योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1669, कुल 1734 में से
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शाप के कारण हुए, तुम कैसे कहते हो कि निरावरण पुरुष का संकल्प सिद्ध होता है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र सत्ता ही चित् धातु कहाती है । उस चित्धातु में जो आभास फुरता है, वही संवेदन कहलाता है । वह संवेदन जब फुरता है, तब जीव जानता है कि 'मैं ब्रह्मा हूँ'। तो संवेदन ने ही अपने को जगत् का पितामह जाना और उसी ने आगे मनोराज्य की कल्पना की । तब पञ्चभूतों का ज्ञान हुआ कि शून्यरूप आकाश है, स्पन्दनरूप वायु है, उष्णरूप अग्नि है, द्रवतारूप जल है और कठोररूप पृथ्वी है । फिर उसी से देश और काल की कल्पना हुई । स्थावर-जङ्गम पदार्थ की कल्पना से वेद शास्त्र, धर्म, अधर्म का स्फुरण हुआ, जिससे यह निश्चय हुआ कि यह तपस्वी है और इसने तप किया है, इसके कहने से वर हो । पर स्वरूप के साक्षात्कार से रहित होने पर भी उसका कहा होना उसके तप का फल है । आदि में संकल्प ऐसे हुआ है तो वर और शाप का कर्त्ता तपस्वी नहीं, उसका अधिष्ठान वही संवेदन है, जिससे आदि संकल्प उपजा है । हे राम ! वर और शाप संकल्परूप हैं, संकल्प संवेदन से फुरा है और संवेदन आत्मा का आभास है, तो मैं कारण और कार्य क्या कहूँ ? और जगत् क्या कहूँ ? आत्मा का आभास संवेदन ब्रह्मा है, जिसने आगे संकल्पपुर की सृष्टि रची है । हम तुम आदि सब उसके संकल्प में हैं । वह ब्रह्मा निराकार, निराधार और निरालम्ब स्थित है । किमी आकार को नहीं प्राप्त हुआ, इससे उसका विश्व भी वही रूप जानो ।
हे राम ! जैसे उसका स्पन्दन हुआ है, वैसे ही वह स्थित है; अन्यथा नहीं होता । जो वही विपर्यय करे तो हो अन्यथा नहीं हो सकता । अग्नि में उष्णता, वायु में स्पन्दन इत्यादि जो गुणधर्म हैं, वे अपने-अपने स्वभाव में स्थित हैं और मुझको सब ब्रह्मरूप हैं । जैसे शरीर में हाड़-मांस से भिन्न कुछ नहीं होता, वैसे ही मुझको ब्रह्म से भिन्न नहीं भासित होता । जैसे घट में मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं होता और काष्ठ की पुतली की काष्ठ से भिन्न चेष्टा नहीं होती, वैसे ही जगत्