योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1662, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८५६
वहाँ गया और तीन मास पर्यन्त उसके पास रहा। उसको मैं जगाता रहा, परन्तु वह न जागा। पर जब तीन मास हो चुके, तब वह जागा। मैंने उसको प्रणाम करके कहा, हे मुनीश्वर ! वे तो अपने-अपने राज्य को भोगने लगे और मैं अकेला कष्ट पा रहा हूँ। इससे मेरा दुःख तुम नष्ट करो-मैं तुम्हारी शरण आया हूँ। कदम्बतपा बोले, हे साधु ! मेरे उपदेश से तुझको स्वरूप का साक्षात्कार न होगा; क्योंकि तुझको अभ्यास नहीं है। अभ्यास के बिना स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता। इससे मेरा कहना भी व्यर्थ होगा। मैं दुःख नष्ट होने का एक उपाय तुझसे कहता हूँ, उससे तू मेरे समान दुःख से रहित होकर अनन्त आत्मा होगा। हे साधु ! अयोध्यानगरी के राजा दशरथ के गृह में रामजी पुत्र हुए हैं, जिनको वशिष्ठजी बड़ी सभा में मोक्ष उपाय का उपदेश करेंगे। वहाँ तू जा तो तुझको भी स्वरूप की प्राप्ति होगी—संशय मत कर। हे राम ! जब इस प्रकार तपस्वी ने मुझसे कहा, तब मैं वहाँ से चलकर तुम्हारे पास आया हूँ। जो कुछ तुमने पूछा था सो सब वृत्तान्त मैंने कहा और जो कुछ देखा था वह भी कहा। राम बोले, हे वशिष्ठजी ! जो वृत्तान्त मैंने उससे सुना था, वह प्रभु के आगे कहा। वह कुन्ददन्त भी आपके पास बैठा है। अब इससे पूछिये कि स्वरूप की प्राप्ति हुई अथवा नहीं हुई।
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब इस प्रकार राम ने कहा, तब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी कुन्ददन्त की ओर कृपादृष्टि करके बोले, हे ब्राह्मण ! यह जो मैंने मोक्ष का उपाय सम्पूर्ण कहा है, उसको सुनकर तूने क्या जाना ? कुन्ददन्त बोले, हे सब संशयों के निवृत्त करनेवाले ! तुम्हारे वचनरूपी प्रकाश से मेरे अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश हुआ है। जो कुछ जानने योग्य पद है वह मैंने जाना और जो कुछ पाने योग्य था वह मैंने पाया। अब मैं अपने स्वभाव में स्थित हुआ हूँ और मुझको कोई कल्पना नहीं रही। मैं अनन्त आत्मा, नित्य, शुद्ध, अच्युत, परमानन्द स्वरूप हूँ—सब जगत् मेरा ही स्वरूप है। हे भगवन् ! अन्तःपुर में इतनी सृष्टि के समा जाने का जो संशय मुझे था, वह