योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1671, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें=६६= ❇ योगवाशिष्ठ ❇
कुछ नहीं होती। हे राम! धातु उसको कहते हैं, जो अर्थ को धारण करे। जितने पदार्थ तुमको दिखते हैं, वे सब अर्थरूप हैं और वस्तुरूप जो धातु है, वह आत्मसत्ता है। उसने दो अर्थ धारण किये हैं-एक स्वप्न-अर्थ और दूसरा बोध-अर्थ-स्वप्न-अर्थ में तो नानात्व भासित होता है और बोध-अर्थ में एक अद्वैत सत्ता भासित होती है। जैसे एक ही धातु मिलने और बिछुड़ने से दो अर्थ रखती है, जो वे परस्पर प्रतियोगी शब्द हैं, परन्तु एक ही ने धारण किये हैं, वैसे ही स्वप्न और बोध-अर्थ, इन दोनों को आत्मसत्ता ने धारण किया है। जैसे तरंग और बुलबुले जल-रूप हैं, वैसे ही जगत् ब्रह्मरूप है। जो ज्ञानवान् हैं, उनको सब ब्रह्मरूप दिखता है और अज्ञानी को नानात्व भासित होता है। इससे तुम स्वभाव में निश्चय रखकर देखो, सब ब्रह्मरूप है-भिन्न कुछ नहीं।
इति श्रीयो० ब्रह्मप्रतिपादनंनाम द्विशताधिकैकोनसप्ततितमसर्गः ॥२६९॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो सब ब्रह्म ही है तो नीति क्या है और नाना प्रकार के पदार्थ क्यों भासित होते हैं? तुम कहते हो कि जगत् संकल्प में रचित है तो हे भगवन्! ये जो असंकरूप पदार्थ हैं, उनकी संज्ञा की नहीं जाती, तब इन पदार्थों में से एक-एक का स्वभाव अचलरूप होकर कैसे स्थित है? सब देवताओं में सूर्य का प्रकाश क्यों अधिक है और एक ही सूर्य में दिन और रात्रि छोटे बड़े क्यों होते हैं, यह विचित्रता क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध चिन्मात्रसत्ता में अकस्मात् जो आभास फुरा है, उस आभास का नाम नीति है। यह सृष्टि भी आभासमात्र है, किसी कारण से नहीं उपजी जिसके आश्रय से आभास फुरता है, वही वस्तु अधिष्ठान होती है। इससे सब जगत् ब्रह्मरूप है और चिन्मात्रसत्ता अपने आप में स्थित है। वह न उदय होती है और न अस्त होती है। वह परिणाम से रहित सदा अद्वैतरूप स्थित है, उसमें न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। तीनों अवस्था आभासमात्र हैं। पर चैतन्यसत्ता में इनसे द्वैत नहीं बना। ये तीनों इसी का स्वभाव और प्रकाशरूप हैं-इससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे आकाश और शून्यता, वायु और निस्पन्द, अग्नि और उष्णता और