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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1674, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1674

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८७१

होता है, तब भासित होती है और जब निस्पन्द होती है तब नहीं भासित होती वैसे ही जब संवेदन फुरता है, तब जगत् दिखता है और जब नहीं फुरता, तब जगत् भी नहीं दिखता—इसी का नाम महाप्रलय है-पर दोनों आत्मा के आभास हैं। हे राम! संकल्परूप ब्रह्मा ने आत्मा में आकाश, पृथ्वी, नक्षत्र, चक्र इत्यादि क्रम से रचे हैं। जैसे बालक अपने में संकल्प रचे, वैसे ही ब्रह्मा ने रचा है। उसने एक भूगोल रचा है, जिस पर नक्षत्रचक्र रचा है और उस चक्र के दो भाग किये हैं, जो अन्योन्य सम्मुख स्थित हैं। जब सूर्य उसके सम्मुख होता है, तब दिन और रात्रि का प्रणाम साठ घड़ी होता है। जब सूर्य उस नक्षत्रचक्र के ऊपर की ओर उदय होता है, तब दिन बड़े होते हैं और जब नीचे की ओर उदय होता है, तब दिन छोटे हो जाते हैं। निदान ज्यों-ज्यों सूर्य क्रमशः ऊपर से नीचे की ओर उदय होता है, त्यों-त्यों दिन छोटे होते जाते हैं और रात्रि बढ़ती जाती है। और जब छः मास के उपरान्त पौष त्रयोदशी से सूर्य क्रमशः ऊपर को उदय होता है, तब दिन बढ़ता जाता है। आषाढ़ की द्वादशी से लेकर पौष की त्रयोदशी तक रात्रि बढ़ती है और दिन घटता है, और फिर रात्रि घटती जाती है और दिन बढ़ता जाता है। जब सूर्य उस चक्र के मध्य में उदय होता है, तब दिन और रात्रि समान हो जाते हैं। परन्तु संवेदनरूप ब्रह्मा का सब संकल्प विलास है। जैसे शिल्पी शिला में पुतलियों की कल्पना करता और चेष्टा करता है, पर बना कुछ नहीं, शिला ही अपने घनस्वभाव में स्थित होती है, वैसे ही चित्तरूपी शिल्पी आत्मारूपी शिला में जगतरूपी पुतलियों की कल्पना करता है, परन्तु बना कुछ नहीं। ब्रह्मसत्ता ही सदा अपने आपमें स्थित है।

संवेदन फुरने से जब उसे रूप देखने की इच्छा होती है, तब चक्षुइन्द्रिय बन जाती है, जो रूप को ग्रहण करती है। जब स्पर्श की इच्छा होती है, तब त्वचा इन्द्रिय बन जाती है, जो स्पर्श को ग्रहण करती है। जब गन्ध की इच्छा होती है, तब घ्राण इन्द्रिय बनकर गन्ध ग्रहण करती है। जब शब्द सुनने की इच्छा होती है, तब श्रवण इन्द्रिय बन जाती