व के संस्कार की स्मृति तो नहीं होती, वह अपूर्व ही लगती है, वैसे ही ये पदार्थ जो तुझको दिखते हैं, सो अपूर्व हैं, किसी स्मृति से नहीं हुए। स्मृति और अनुभव तो जगत् ही में उत्पन्न हुए हैं, पर जब जगत् का फुरना न था तब स्मृति और अनुभव भी न थे। जब जगत् प्रगटा, तब ये भी प्रगटे हैं, इससे सम्पूर्ण जगत् अपूर्व है और भ्रम से भासित होता है। जैसे स्वप्न में मरा व्यक्ति किसी कुल में अपना जन्म देखे और उसको ऐसे जान पड़े कि कुल चिरकाल से चला आता है, पर जब जाग उठे, तब पूर्व जन्म किसको कहे और स्मृति किसकी करे? न कहीं जन्म रहता है और न कुल रहता है। वैसे ही ज्ञानवान् को यह जगत् आकाशरूप दिखता है। तब मैं तुझको पूर्व की स्मृति क्या कहूँ? हे ब्राह्मण! और कुछ बना नहीं, आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है। जिससे यह सब जगत् हुआ है, जिसमें यह सब है और जो सब है, वही सर्वात्मा है। जो वही है तो दूसरा किसको कहूँ? इससे यह जानकर तुम विचारो, तब सब दुःख तुम्हारे नष्ट होंगे। हे साधु! कर्ता, कर्म, करण संप्रदान, अपादान और अधिकरण ये छः

८५८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

कारक ब्रह्मरूप है। कर्त्ता कर्म के करनेवाले को कहते हैं। कर्म करने की संज्ञा है। कारण क्रिया का साधक है। सम्प्रदान जिस निमित्त हो। अपादान जिसमे लय कीजिये और अधिकरण जिसमें कीजिये।

हे साधु! ये छः कारक ब्रह्मरूप हैं। विश्व का कर्त्ता भी ब्रह्म है; विश्वकर्मा भी ब्रह्म है; विश्व का साधक भी ब्रह्म है; जिसके निमित्त यह विश्व है, वह भी ब्रह्म है और जिसमें यह विश्व होता है वह भी ब्रह्म है। ऐसे सर्वात्मा को नमस्कार है। उस सर्वात्मा को ऐसे जानना ही उसकी परम पूजा है। ऐसे ही तुम भी पूजन करो। हे साधु! अब तुम जाओ और अपने मनोवाञ्छित में विचरो। तुम्हारे बान्धव तुम्हारा राह देखते होंगे। उनके पास जावो—जैसे कमल के पास भ्रमर जाते हैं-और मैं भी समाधि में स्थित होता हूँ। जो कुछ गुह्य बात है वह भी मैं कहता हूँ। जिसमे कोई सुख पाता है, वही करता है। मुझको तो जगत् दुःखदायक देख पड़ता है, इस कारण मैं समाधि में लगता हूँ। हे साधु! यद्यपि मुझे सब अवस्था तुल्य हैं; तो भी चित्त की वृत्ति जो संसार के कष्ट से दुःखित होकर आत्मपद में स्थित हुई है, उस स्थिति के सुख के संस्कार से वह फिर उसी ओर दौड़ती है। अब तुम जाओ मैं समाधि में स्थित होता हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिक-सप्तषष्टितमसर्गः ॥ २६७ ॥

कुन्ददन्त बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर वह फिर समाधि में लगा और मन तथा इन्द्रियों की क्रिया से रहित हुआ-मानो कागज पर मूर्ति लिखी हो। तब फिर हम उसे बहुत जगाते रहे और बड़े शब्द किये, परन्तु वह न जागा। निदान हम वहाँ से चले और उस ब्राह्मण के घर आये तो उसके घर में बड़ा उत्साह हुआ। यथासमय क्रम से वे सातों भाई मर गये, पर आठवाँ मेरा मित्र जीता रहा। वह भी कुछ दिन में मृतक हो गया। तब मुझे बहुत शोक हुआ कि मेरा प्रियतम भी मर गया, अब मैं क्या करूँ। हे राम! तब मैंने विचार किया कि फिर मैं कदम्बतपा के पास जाऊँ तो मेरा दुःख नष्ट होगा। निदान मैं

