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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1670, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1670

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">८६७</span>

ब्रह्म से भिन्न नहीं होता । हे राम ! यह सब जगत् जो तुमको भासता है, ब्रह्म ही है । ब्रह्म ही फुरने से नाना प्रकार जगत् के रूप में भासित होता है । जैसे समुद्र अपनी द्रवता से तरङ्ग, बुलबुले, फेन आदि होकर भासित होता है, वैसे ही ब्रह्मसंवेदन से जगतरूप होकर दिखता है, पर ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है । जैसे पर्वत में जल गिरता है, सो कण होकर दिखता है, और जब गिरकर ठहर जाता है, तब समुद्ररूप होता है, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं होता, तैसे ही जब चित्त फुरता है, तब नाना प्रकार का जगत् भासित होता है और जब ठहर जाता है, तब सब जगत् एक अद्वैतरूप दिखता है, पर ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं होता । ब्रह्म ही स्थावर जंगमरूप दिखता है । जहाँ पुर्यष्टका का सम्बन्ध नहीं दिखता, वह अजंगम या स्थावर कहाता है, और जहाँ पुर्यष्टका का सम्बन्ध होता है, वह जंगमरूप दिखता है, परन्तु आत्मा में दोनों तुल्य हैं । जैसे एक ही हाथ की अँगुली है, जिसको उष्णता अथवा शीतलता का संयोग होता है, वह फुरने लगती है और जिसको शीत-उष्ण का संयोग नहीं होता वह नहीं फुरती, वैसे ही जिस आकार को पुर्यष्टका का संयोग है, वह फुरता है और चेतनता दिखती है, और जिसको पुर्यष्टका का संयोग नहीं होता, उसमें जड़ता भासित होती है । जड़ भी दो प्रकार के हैं—एक को पुर्यष्टका का संयोग है और जड़ है, और दूसरे को पुर्यष्टका का संयोग नहीं है और जड़ है ।

वृक्ष और पर्वतों को पुर्यष्टका का संयोग है, परन्तु घनसुषुप्ति जड़ता में स्थित हैं, इस कारण जड़ भासित होते हैं और मृत्तिका पुर्यष्टका से रहित है, इस कारण जड़ है, परन्तु वास्तव में स्थावर, जंगम; इष्ट, अनिष्ट; वर, शाप; देश, काल, पदार्थ; सभी ब्रह्मरूप हैं, और ब्रह्मसत्ता ही ऐसे स्थित हुई है, जैसे अपने अनुभव में संकल्पनगर नाना प्रकार का दिखता है, परन्तु संकल्परूप है—संकल्प से भिन्न कुछ नहीं । जैसे मृत्तिका की सेना अनेक प्रकार की होती है, परन्तु मृत्तिकारूप है—मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही सब अर्थ धारण करनेवाली चैतन्य-धातु नाना प्रकार के आकार को प्राप्त होती है, परन्तु चेतनता से भिन्न