योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1667, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८६४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
की जगतरूपी पुतलियाँ कल्पनामात्र हैं। पर आत्मरूपी खम्भा ज्यों का त्यों है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसे पट के ऊपर मूर्ति लिखी हो तो उस मूर्ति का रूप पट ही है—पट से भिन्न कुछ नहीं—वह पट ही मूर्तिरूप दिखता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मा ही जगतरूप होकर भासित होता है। आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं—जैसे ब्रह्म आकाशरूप है वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है। जगत् आधार है और उसमें ब्रह्म बसनेवाला है। वैसे ही ब्रह्म आधार है और उसमें जगत् बसनेवाला है।
हे राम! जगत् में जितने विद्या और अविद्यारूप समूह हैं, वे सब संकल्प से रचित हैं और वास्तव में सब आत्मरूप हैं। समता, सत्ता और निर्विकारता आदि और इनसे विपरीत अविद्यारूप सब एक ही रूप हैं। सब एक ही में स्फुरते हैं और एक ही रूप हैं। जैसे अनुभवरूप स्वप्न-जगत् अनुभव में स्थित होता है सो सब आत्मरूप होता है, वैसे ही यह सब जगत् ब्रह्मरूप है—ब्रह्म से भिन्न न कुछ वर की कल्पना है और न शाप की कल्पना है। ब्रह्मसत्ता निर्विकार अपने आपमें स्थित है। उसमें न कारण है, न कार्य। जैसे तालाब, नदी और मेघ जल ही होते हैं, वैसे ही सब ब्रह्मरूप है। राम ने पूछा, हे भगवन्! वर और शाप के कर्त्ता तो परिच्छिन्न हैं और कारण बिना तो कार्य नहीं बनता। तब तुम कैसे कहते हो कि कारण-कार्य कोई नहीं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध आत्मसत्ता चिदाकाश का किञ्चन जगत् होता है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता में जगत् प्रकट होते हैं। और जैसे तरङ्ग जल रूप होते हैं, वैसे ही जगत् आत्मरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसे आदि में परमात्मा से सृष्टि का स्फुरण हुआ है, वैसे ही स्थित है अन्यथा नहीं होता। सब जगत् संकल्प है। अनेक प्रकार की वासना संवेदन में स्फुरती है, पर जिनको स्वरूप का विस्मरण हुआ है, उनको यह जगत् सत्यरूप दिखता है। जो उनको विचार उत्पन्न हो तो वही काम है, जिस काल में विचार उत्पन्न होता है और उसी काल में अज्ञाननिद्रा का अभाव होता है। हे राम! जब विचार अभ्यास करके