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८५६

वहाँ गया और तीन मास पर्यन्त उसके पास रहा। उसको मैं जगाता रहा, परन्तु वह न जागा। पर जब तीन मास हो चुके, तब वह जागा। मैंने उसको प्रणाम करके कहा, हे मुनीश्वर ! वे तो अपने-अपने राज्य को भोगने लगे और मैं अकेला कष्ट पा रहा हूँ। इससे मेरा दुःख तुम नष्ट करो-मैं तुम्हारी शरण आया हूँ। कदम्बतपा बोले, हे साधु ! मेरे उपदेश से तुझको स्वरूप का साक्षात्कार न होगा; क्योंकि तुझको अभ्यास नहीं है। अभ्यास के बिना स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता। इससे मेरा कहना भी व्यर्थ होगा। मैं दुःख नष्ट होने का एक उपाय तुझसे कहता हूँ, उससे तू मेरे समान दुःख से रहित होकर अनन्त आत्मा होगा। हे साधु ! अयोध्यानगरी के राजा दशरथ के गृह में रामजी पुत्र हुए हैं, जिनको वशिष्ठजी बड़ी सभा में मोक्ष उपाय का उपदेश करेंगे। वहाँ तू जा तो तुझको भी स्वरूप की प्राप्ति होगी—संशय मत कर। हे राम ! जब इस प्रकार तपस्वी ने मुझसे कहा, तब मैं वहाँ से चलकर तुम्हारे पास आया हूँ। जो कुछ तुमने पूछा था सो सब वृत्तान्त मैंने कहा और जो कुछ देखा था वह भी कहा। राम बोले, हे वशिष्ठजी ! जो वृत्तान्त मैंने उससे सुना था, वह प्रभु के आगे कहा। वह कुन्ददन्त भी आपके पास बैठा है। अब इससे पूछिये कि स्वरूप की प्राप्ति हुई अथवा नहीं हुई।

वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब इस प्रकार राम ने कहा, तब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी कुन्ददन्त की ओर कृपादृष्टि करके बोले, हे ब्राह्मण ! यह जो मैंने मोक्ष का उपाय सम्पूर्ण कहा है, उसको सुनकर तूने क्या जाना ? कुन्ददन्त बोले, हे सब संशयों के निवृत्त करनेवाले ! तुम्हारे वचनरूपी प्रकाश से मेरे अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश हुआ है। जो कुछ जानने योग्य पद है वह मैंने जाना और जो कुछ पाने योग्य था वह मैंने पाया। अब मैं अपने स्वभाव में स्थित हुआ हूँ और मुझको कोई कल्पना नहीं रही। मैं अनन्त आत्मा, नित्य, शुद्ध, अच्युत, परमानन्द स्वरूप हूँ—सब जगत् मेरा ही स्वरूप है। हे भगवन् ! अन्तःपुर में इतनी सृष्टि के समा जाने का जो संशय मुझे था, वह

८६० ✻ योगवाशिष्ठ ✻

तुम्हारे वचनों से दूर हुआ और अब एक-एक राई में मुझको ब्रह्माण्ड भासित होते हैं और आत्मत्वभाव में दिखाई देते हैं। जैसे अनेक दर्पणों में अपना मुख ही दिखता है, वैसे ही मुझको सब ओर अपना आप ही भासता है। हे भगवन् ! तुम्हारे वचन मैंने आदि से अन्त तक सब सुने हैं, जो परम पावन, सार का परमसार और आत्मबोध का कारण हैं, उनको विचारने से मेरी भ्रान्ति निवृत्त हो गई। अब मैं अपने आप में स्थित हुआ हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कुन्ददन्तविश्रामप्राप्तिर्नाम द्विशताधिकाष्टषष्टितमसर्गः ॥ २६८ ॥

वाल्मीकिजी बोले, जब इस प्रकार कुन्ददन्त ने कहा, तब वशिष्ठजी परमपद पाने का कारण परम उचित वचन फिर कहने लगे कि हे राम ! अब कुन्ददन्त ने आत्म-अनुभव में विश्राम पाया है। इसको अब हस्तामलकवत् अपना आप अनुभवरूप जगत् भासित हो रहा है। आत्मा ही दृश्यरूप होकर दिखता है आत्मा ही द्रष्टारूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं। अपना अनुभव ही जगतरूप होकर दिखता है। वह अनुभव आकाश-सम शान्तरूप, अनन्त और अखण्ड सदा ज्यों का त्यों है। हे साधु ! वह नानारूप दिखता है परन्तु नाना नहीं है। वह सदा ज्यों का त्यों अचेत्य चिन्मात्र परमशून्य है, जिसमें शून्य भी शून्य हो जाता है। और चेत्य दृश्यरूप स्फुरण से रहित है, इसी कारण परमशून्य है। बोलता दिखता है, परन्तु परममौन है। हे राम ! उसमें जगत् कुछ बना नहीं। जैसे स्वप्न में पहाड़ दिखते हैं, सो न सत्य हैं और न असत्य वैसे ही यह जगत् सत्य-असत्य से विलक्षण है, क्योंकि कुछ बना नहीं—जो कुछ दिखता है सो आत्मा है। जैसे रत्नों का प्रकाश चमक होती है, वैसे ही आत्मा का प्रकाश जगत् है। और जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही ब्रह्म संवेदन से जगतरूप होकर भासित होता है। आदि में जो स्पन्दन फुर आई है, वही जगतरूप होकर स्थित है। पर आत्मा कार्य-कारण भाव से रहित है। जिसको प्रमाद है, उसको यह कार्य-कारणभाव सहित भासित होता है और उसके

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६१

लिए वैसा ही है। पर जो सत्य जानकर पाप करते हैं, उनके बड़े पाप उदय होते हैं। वे पहले स्थावररूप होकर फिर जङ्गम मनुष्य होते हैं। हे राम ! इस प्रकार यह ज्ञानसंवित् चैत्यसम्बन्धी होकर नाना प्रकार के रूप धारण करती है और प्रमाद से भिन्न-भिन्न भासित होती है, परन्तु स्वरूप से कुछ और नहीं होती, सदा अखण्डरूप है। जबतक प्रमाद होता है, तब तक जगत् का आदि और अन्त नहीं दिखता, जब प्रमाद से जागता है तब सब कल्पना मिट जाती है।

