योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1668, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ८६५
मन तद्रूप होता है, तब यथाभूत दर्शन होता है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपना ही रूप भासित होता है, क्योंकि वह अपने आपमें स्थित है । सबके अधिष्ठान आत्मसत्ता में अहंप्रतीति होती है, इस कारण अपने आपमें सृष्टि भासित होती है । जैसे स्पन्दन फुरते हैं, वैसे ही उनकी सिद्धि होती है । पहले निरावरण-दृष्टि होती है, निरावरण-दृष्टि से सब संकल्प सिद्ध होते हैं, क्योंकि यह सब जगत् आत्मा में संकल्प का रचा हुआ है और उसमें इसको अहंप्रत्यय हुआ है । हे राम ! जो यह संकल्प उठता है कि यह कार्य ऐसे हो तो वह वैसे ही होता है ।
हे राम ! शुद्ध संवेदन में जैसा संकल्प होता है, वही होकर भासित होता है । यह जगत् संकल्परूप ही है, संकल्प से भिन्न नहीं । इसलिए वर और शाप का और कोई कारण नहीं; वर और शाप भी संकल्परूप हैं । उस संकल्प से जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे किसी समवायकारण से तो नहीं उत्पन्न हुए, संकल्प ही से हुए हैं, इससे सब अकारण हैं । ब्रह्मरूपी समुद्र में तरङ्ग उठते हैं तो कारण और कार्य मैं तुमसे क्या कहूँ ? सब जगत् ब्रह्मरूप है । द्वैत और एक की कल्पना कुछ नहीं । हे राम ! मुझको सदा ब्रह्मसत्ता ही दिखती है, कार्य कारण कोई नहीं दिखता । जैसे स्वप्न में किसी के घर पुत्र हुआ और वह बड़े उत्साह को प्राप्त हुआ, पर जब जाग्रत् का संस्कार चित्त में आया, तब उसका पिता ही उपजा नहीं, तो पुत्र कैसे कहिये ? तब तो सब अपने आपही हो जाता है, न कोई कारण दिखता है और न कार्य दिखता है । जो स्वप्न में सोया है, उसको जैसे दिखता है, वैसे ही यह भी है । जैसे वर और शाप का आसरा संकल्प है और संकल्प ही वर और शाप होकर भासित होता है और अकारण ही होता है । जिसको शुद्ध संवेदन से एकता हुई है, वह निवरण है और उसमें जैसे फुरने का आभास फुरता है, वैसा ही सिद्ध होता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! एक ऐसे हैं, जिनको आवरण है और उनका संकल्प जैसा फुरता है-वर दें अथवा शाप दें-वैसा ही हो जाता है । स्वरूप का साक्षात्कार उनको नहीं हुआ, पर शुभ कर्म उनमें प्रत्यक्ष मिलते हैं । तो शुभ कर्म ही वर और