योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1664, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६१
लिए वैसा ही है। पर जो सत्य जानकर पाप करते हैं, उनके बड़े पाप उदय होते हैं। वे पहले स्थावररूप होकर फिर जङ्गम मनुष्य होते हैं। हे राम ! इस प्रकार यह ज्ञानसंवित् चैत्यसम्बन्धी होकर नाना प्रकार के रूप धारण करती है और प्रमाद से भिन्न-भिन्न भासित होती है, परन्तु स्वरूप से कुछ और नहीं होती, सदा अखण्डरूप है। जबतक प्रमाद होता है, तब तक जगत् का आदि और अन्त नहीं दिखता, जब प्रमाद से जागता है तब सब कल्पना मिट जाती है।
हे राम ! यह सब जगत् जो दिखता है, वह कुछ बना नहीं, वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जब जाग्रत् अवस्था का अभाव होता है और सुषुप्ति आती है तब उसमें न शुभ की कल्पना रहती है और न अशुभ की। उदय-अस्त की कल्पना से रहित केवल अद्वैतसत्ता रहती है। और जब फिर उसमें चैतन्य फुरता तब फिर स्वप्न की सृष्टि भासित होती है। कहीं स्थावर जङ्गम सृष्टि दिखती है। जिसमें संवेदन फुरता भासित होता है, वह जङ्गम कहलाता है, और जिसमें संवेदन का फुरना नहीं भासित होता वह स्थावर कहलाता है। परन्तु और कुछ नहीं, वही अद्वैत अनुभवसत्ता स्थावर-जङ्गम होकर भासित होती है। वैसे ही आत्मा का अनुभव यह जगत् भासित होता है। हे राम ! सृष्टि के आदि में परम सुषुप्तिसत्ता थी। उसमें संवेदन फुरने से जगत् प्रकट हुआ। यह वही संवेदनरूप जगत् है और जिस आत्मसत्ता में प्रकट हुआ है वही रूप है, भिन्न कुछ नहीं। जैसे हाथ, पाँव, नख, केशादिक सब अङ्ग शरीररूप हैं, वैसे ही यह स्थावरजङ्गम सृष्टि परमात्मा के अङ्ग हस्त पदादिक हैं। रोम सृष्टि और नख केशादिक स्थावर सृष्टि सब आत्म-रूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं बनी। जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभवरूप और सङ्कल्पपुर की रची सृष्टि सङ्कल्परूप होती है, वैसे ही यह सृष्टि अनुभवरूप है, और किसी कारण से नहीं उपजी-इससे ब्रह्मारूप ही है। ब्रह्म के सूक्ष्म अणु में सृष्टि उपजी है, सो उसका क्या रूप है ? ब्रह्म ही सृष्टि है और सृष्टि ही ब्रह्म है-ब्रह्म और जगत् में भेद कुछ नहीं। परन्तु अज्ञाननिद्रा से भिन्न-भिन्न भासित होता है।