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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1661, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1661

८५८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

कारक ब्रह्मरूप है। कर्त्ता कर्म के करनेवाले को कहते हैं। कर्म करने की संज्ञा है। कारण क्रिया का साधक है। सम्प्रदान जिस निमित्त हो। अपादान जिसमे लय कीजिये और अधिकरण जिसमें कीजिये।

हे साधु! ये छः कारक ब्रह्मरूप हैं। विश्व का कर्त्ता भी ब्रह्म है; विश्वकर्मा भी ब्रह्म है; विश्व का साधक भी ब्रह्म है; जिसके निमित्त यह विश्व है, वह भी ब्रह्म है और जिसमें यह विश्व होता है वह भी ब्रह्म है। ऐसे सर्वात्मा को नमस्कार है। उस सर्वात्मा को ऐसे जानना ही उसकी परम पूजा है। ऐसे ही तुम भी पूजन करो। हे साधु! अब तुम जाओ और अपने मनोवाञ्छित में विचरो। तुम्हारे बान्धव तुम्हारा राह देखते होंगे। उनके पास जावो—जैसे कमल के पास भ्रमर जाते हैं-और मैं भी समाधि में स्थित होता हूँ। जो कुछ गुह्य बात है वह भी मैं कहता हूँ। जिसमे कोई सुख पाता है, वही करता है। मुझको तो जगत् दुःखदायक देख पड़ता है, इस कारण मैं समाधि में लगता हूँ। हे साधु! यद्यपि मुझे सब अवस्था तुल्य हैं; तो भी चित्त की वृत्ति जो संसार के कष्ट से दुःखित होकर आत्मपद में स्थित हुई है, उस स्थिति के सुख के संस्कार से वह फिर उसी ओर दौड़ती है। अब तुम जाओ मैं समाधि में स्थित होता हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिक-सप्तषष्टितमसर्गः ॥ २६७ ॥

कुन्ददन्त बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर वह फिर समाधि में लगा और मन तथा इन्द्रियों की क्रिया से रहित हुआ-मानो कागज पर मूर्ति लिखी हो। तब फिर हम उसे बहुत जगाते रहे और बड़े शब्द किये, परन्तु वह न जागा। निदान हम वहाँ से चले और उस ब्राह्मण के घर आये तो उसके घर में बड़ा उत्साह हुआ। यथासमय क्रम से वे सातों भाई मर गये, पर आठवाँ मेरा मित्र जीता रहा। वह भी कुछ दिन में मृतक हो गया। तब मुझे बहुत शोक हुआ कि मेरा प्रियतम भी मर गया, अब मैं क्या करूँ। हे राम! तब मैंने विचार किया कि फिर मैं कदम्बतपा के पास जाऊँ तो मेरा दुःख नष्ट होगा। निदान मैं

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