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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1673, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1673

८७० ✹ योगवाशिष्ठ ✹

स्थिर है। इस प्रकार पञ्चभूत उपजे। हे राम ! आदि में जो शब्द-तन्मात्रा उपजी है, वह जितने शब्दसमूह हैं, उनका बीज है। सब उसी से उत्पन्न हुए हैं, पदार्थ, वाक्य, वेद, शास्त्र, पुराण सब उसी से उपजे हैं। इसी प्रकार पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश का जो कार्य है, वही उन सबका बीज-तन्मात्रा है। उस तन्मात्रा का बीज वह संवित्सत्ता है।

हे राम ! अब इन तत्त्वों की खानि सुनो। पृथ्वी अणु भी होती है और एकदला भी होती है। पृथ्वी तो एक है और अणु भी वही है। वैसे ही सब तत्त्वों को समझ देखना। पृथ्वी की खानि भू-पीठ है, जो सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करती है। जल की खानि समुद्र है, जो सब पदार्थों में रसरूप होकर स्थित है। अग्नि का तेज जो प्रकाश है, उसकी समष्टि सूर्य है। सब स्पन्दनों की समष्टि पवन है और सम्पूर्ण शून्य पदार्थों की खानि आकाश है। इस प्रकार ये पाँचों तत्त्व संकल्प से उपजे हैं। जैसे बीज से अंकुर उपजता है, वैसे ही ये तत्त्व संकल्प से उपजे हैं। संकल्प संवेदन से उपजा है और संवेदन आत्मा का आभास है। वह अद्वैत, अच्युत, निर्विकल्प और सर्वदा अपने आपमें स्थित है। उसी के आश्रय से संवेदन आभास उपजा है। फिर संवेदन से संकल्प उपजा है और संकल्प से जगत् बन गया है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं और लीन होते हैं, वैसे ही संकल्प से जगत् उपजा है और फिर संकल्प ही में लीन होता है। जैसे तरंग जलरूप है, वैसे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश सब चैतन्यरूप हैं। सब पदार्थ जो देखे सुने जाते हैं और नहीं देखे सुने जाते, वे सब चैतन्यरूप हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। वही आत्मा इस प्रकार होता है। स्वप्न में अपना अनुभव ही पदार्थ होकर दिखता है, परन्तु कुछ बना नहीं। नाना प्रकार का दिखता है, तो भी नाना नहीं है, वैसे ही जगत् नाना प्रकार का दिखता है, तो भी कुछ बना नहीं।

जैसे एक निद्रा के दो रूप हैं-एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति-जब फुरना होता है तब स्वप्न की सृष्टि दिखती है और जब फुरना निवृत्त हो जाता है, तब सुषुप्ति होती है, और जैसे वायु के दो रूप हैं; जब स्पन्दन