योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1665, कुल 1734 में से
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राम ने पूछा, हे भगवन् ! निद्रा का कितना प्रमाण है और कितने काल तक वह रहती है ? सूक्ष्म अणु में सृष्टि कैसी उपजी है और कैसे स्थित है ? अणु में उसकी क्यों संज्ञा है और अनन्त क्योंकर है ? देवत असुरादिकरूप जिसे प्राप्त हुआ है वह चित्त क्या है ? वशिष्ठजी बोले हे राम ! अज्ञान-निद्रा अपने काल में तो अनादि है और नहीं जानी जाती कि कब हुई है और अन्त भी नहीं जाना जाता कि कब तक रहेगी। अज्ञानकाल में तो इसका आदि-अन्त प्रमाण कुछ नहीं भासित होता, पर बोध में इसका अत्यन्ताभाव दीखता है। चित्तसत्ता की जो अनन्तता पूछी सो वह तो अद्वैत चिन्मात्र आत्मसमुद्र है। उसमें सूक्ष्मभाव 'अहं-मस्मि' की जो संवित् फुरती है, उसका नाम चित्त है। उस चित्त ही में आगे चलकर जगत् होता है। शुद्ध चिन्मात्र में संवेदन चित्त फुरता है। उसमें यह जगत् है। वही चित्सत्ता देवता, असुर और जङ्गमरूप होकर भासित होती है। वही नाग, पिशाच, कीटादिक स्थावर-जंगमरूप दिखता है। वास्तव में चैतन्यसत्ता ही है, उससे भिन्न कुछ नहीं। सब चिदाकाश-रूप है, फुरने से नाना प्रकार का दिखता है।
हे राम ! परम शुद्ध चितअणु में मिलकर चित्त अनेक ब्रह्माण्ड धारण करता है और उस सूक्ष्म अणु में अनन्त ब्रह्माण्ड फुरते हैं, परन्तु वे उससे भिन्न नहीं हैं। जैसे एक पुरुष शयन करता है तो उसको स्वप्न में अनेक जीव दीखते हैं और उन जीवों में अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि फुरती है। तब अनेक सृष्टियाँ हो जाती हैं, वैसे ही सूक्ष्म चितअणु में अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं, परन्तु आत्मसत्ता से कुछ भिन्न नहीं बना। जैसे सूर्य की किरणों में अनन्त सूक्ष्म त्रसरेणु होते हैं, वैसे ही परमात्मसूर्य के चितअणु सूक्ष्म हैं। इस त्रसरेणु से भी सूक्ष्म चितअणु में जीवों को अपनी-अपनी अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं। हे राम ! जब तक चित्त फुरता रहता है, तबतक सृष्टियों का अन्त नहीं आता। असद्रूप जगत् भ्रम आगे देखे हैं और असत्य ही आगे देखेंगे। जब चित्त फुरने से रहित होता है, तब जगत् की कल्पना मिट जाती है। जैसे स्वप्न में सृष्टि दिखती है और बड़े व्यवहार होते हैं, पर जब प्राणी जाग उठता है, तब स्वप्न की सृष्टि व्यवहार की कल्पना