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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1672, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1672

❉ निर्वाण प्रकरण ❉ <span style="float:right;">८६६</span>

कपूर और सुगन्ध में भेद नहीं है, वैसे ही जाग्रत् आदि जगत् और ब्रह्म में भेद नहीं है । हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र में जो चित्तभाव हुआ है, उसमें चैतन्य आभास फुरा है, और उसमें जैसा संकल्प फुरा है, वैसे ही स्थित हुआ है कि यह इस प्रकार हो और इतने काल रहे । उसी संकल्प निश्चय का नाम नीति है ।

जैसे आदि संकल्प दृढ़ हुआ है, वैसे ही अबतक पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश अपने-अपने भाव में स्थित हैं और अपने स्वभाव को नहीं त्यागते । जबतक उनकी नीति है, तब तक वे वैसे ही जगत् सत्ता में स्थित हैं । हे राम ! इसका नाम नीति है । जैसे आदि-संकल्प रक्खा है, वैसे ही स्थित है । वह वास्तव में आभासरूप है । अकस्मात् यह आभास फुरा है, सो किसी सूक्ष्म अणु में प्रकट हुआ है । जैसे समुद्र के किसी स्थान में तरङ्ग, बुलबुले आदि उठते हैं, सम्पूर्ण समुद्र में नहीं उठते, वैसे ही जहाँ संवेदन रूप जैसा स्फुरण होता है, वैसे ही स्थित होता है । यही नीति है । जैसे तरङ्ग और बुलबुले समुद्र से भिन्न नहीं है । वैसे ही नीति आत्मा से भिन्न नहीं है । जैसे द्रवता से समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा में संवेदन से नीति और जगत् जो फुरते हैं, वे वही रूप हैं—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे किसी ने कहा कि चन्द्रमा का प्रकाश है तो चन्द्रमा और प्रकाश में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है । यह विश्व आत्मा का स्वभाव है । जैसे एक ही काल की, दिन, पक्ष, वार, मास, वर्ष, युग, कल्प इत्यादि बहुत संज्ञाएँ हैं, परन्तु काल एक ही है, वैसे ही जगत् के भिन्न-भिन्न नाम हैं, सो सब ब्रह्म ही हैं । हे राम ! जब संवेदन चित्तरूप होता है, तब प्रथम शब्द तन्मात्रा जगती है और उससे आकाश उपजता है, जिसका स्वभाव शून्यता है । फिर जब उसने स्पर्शतन्मात्रा को चेता, तब उससे इसमें वायु उपजा । वायु का स्पन्दन स्वभाव है । फिर रूप-तन्मात्रा को चेता, तब उनसे अग्नि प्रकट हुई, जिसका स्वभाव उष्ण है । फिर रसतन्मात्रा को चेता, तब उससे जल प्रकट हुआ, जिसका स्वभाव द्रव है । फिर गन्ध-तन्मात्रा को चेता, तब उससे पृथ्वी प्रकट हुई, जिसका स्वभाव