हे राम ! यह सब जगत् जो दिखता है, वह कुछ बना नहीं, वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जब जाग्रत् अवस्था का अभाव होता है और सुषुप्ति आती है तब उसमें न शुभ की कल्पना रहती है और न अशुभ की। उदय-अस्त की कल्पना से रहित केवल अद्वैतसत्ता रहती है। और जब फिर उसमें चैतन्य फुरता तब फिर स्वप्न की सृष्टि भासित होती है। कहीं स्थावर जङ्गम सृष्टि दिखती है। जिसमें संवेदन फुरता भासित होता है, वह जङ्गम कहलाता है, और जिसमें संवेदन का फुरना नहीं भासित होता वह स्थावर कहलाता है। परन्तु और कुछ नहीं, वही अद्वैत अनुभवसत्ता स्थावर-जङ्गम होकर भासित होती है। वैसे ही आत्मा का अनुभव यह जगत् भासित होता है। हे राम ! सृष्टि के आदि में परम सुषुप्तिसत्ता थी। उसमें संवेदन फुरने से जगत् प्रकट हुआ। यह वही संवेदनरूप जगत् है और जिस आत्मसत्ता में प्रकट हुआ है वही रूप है, भिन्न कुछ नहीं। जैसे हाथ, पाँव, नख, केशादिक सब अङ्ग शरीररूप हैं, वैसे ही यह स्थावरजङ्गम सृष्टि परमात्मा के अङ्ग हस्त पदादिक हैं। रोम सृष्टि और नख केशादिक स्थावर सृष्टि सब आत्म-रूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं बनी। जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभवरूप और सङ्कल्पपुर की रची सृष्टि सङ्कल्परूप होती है, वैसे ही यह सृष्टि अनुभवरूप है, और किसी कारण से नहीं उपजी-इससे ब्रह्मारूप ही है। ब्रह्म के सूक्ष्म अणु में सृष्टि उपजी है, सो उसका क्या रूप है ? ब्रह्म ही सृष्टि है और सृष्टि ही ब्रह्म है-ब्रह्म और जगत् में भेद कुछ नहीं। परन्तु अज्ञाननिद्रा से भिन्न-भिन्न भासित होता है।

८६२ ☸ योगवासिष्ठ ☸

राम ने पूछा, हे भगवन् ! निद्रा का कितना प्रमाण है और कितने काल तक वह रहती है ? सूक्ष्म अणु में सृष्टि कैसी उपजी है और कैसे स्थित है ? अणु में उसकी क्यों संज्ञा है और अनन्त क्योंकर है ? देवत असुरादिकरूप जिसे प्राप्त हुआ है वह चित्त क्या है ? वशिष्ठजी बोले हे राम ! अज्ञान-निद्रा अपने काल में तो अनादि है और नहीं जानी जाती कि कब हुई है और अन्त भी नहीं जाना जाता कि कब तक रहेगी। अज्ञानकाल में तो इसका आदि-अन्त प्रमाण कुछ नहीं भासित होता, पर बोध में इसका अत्यन्ताभाव दीखता है। चित्तसत्ता की जो अनन्तता पूछी सो वह तो अद्वैत चिन्मात्र आत्मसमुद्र है। उसमें सूक्ष्मभाव 'अहं-मस्मि' की जो संवित् फुरती है, उसका नाम चित्त है। उस चित्त ही में आगे चलकर जगत् होता है। शुद्ध चिन्मात्र में संवेदन चित्त फुरता है। उसमें यह जगत् है। वही चित्सत्ता देवता, असुर और जङ्गमरूप होकर भासित होती है। वही नाग, पिशाच, कीटादिक स्थावर-जंगमरूप दिखता है। वास्तव में चैतन्यसत्ता ही है, उससे भिन्न कुछ नहीं। सब चिदाकाश-रूप है, फुरने से नाना प्रकार का दिखता है।

हे राम ! परम शुद्ध चितअणु में मिलकर चित्त अनेक ब्रह्माण्ड धारण करता है और उस सूक्ष्म अणु में अनन्त ब्रह्माण्ड फुरते हैं, परन्तु वे उससे भिन्न नहीं हैं। जैसे एक पुरुष शयन करता है तो उसको स्वप्न में अनेक जीव दीखते हैं और उन जीवों में अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि फुरती है। तब अनेक सृष्टियाँ हो जाती हैं, वैसे ही सूक्ष्म चितअणु में अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं, परन्तु आत्मसत्ता से कुछ भिन्न नहीं बना। जैसे सूर्य की किरणों में अनन्त सूक्ष्म त्रसरेणु होते हैं, वैसे ही परमात्मसूर्य के चितअणु सूक्ष्म हैं। इस त्रसरेणु से भी सूक्ष्म चितअणु में जीवों को अपनी-अपनी अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं। हे राम ! जब तक चित्त फुरता रहता है, तबतक सृष्टियों का अन्त नहीं आता। असद्रूप जगत् भ्रम आगे देखे हैं और असत्य ही आगे देखेंगे। जब चित्त फुरने से रहित होता है, तब जगत् की कल्पना मिट जाती है। जैसे स्वप्न में सृष्टि दिखती है और बड़े व्यवहार होते हैं, पर जब प्राणी जाग उठता है, तब स्वप्न की सृष्टि व्यवहार की कल्पना

