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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1663, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1663

८६० ✻ योगवाशिष्ठ ✻

तुम्हारे वचनों से दूर हुआ और अब एक-एक राई में मुझको ब्रह्माण्ड भासित होते हैं और आत्मत्वभाव में दिखाई देते हैं। जैसे अनेक दर्पणों में अपना मुख ही दिखता है, वैसे ही मुझको सब ओर अपना आप ही भासता है। हे भगवन् ! तुम्हारे वचन मैंने आदि से अन्त तक सब सुने हैं, जो परम पावन, सार का परमसार और आत्मबोध का कारण हैं, उनको विचारने से मेरी भ्रान्ति निवृत्त हो गई। अब मैं अपने आप में स्थित हुआ हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कुन्ददन्तविश्रामप्राप्तिर्नाम द्विशताधिकाष्टषष्टितमसर्गः ॥ २६८ ॥

वाल्मीकिजी बोले, जब इस प्रकार कुन्ददन्त ने कहा, तब वशिष्ठजी परमपद पाने का कारण परम उचित वचन फिर कहने लगे कि हे राम ! अब कुन्ददन्त ने आत्म-अनुभव में विश्राम पाया है। इसको अब हस्तामलकवत् अपना आप अनुभवरूप जगत् भासित हो रहा है। आत्मा ही दृश्यरूप होकर दिखता है आत्मा ही द्रष्टारूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं। अपना अनुभव ही जगतरूप होकर दिखता है। वह अनुभव आकाश-सम शान्तरूप, अनन्त और अखण्ड सदा ज्यों का त्यों है। हे साधु ! वह नानारूप दिखता है परन्तु नाना नहीं है। वह सदा ज्यों का त्यों अचेत्य चिन्मात्र परमशून्य है, जिसमें शून्य भी शून्य हो जाता है। और चेत्य दृश्यरूप स्फुरण से रहित है, इसी कारण परमशून्य है। बोलता दिखता है, परन्तु परममौन है। हे राम ! उसमें जगत् कुछ बना नहीं। जैसे स्वप्न में पहाड़ दिखते हैं, सो न सत्य हैं और न असत्य वैसे ही यह जगत् सत्य-असत्य से विलक्षण है, क्योंकि कुछ बना नहीं—जो कुछ दिखता है सो आत्मा है। जैसे रत्नों का प्रकाश चमक होती है, वैसे ही आत्मा का प्रकाश जगत् है। और जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही ब्रह्म संवेदन से जगतरूप होकर भासित होता है। आदि में जो स्पन्दन फुर आई है, वही जगतरूप होकर स्थित है। पर आत्मा कार्य-कारण भाव से रहित है। जिसको प्रमाद है, उसको यह कार्य-कारणभाव सहित भासित होता है और उसके