योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1659, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८५६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
जगत ब्रह्मरूप ही दिखेगा—इसी का नाम बोध है। हे साधो ! जगत् नाना प्रकार का होकर दिखाई देता है, तो भी नानात्व कुछ नहीं। जैसे समुद्र में द्रवता से नाना प्रकार के तरङ्ग, बुलबुले और भँवर दिखते हैं, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं वैसे ही जो पदार्थ दिखते हैं, वे सब आत्मरूप हैं। और जितने जीव बोलते दिखते हैं वे भी महा मौनरूप हैं, कुछ बने नहीं। चित्त के फुरने मे नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, परन्तु आत्मा से भिन्न कुछ नहीं—वही चिदाकाश ज्यों का त्यों स्थित है। जो कुछ आत्मा से भिन्न विद्यमान दिखता है, उसको अविद्यमान जानो। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि जितना जगत् भासित होता है वह सब स्वप्न का विलास है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही भ्रमदृष्टि से आत्मा में जगत् दिखता है—कुछ बना नहीं। जैसे सुषुप्ति में पुरुष सोया होता है, उसको फुरना नहीं फुरता और फिर उसी सुषुप्ति से स्वप्न की सृष्टि उपज आती है, सो वह बनी कुछ नहीं, वही सुषुप्तिरूप है, पर स्वप्न में स्थित पुरुष को सत्य लगता है, और जो अनुभव में जागा है उसको सुषुप्तिरूप है, वैसे ही इस जगत् को जानो।
आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जब जागकर देखोगे, तब सब चिन्मात्र ही भासित होगा, जो शान्तरूप, अनन्त और सदा अपने आपमें स्थित है। उसमें जो जगत् दिखता है, वह सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं। सत्य इस कारण से नहीं कि आभासमात्र और नाशवान् है और असत्य इस कारण नहीं कि प्रकट दिखता है। पर वास्तव में आत्मसत्ता से भिन्न नहीं है। भाव, अभाव, सुख, दुःख, उदय, अस्त सब वही आत्मसत्ता इस प्रकार भासित होती है। जैसे एक ही निद्रा के स्वप्न और सुषुप्ति दो पर्याय हैं, वैसे ही जगत् और आत्मा, दोनों एक ही सत्ता के पर्याय हैं। जैसे एक ही वायु स्पन्दन और निष्पन्द दो रूप होती है, वैसे ही आत्मसत्ता के दोनों रूप हैं। जब संवेदन नहीं फुरता, तब अनिर्वचनीय होती है और जब अहंभाव को लेकर फुरती है, तब संकल्परूपी सृष्टि बन जाती है—आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, तत्त्व, नक्षत्र, चक्र, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, जल का नीचे चलना, अग्नि का ऊपर जाना,