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६३

मिट जाती है और अपना अद्वैत आप ही भासित होता है, वैसे ही चित्त के ठहरने से सब भ्रम मिट जाता है। हे राम! सूक्ष्म चित्अणु की भी संज्ञा तब हुई है, जब इसको चित्त का सम्बन्ध हुआ है। जब चित् को अपने स्वभाव में स्थित करोगे, तब द्वैतकल्पना और सूक्ष्म स्थूलभाव मिट जावेंगे। इसकी सूक्ष्म संज्ञा अव्यक्त भाव से है, जो इन्द्रियों का विषय नहीं। इसमें अणुता है। यह जीव सूक्ष्म अणु में भी व्यापा हुआ है, इससे सूक्ष्म अणु कहाता है। और अनन्तता इस कारण है कि सबको धारण कर रहा है।

हे राम! यह जगत् अभावमात्र है। जैसे मरुस्थल में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जब यह जगत् ही नहीं है, तो इसका कारण किसे कहिये ? आदि-सृष्टि बिना कारण के उपजी है और फिर उसमें कारण-कार्य भासित होने लगे हैं, सो आभास की दृढ़ता से ऐसा हुआ है। जैसे बिना कारण के स्वप्न में आदि-सृष्टि बीज, वृक्ष, कुम्हार, मिट्टी और घट इकट्ठे प्रकट हो आते हैं। जब उस स्वप्न की दृढ़ता हो जाती है, तब कारण और कार्य भासित होते हैं, परन्तु जो सोया पड़ा है, उसको दृढ़ रूप से भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञानी को जगत् का कार्य-कारण दृढ़ भासित होता है और ज्ञानवान् को सब अपना रूप ही दिखता है। जैसे स्वप्न से जागने पर स्वप्न की सृष्टि अपना रूप ही दिखती है कि मैं ही था और कुछ न था, वैसे ही ज्ञानवान् को सब जगत् आकाशरूप दिखता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, पर्वत, वृक्ष, नदी आदि सब स्थावर-जङ्गम जगत् आकाशरूप है और संवेदन के फुरने से देख पड़ता है, वास्तव में भिन्न कुछ नहीं है। हे राम! यह जगत् चित्त में स्थित है। जैसे किसी पुरुष ने खम्भे में पुतलियों की कल्पना की तो उन पुतलियों के दो रूप होते हैं, एक शिल्पी के चित्त में फुरती हैं सो आकाशरूप हैं और एक खम्भे में कल्पित हैं, वे स्तम्भरूप हैं, पर शिल्पी के चित्त में नृत्य करती हैं। हे राम! और तो कुछ नहीं बना, सब स्तम्भरूप है और शिल्पी के चित्त में कल्पनामात्र है। वैसे ही चित्तरूपी शिल्पी

८६४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

की जगतरूपी पुतलियाँ कल्पनामात्र हैं। पर आत्मरूपी खम्भा ज्यों का त्यों है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसे पट के ऊपर मूर्ति लिखी हो तो उस मूर्ति का रूप पट ही है—पट से भिन्न कुछ नहीं—वह पट ही मूर्तिरूप दिखता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मा ही जगतरूप होकर भासित होता है। आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं—जैसे ब्रह्म आकाशरूप है वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है। जगत् आधार है और उसमें ब्रह्म बसनेवाला है। वैसे ही ब्रह्म आधार है और उसमें जगत् बसनेवाला है।

हे राम! जगत् में जितने विद्या और अविद्यारूप समूह हैं, वे सब संकल्प से रचित हैं और वास्तव में सब आत्मरूप हैं। समता, सत्ता और निर्विकारता आदि और इनसे विपरीत अविद्यारूप सब एक ही रूप हैं। सब एक ही में स्फुरते हैं और एक ही रूप हैं। जैसे अनुभवरूप स्वप्न-जगत् अनुभव में स्थित होता है सो सब आत्मरूप होता है, वैसे ही यह सब जगत् ब्रह्मरूप है—ब्रह्म से भिन्न न कुछ वर की कल्पना है और न शाप की कल्पना है। ब्रह्मसत्ता निर्विकार अपने आपमें स्थित है। उसमें न कारण है, न कार्य। जैसे तालाब, नदी और मेघ जल ही होते हैं, वैसे ही सब ब्रह्मरूप है। राम ने पूछा, हे भगवन्! वर और शाप के कर्त्ता तो परिच्छिन्न हैं और कारण बिना तो कार्य नहीं बनता। तब तुम कैसे कहते हो कि कारण-कार्य कोई नहीं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध आत्मसत्ता चिदाकाश का किञ्चन जगत् होता है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता में जगत् प्रकट होते हैं। और जैसे तरङ्ग जल रूप होते हैं, वैसे ही जगत् आत्मरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसे आदि में परमात्मा से सृष्टि का स्फुरण हुआ है, वैसे ही स्थित है अन्यथा नहीं होता। सब जगत् संकल्प है। अनेक प्रकार की वासना संवेदन में स्फुरती है, पर जिनको स्वरूप का विस्मरण हुआ है, उनको यह जगत् सत्यरूप दिखता है। जो उनको विचार उत्पन्न हो तो वही काम है, जिस काल में विचार उत्पन्न होता है और उसी काल में अज्ञाननिद्रा का अभाव होता है। हे राम! जब विचार अभ्यास करके

