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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1660, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1660

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ =५७

तारागण का प्रकाशमान होना आदि। पृथ्वी-स्थित भूत आदि स्थावर जङ्गमरूप सृष्टि अपने स्वभाव सहित भासित होती है और शुभ-अशुभ कर्म होते हैं। उनमें सुख-दुःख फल की नीति होती है। परन्तु आत्म-सत्ता ही इस प्रकार भासित होती है। जैसे तू मनोराज्य से स्वप्ननगर कल्पित कर ले और उसमें अनेक प्रकार की चेष्टा करे, तो जब तक संकल्प होता है, तब तक वही सृष्टि स्थित होती है और संकल्प मिट जाने पर सृष्टि लय हो जाती है। तो और वस्तु कुछ न हुई, तेरा अनुभव ही सृष्टिरूप होकर स्थित हुआ। वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है, और कुछ नहीं।

कुन्ददन्त ने पूछा, हे तपस्वी! संकल्प तो पूर्वस्मृति को लेकर फुरता है। ब्रह्मा में मनोराज्य संकल्प की सृष्टि किस संस्कार को लेकर फुरती है? यह संशय मेरा निवृत्त करो। कदम्बतपा बोले, हे साधु! यह सम्पूर्ण सृष्टि किसी संस्कार से नहीं उत्पन्न हुई, भ्रम से भासित होती है। जैसे स्वप्न में यदि मनुष्य अपने को मृतक हुआ जानता है, तब उसको पूर्व के संस्कार की स्मृति तो नहीं होती, वह अपूर्व ही लगती है, वैसे ही ये पदार्थ जो तुझको दिखते हैं, सो अपूर्व हैं, किसी स्मृति से नहीं हुए। स्मृति और अनुभव तो जगत् ही में उत्पन्न हुए हैं, पर जब जगत् का फुरना न था तब स्मृति और अनुभव भी न थे। जब जगत् प्रगटा, तब ये भी प्रगटे हैं, इससे सम्पूर्ण जगत् अपूर्व है और भ्रम से भासित होता है। जैसे स्वप्न में मरा व्यक्ति किसी कुल में अपना जन्म देखे और उसको ऐसे जान पड़े कि कुल चिरकाल से चला आता है, पर जब जाग उठे, तब पूर्व जन्म किसको कहे और स्मृति किसकी करे? न कहीं जन्म रहता है और न कुल रहता है। वैसे ही ज्ञानवान् को यह जगत् आकाशरूप दिखता है। तब मैं तुझको पूर्व की स्मृति क्या कहूँ? हे ब्राह्मण! और कुछ बना नहीं, आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है। जिससे यह सब जगत् हुआ है, जिसमें यह सब है और जो सब है, वही सर्वात्मा है। जो वही है तो दूसरा किसको कहूँ? इससे यह जानकर तुम विचारो, तब सब दुःख तुम्हारे नष्ट होंगे। हे साधु! कर्ता, कर्म, करण संप्रदान, अपादान और अधिकरण ये छः