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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1675, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1675

८७२ ✹ योगवाशिष्ठ ✹

है, जो शब्द आदि विषयों को ग्रहण करती है। जब रस की इच्छा होती है, तब रसना इन्द्रिय प्रकट होकर स्वाद ग्रहण करती है। जब वही संवेदन चेतता है तब अपने साथ वायु को देखता है और उस वायु में प्राण फुरते देखता है। हे राम! देखना, सुनना, रस लेना, स्पर्श करना, बोलना और गन्ध लेना आदि जहाँ जहाँ इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करती गईं, वह देश है। इन्द्रियाँ जिस विषय को ग्रहण करने लगती हैं, वे पदार्थ हैं और जिस समय ग्रहण करने लगती हैं वह काल है। इस प्रकार देश, काल और पदार्थ हुए हैं। फिर क्रम से शुभ अशुभ कर्म भासित होने लगे। हे राम! इस प्रकार संवेदन ने फुरकर जगत् को रचा है और वह शरीर को रचकर इष्ट-अनिष्ट को ग्रहण करता है। जो तुम कहो कि इन्द्रियाँ तो भिन्न-भिन्न हैं और अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं, फिर सब इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट इस जीव को कैसे होते हैं, तो इसका उत्तर दृष्टान्त द्वारा सुनो।

हे राम! जैसे तुम एक हो और माला के दाने बहुत हैं, पर सबका आश्रय सूत्र है, वैसे ही अहंकाररूपी सूत्र में सब इन्द्रियरूपी दाने हैं। इस कारण अहंकाररूप जीव इन्द्रियों के सुख में सुखी और दुःख से दुःखी होता है। इन्द्रियाँ आप ही से कार्य करने को समर्थ नहीं होतीं अहंकार (जीव) की सत्ता से चेष्टा करती हैं। जैसे शङ्ख में आपसे बजने का सामर्थ्य नहीं, पर जब पुरुष बजाता है तो शब्द करता है वैसे ही इन्द्रियों की चेष्टा अहंकार और जीव से होती है। हे राम! वास्तव में न कोई इन्द्रियाँ हैं, न इनके विषय हैं और न मन का फुरना है, सब आभासमात्र है। जब संवेदन फुरता है, तब इतनी संज्ञा धारण करता है और जब संवेदन निर्वाण होता है तब सब कल्पना मिट जाती हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवसंज्ञावर्णनं नाम द्विशताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ २७० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह सम्पूर्ण कल्पना का क्रम मैंने तुमसे कहा है। जितना कुछ जगत् देखते हो, सो संवेदनरूप है। शुद्ध चिन्मात्र सत्ता के आदि आभास और चेतनता के लक्षण चित्त अहं 'अस्मि'