  • निर्वाण प्रकरण * ८६५

मन तद्रूप होता है, तब यथाभूत दर्शन होता है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपना ही रूप भासित होता है, क्योंकि वह अपने आपमें स्थित है । सबके अधिष्ठान आत्मसत्ता में अहंप्रतीति होती है, इस कारण अपने आपमें सृष्टि भासित होती है । जैसे स्पन्दन फुरते हैं, वैसे ही उनकी सिद्धि होती है । पहले निरावरण-दृष्टि होती है, निरावरण-दृष्टि से सब संकल्प सिद्ध होते हैं, क्योंकि यह सब जगत् आत्मा में संकल्प का रचा हुआ है और उसमें इसको अहंप्रत्यय हुआ है । हे राम ! जो यह संकल्प उठता है कि यह कार्य ऐसे हो तो वह वैसे ही होता है ।

हे राम ! शुद्ध संवेदन में जैसा संकल्प होता है, वही होकर भासित होता है । यह जगत् संकल्परूप ही है, संकल्प से भिन्न नहीं । इसलिए वर और शाप का और कोई कारण नहीं; वर और शाप भी संकल्परूप हैं । उस संकल्प से जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे किसी समवायकारण से तो नहीं उत्पन्न हुए, संकल्प ही से हुए हैं, इससे सब अकारण हैं । ब्रह्मरूपी समुद्र में तरङ्ग उठते हैं तो कारण और कार्य मैं तुमसे क्या कहूँ ? सब जगत् ब्रह्मरूप है । द्वैत और एक की कल्पना कुछ नहीं । हे राम ! मुझको सदा ब्रह्मसत्ता ही दिखती है, कार्य कारण कोई नहीं दिखता । जैसे स्वप्न में किसी के घर पुत्र हुआ और वह बड़े उत्साह को प्राप्त हुआ, पर जब जाग्रत् का संस्कार चित्त में आया, तब उसका पिता ही उपजा नहीं, तो पुत्र कैसे कहिये ? तब तो सब अपने आपही हो जाता है, न कोई कारण दिखता है और न कार्य दिखता है । जो स्वप्न में सोया है, उसको जैसे दिखता है, वैसे ही यह भी है । जैसे वर और शाप का आसरा संकल्प है और संकल्प ही वर और शाप होकर भासित होता है और अकारण ही होता है । जिसको शुद्ध संवेदन से एकता हुई है, वह निवरण है और उसमें जैसे फुरने का आभास फुरता है, वैसा ही सिद्ध होता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! एक ऐसे हैं, जिनको आवरण है और उनका संकल्प जैसा फुरता है-वर दें अथवा शाप दें-वैसा ही हो जाता है । स्वरूप का साक्षात्कार उनको नहीं हुआ, पर शुभ कर्म उनमें प्रत्यक्ष मिलते हैं । तो शुभ कर्म ही वर और

८६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

शाप के कारण हुए, तुम कैसे कहते हो कि निरावरण पुरुष का संकल्प सिद्ध होता है ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र सत्ता ही चित् धातु कहाती है । उस चित्धातु में जो आभास फुरता है, वही संवेदन कहलाता है । वह संवेदन जब फुरता है, तब जीव जानता है कि 'मैं ब्रह्मा हूँ'। तो संवेदन ने ही अपने को जगत् का पितामह जाना और उसी ने आगे मनोराज्य की कल्पना की । तब पञ्चभूतों का ज्ञान हुआ कि शून्यरूप आकाश है, स्पन्दनरूप वायु है, उष्णरूप अग्नि है, द्रवतारूप जल है और कठोररूप पृथ्वी है । फिर उसी से देश और काल की कल्पना हुई । स्थावर-जङ्गम पदार्थ की कल्पना से वेद शास्त्र, धर्म, अधर्म का स्फुरण हुआ, जिससे यह निश्चय हुआ कि यह तपस्वी है और इसने तप किया है, इसके कहने से वर हो । पर स्वरूप के साक्षात्कार से रहित होने पर भी उसका कहा होना उसके तप का फल है । आदि में संकल्प ऐसे हुआ है तो वर और शाप का कर्त्ता तपस्वी नहीं, उसका अधिष्ठान वही संवेदन है, जिससे आदि संकल्प उपजा है । हे राम ! वर और शाप संकल्परूप हैं, संकल्प संवेदन से फुरा है और संवेदन आत्मा का आभास है, तो मैं कारण और कार्य क्या कहूँ ? और जगत् क्या कहूँ ? आत्मा का आभास संवेदन ब्रह्मा है, जिसने आगे संकल्पपुर की सृष्टि रची है । हम तुम आदि सब उसके संकल्प में हैं । वह ब्रह्मा निराकार, निराधार और निरालम्ब स्थित है । किमी आकार को नहीं प्राप्त हुआ, इससे उसका विश्व भी वही रूप जानो ।

