योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1666, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६३
मिट जाती है और अपना अद्वैत आप ही भासित होता है, वैसे ही चित्त के ठहरने से सब भ्रम मिट जाता है। हे राम! सूक्ष्म चित्अणु की भी संज्ञा तब हुई है, जब इसको चित्त का सम्बन्ध हुआ है। जब चित् को अपने स्वभाव में स्थित करोगे, तब द्वैतकल्पना और सूक्ष्म स्थूलभाव मिट जावेंगे। इसकी सूक्ष्म संज्ञा अव्यक्त भाव से है, जो इन्द्रियों का विषय नहीं। इसमें अणुता है। यह जीव सूक्ष्म अणु में भी व्यापा हुआ है, इससे सूक्ष्म अणु कहाता है। और अनन्तता इस कारण है कि सबको धारण कर रहा है।
हे राम! यह जगत् अभावमात्र है। जैसे मरुस्थल में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जब यह जगत् ही नहीं है, तो इसका कारण किसे कहिये ? आदि-सृष्टि बिना कारण के उपजी है और फिर उसमें कारण-कार्य भासित होने लगे हैं, सो आभास की दृढ़ता से ऐसा हुआ है। जैसे बिना कारण के स्वप्न में आदि-सृष्टि बीज, वृक्ष, कुम्हार, मिट्टी और घट इकट्ठे प्रकट हो आते हैं। जब उस स्वप्न की दृढ़ता हो जाती है, तब कारण और कार्य भासित होते हैं, परन्तु जो सोया पड़ा है, उसको दृढ़ रूप से भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञानी को जगत् का कार्य-कारण दृढ़ भासित होता है और ज्ञानवान् को सब अपना रूप ही दिखता है। जैसे स्वप्न से जागने पर स्वप्न की सृष्टि अपना रूप ही दिखती है कि मैं ही था और कुछ न था, वैसे ही ज्ञानवान् को सब जगत् आकाशरूप दिखता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, पर्वत, वृक्ष, नदी आदि सब स्थावर-जङ्गम जगत् आकाशरूप है और संवेदन के फुरने से देख पड़ता है, वास्तव में भिन्न कुछ नहीं है। हे राम! यह जगत् चित्त में स्थित है। जैसे किसी पुरुष ने खम्भे में पुतलियों की कल्पना की तो उन पुतलियों के दो रूप होते हैं, एक शिल्पी के चित्त में फुरती हैं सो आकाशरूप हैं और एक खम्भे में कल्पित हैं, वे स्तम्भरूप हैं, पर शिल्पी के चित्त में नृत्य करती हैं। हे राम! और तो कुछ नहीं बना, सब स्तम्भरूप है और शिल्पी के चित्त में कल्पनामात्र है। वैसे ही चित्तरूपी शिल्पी