हे राम ! जैसे उसका स्पन्दन हुआ है, वैसे ही वह स्थित है; अन्यथा नहीं होता । जो वही विपर्यय करे तो हो अन्यथा नहीं हो सकता । अग्नि में उष्णता, वायु में स्पन्दन इत्यादि जो गुणधर्म हैं, वे अपने-अपने स्वभाव में स्थित हैं और मुझको सब ब्रह्मरूप हैं । जैसे शरीर में हाड़-मांस से भिन्न कुछ नहीं होता, वैसे ही मुझको ब्रह्म से भिन्न नहीं भासित होता । जैसे घट में मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं होता और काष्ठ की पुतली की काष्ठ से भिन्न चेष्टा नहीं होती, वैसे ही जगत्

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">८६७</span>

ब्रह्म से भिन्न नहीं होता । हे राम ! यह सब जगत् जो तुमको भासता है, ब्रह्म ही है । ब्रह्म ही फुरने से नाना प्रकार जगत् के रूप में भासित होता है । जैसे समुद्र अपनी द्रवता से तरङ्ग, बुलबुले, फेन आदि होकर भासित होता है, वैसे ही ब्रह्मसंवेदन से जगतरूप होकर दिखता है, पर ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है । जैसे पर्वत में जल गिरता है, सो कण होकर दिखता है, और जब गिरकर ठहर जाता है, तब समुद्ररूप होता है, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं होता, तैसे ही जब चित्त फुरता है, तब नाना प्रकार का जगत् भासित होता है और जब ठहर जाता है, तब सब जगत् एक अद्वैतरूप दिखता है, पर ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं होता । ब्रह्म ही स्थावर जंगमरूप दिखता है । जहाँ पुर्यष्टका का सम्बन्ध नहीं दिखता, वह अजंगम या स्थावर कहाता है, और जहाँ पुर्यष्टका का सम्बन्ध होता है, वह जंगमरूप दिखता है, परन्तु आत्मा में दोनों तुल्य हैं । जैसे एक ही हाथ की अँगुली है, जिसको उष्णता अथवा शीतलता का संयोग होता है, वह फुरने लगती है और जिसको शीत-उष्ण का संयोग नहीं होता वह नहीं फुरती, वैसे ही जिस आकार को पुर्यष्टका का संयोग है, वह फुरता है और चेतनता दिखती है, और जिसको पुर्यष्टका का संयोग नहीं होता, उसमें जड़ता भासित होती है । जड़ भी दो प्रकार के हैं—एक को पुर्यष्टका का संयोग है और जड़ है, और दूसरे को पुर्यष्टका का संयोग नहीं है और जड़ है ।

वृक्ष और पर्वतों को पुर्यष्टका का संयोग है, परन्तु घनसुषुप्ति जड़ता में स्थित हैं, इस कारण जड़ भासित होते हैं और मृत्तिका पुर्यष्टका से रहित है, इस कारण जड़ है, परन्तु वास्तव में स्थावर, जंगम; इष्ट, अनिष्ट; वर, शाप; देश, काल, पदार्थ; सभी ब्रह्मरूप हैं, और ब्रह्मसत्ता ही ऐसे स्थित हुई है, जैसे अपने अनुभव में संकल्पनगर नाना प्रकार का दिखता है, परन्तु संकल्परूप है—संकल्प से भिन्न कुछ नहीं । जैसे मृत्तिका की सेना अनेक प्रकार की होती है, परन्तु मृत्तिकारूप है—मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही सब अर्थ धारण करनेवाली चैतन्य-धातु नाना प्रकार के आकार को प्राप्त होती है, परन्तु चेतनता से भिन्न

=६६= ❇ योगवाशिष्ठ ❇

कुछ नहीं होती। हे राम! धातु उसको कहते हैं, जो अर्थ को धारण करे। जितने पदार्थ तुमको दिखते हैं, वे सब अर्थरूप हैं और वस्तुरूप जो धातु है, वह आत्मसत्ता है। उसने दो अर्थ धारण किये हैं-एक स्वप्न-अर्थ और दूसरा बोध-अर्थ-स्वप्न-अर्थ में तो नानात्व भासित होता है और बोध-अर्थ में एक अद्वैत सत्ता भासित होती है। जैसे एक ही धातु मिलने और बिछुड़ने से दो अर्थ रखती है, जो वे परस्पर प्रतियोगी शब्द हैं, परन्तु एक ही ने धारण किये हैं, वैसे ही स्वप्न और बोध-अर्थ, इन दोनों को आत्मसत्ता ने धारण किया है। जैसे तरंग और बुलबुले जल-रूप हैं, वैसे ही जगत् ब्रह्मरूप है। जो ज्ञानवान् हैं, उनको सब ब्रह्मरूप दिखता है और अज्ञानी को नानात्व भासित होता है। इससे तुम स्वभाव में निश्चय रखकर देखो, सब ब्रह्मरूप है-भिन्न कुछ नहीं।

इति श्रीयो० ब्रह्मप्रतिपादनंनाम द्विशताधिकैकोनसप्ततितमसर्गः ॥२६९॥

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो सब ब्रह्म ही है तो नीति क्या है और नाना प्रकार के पदार्थ क्यों भासित होते हैं? तुम कहते हो कि जगत् संकल्प में रचित है तो हे भगवन्! ये जो असंकरूप पदार्थ हैं, उनकी संज्ञा की नहीं जाती, तब इन पदार्थों में से एक-एक का स्वभाव अचलरूप होकर कैसे स्थित है? सब देवताओं में सूर्य का प्रकाश क्यों अधिक है और एक ही सूर्य में दिन और रात्रि छोटे बड़े क्यों होते हैं, यह विचित्रता क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध चिन्मात्रसत्ता में अकस्मात् जो आभास फुरा है, उस आभास का नाम नीति है। यह सृष्टि भी आभासमात्र है, किसी कारण से नहीं उपजी जिसके आश्रय से आभास फुरता है, वही वस्तु अधिष्ठान होती है। इससे सब जगत् ब्रह्मरूप है और चिन्मात्रसत्ता अपने आप में स्थित है। वह न उदय होती है और न अस्त होती है। वह परिणाम से रहित सदा अद्वैतरूप स्थित है, उसमें न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। तीनों अवस्था आभासमात्र हैं। पर चैतन्यसत्ता में इनसे द्वैत नहीं बना। ये तीनों इसी का स्वभाव और प्रकाशरूप हैं-इससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे आकाश और शून्यता, वायु और निस्पन्द, अग्नि और उष्णता और

❉ निर्वाण प्रकरण ❉ <span style="float:right;">८६६</span>

कपूर और सुगन्ध में भेद नहीं है, वैसे ही जाग्रत् आदि जगत् और ब्रह्म में भेद नहीं है । हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र में जो चित्तभाव हुआ है, उसमें चैतन्य आभास फुरा है, और उसमें जैसा संकल्प फुरा है, वैसे ही स्थित हुआ है कि यह इस प्रकार हो और इतने काल रहे । उसी संकल्प निश्चय का नाम नीति है ।

जैसे आदि संकल्प दृढ़ हुआ है, वैसे ही अबतक पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश अपने-अपने भाव में स्थित हैं और अपने स्वभाव को नहीं त्यागते । जबतक उनकी नीति है, तब तक वे वैसे ही जगत् सत्ता में स्थित हैं । हे राम ! इसका नाम नीति है । जैसे आदि-संकल्प रक्खा है, वैसे ही स्थित है । वह वास्तव में आभासरूप है । अकस्मात् यह आभास फुरा है, सो किसी सूक्ष्म अणु में प्रकट हुआ है । जैसे समुद्र के किसी स्थान में तरङ्ग, बुलबुले आदि उठते हैं, सम्पूर्ण समुद्र में नहीं उठते, वैसे ही जहाँ संवेदन रूप जैसा स्फुरण होता है, वैसे ही स्थित होता है । यही नीति है । जैसे तरङ्ग और बुलबुले समुद्र से भिन्न नहीं है । वैसे ही नीति आत्मा से भिन्न नहीं है । जैसे द्रवता से समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा में संवेदन से नीति और जगत् जो फुरते हैं, वे वही रूप हैं—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे किसी ने कहा कि चन्द्रमा का प्रकाश है तो चन्द्रमा और प्रकाश में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है । यह विश्व आत्मा का स्वभाव है । जैसे एक ही काल की, दिन, पक्ष, वार, मास, वर्ष, युग, कल्प इत्यादि बहुत संज्ञाएँ हैं, परन्तु काल एक ही है, वैसे ही जगत् के भिन्न-भिन्न नाम हैं, सो सब ब्रह्म ही हैं । हे राम ! जब संवेदन चित्तरूप होता है, तब प्रथम शब्द तन्मात्रा जगती है और उससे आकाश उपजता है, जिसका स्वभाव शून्यता है । फिर जब उसने स्पर्शतन्मात्रा को चेता, तब उससे इसमें वायु उपजा । वायु का स्पन्दन स्वभाव है । फिर रूप-तन्मात्रा को चेता, तब उनसे अग्नि प्रकट हुई, जिसका स्वभाव उष्ण है । फिर रसतन्मात्रा को चेता, तब उससे जल प्रकट हुआ, जिसका स्वभाव द्रव है । फिर गन्ध-तन्मात्रा को चेता, तब उससे पृथ्वी प्रकट हुई, जिसका स्वभाव

८७० ✹ योगवाशिष्ठ ✹

स्थिर है। इस प्रकार पञ्चभूत उपजे। हे राम ! आदि में जो शब्द-तन्मात्रा उपजी है, वह जितने शब्दसमूह हैं, उनका बीज है। सब उसी से उत्पन्न हुए हैं, पदार्थ, वाक्य, वेद, शास्त्र, पुराण सब उसी से उपजे हैं। इसी प्रकार पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश का जो कार्य है, वही उन सबका बीज-तन्मात्रा है। उस तन्मात्रा का बीज वह संवित्सत्ता है।

हे राम ! अब इन तत्त्वों की खानि सुनो। पृथ्वी अणु भी होती है और एकदला भी होती है। पृथ्वी तो एक है और अणु भी वही है। वैसे ही सब तत्त्वों को समझ देखना। पृथ्वी की खानि भू-पीठ है, जो सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करती है। जल की खानि समुद्र है, जो सब पदार्थों में रसरूप होकर स्थित है। अग्नि का तेज जो प्रकाश है, उसकी समष्टि सूर्य है। सब स्पन्दनों की समष्टि पवन है और सम्पूर्ण शून्य पदार्थों की खानि आकाश है। इस प्रकार ये पाँचों तत्त्व संकल्प से उपजे हैं। जैसे बीज से अंकुर उपजता है, वैसे ही ये तत्त्व संकल्प से उपजे हैं। संकल्प संवेदन से उपजा है और संवेदन आत्मा का आभास है। वह अद्वैत, अच्युत, निर्विकल्प और सर्वदा अपने आपमें स्थित है। उसी के आश्रय से संवेदन आभास उपजा है। फिर संवेदन से संकल्प उपजा है और संकल्प से जगत् बन गया है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं और लीन होते हैं, वैसे ही संकल्प से जगत् उपजा है और फिर संकल्प ही में लीन होता है। जैसे तरंग जलरूप है, वैसे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश सब चैतन्यरूप हैं। सब पदार्थ जो देखे सुने जाते हैं और नहीं देखे सुने जाते, वे सब चैतन्यरूप हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। वही आत्मा इस प्रकार होता है। स्वप्न में अपना अनुभव ही पदार्थ होकर दिखता है, परन्तु कुछ बना नहीं। नाना प्रकार का दिखता है, तो भी नाना नहीं है, वैसे ही जगत् नाना प्रकार का दिखता है, तो भी कुछ बना नहीं।

जैसे एक निद्रा के दो रूप हैं-एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति-जब फुरना होता है तब स्वप्न की सृष्टि दिखती है और जब फुरना निवृत्त हो जाता है, तब सुषुप्ति होती है, और जैसे वायु के दो रूप हैं; जब स्पन्दन

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८७१

होता है, तब भासित होती है और जब निस्पन्द होती है तब नहीं भासित होती वैसे ही जब संवेदन फुरता है, तब जगत् दिखता है और जब नहीं फुरता, तब जगत् भी नहीं दिखता—इसी का नाम महाप्रलय है-पर दोनों आत्मा के आभास हैं। हे राम! संकल्परूप ब्रह्मा ने आत्मा में आकाश, पृथ्वी, नक्षत्र, चक्र इत्यादि क्रम से रचे हैं। जैसे बालक अपने में संकल्प रचे, वैसे ही ब्रह्मा ने रचा है। उसने एक भूगोल रचा है, जिस पर नक्षत्रचक्र रचा है और उस चक्र के दो भाग किये हैं, जो अन्योन्य सम्मुख स्थित हैं। जब सूर्य उसके सम्मुख होता है, तब दिन और रात्रि का प्रणाम साठ घड़ी होता है। जब सूर्य उस नक्षत्रचक्र के ऊपर की ओर उदय होता है, तब दिन बड़े होते हैं और जब नीचे की ओर उदय होता है, तब दिन छोटे हो जाते हैं। निदान ज्यों-ज्यों सूर्य क्रमशः ऊपर से नीचे की ओर उदय होता है, त्यों-त्यों दिन छोटे होते जाते हैं और रात्रि बढ़ती जाती है। और जब छः मास के उपरान्त पौष त्रयोदशी से सूर्य क्रमशः ऊपर को उदय होता है, तब दिन बढ़ता जाता है। आषाढ़ की द्वादशी से लेकर पौष की त्रयोदशी तक रात्रि बढ़ती है और दिन घटता है, और फिर रात्रि घटती जाती है और दिन बढ़ता जाता है। जब सूर्य उस चक्र के मध्य में उदय होता है, तब दिन और रात्रि समान हो जाते हैं। परन्तु संवेदनरूप ब्रह्मा का सब संकल्प विलास है। जैसे शिल्पी शिला में पुतलियों की कल्पना करता और चेष्टा करता है, पर बना कुछ नहीं, शिला ही अपने घनस्वभाव में स्थित होती है, वैसे ही चित्तरूपी शिल्पी आत्मारूपी शिला में जगतरूपी पुतलियों की कल्पना करता है, परन्तु बना कुछ नहीं। ब्रह्मसत्ता ही सदा अपने आपमें स्थित है।

संवेदन फुरने से जब उसे रूप देखने की इच्छा होती है, तब चक्षुइन्द्रिय बन जाती है, जो रूप को ग्रहण करती है। जब स्पर्श की इच्छा होती है, तब त्वचा इन्द्रिय बन जाती है, जो स्पर्श को ग्रहण करती है। जब गन्ध की इच्छा होती है, तब घ्राण इन्द्रिय बनकर गन्ध ग्रहण करती है। जब शब्द सुनने की इच्छा होती है, तब श्रवण इन्द्रिय बन जाती