योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1676, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८७३
का नाम संवेदन है। उसके इतने पर्याय हुए हैं—कोई उसे ब्रह्मा कहते हैं, कोई विष्णु कहते हैं, कोई प्रजापति कहते हैं और कोई शिव आदि नाम लेते हैं। उस संवेदन ने आगे संकल्प से विश्व रचा, जो अकारण है, किसी कारण से नहीं बना। काकतालीयन्याय से अकस्मात् आभास उपजा है और साकार दिखता है, परन्तु अन्तवाहक है। व्यवहार सहित दिखता है, परन्तु अव्यवहार है। हे राम! अन्तवाहकरूप संवेदन ने आगे जो विश्व रचा है, वह भी अन्तवाहकरूप है, परन्तु अज्ञानी को संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिकरूप दिखता है। जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर संकल्प से भिन्न नहीं और संकल्प की दृढ़ता से ही आकाररूप पहाड़, नदियाँ, घट, पट आदि पदार्थ प्रत्यक्ष दिखते हैं, परन्तु बने तो कुछ नहीं, शून्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् शून्यरूप निराकार है। हे राम! आदि अन्तवाहकरूप संवेदन ही बहिर्मुख फुरने से देश, काल, पदार्थ-रूप होकर स्थित हुआ है। जब बहिर्मुख फुरना मिट जाता है, तब जगत् आभास भी मिट जाता है। जैसे स्वप्न का आभास जगत् तबतक दिखता है, जबतक प्राणी निद्रा में सोया होता है, पर जब जागता है तब स्वप्न का जगत् मिट जाता है और एक अद्वैतरूप अपना आप ही भासित होता है, वैसे ही यह जगत् अज्ञान के निवृत्त होने पर लीन हो जाता है। सब जगत् निराकार है, पर संकल्प की दृढ़ता से आकार दिखते हैं।
हे राम! वेदन में जो संकल्प फुरता है, वही अन्तःकरण चतुष्टय होकर भासित होता है। पदार्थों के चिंतन से इसका नाम चित्त है, संकल्प-विकल्प के संस्मरण से इसका नाम मन है, ज्यों का त्यों निश्चय करने से इसका नाम बुद्धि है और वासना के समूह मिलने से इसे पुर्यष्टका कहते हैं। पर सब संकल्पमात्र हैं और उनसे उपजा जगत् भी संकल्परूप है। जैसे इन्द्रजाल की बाजी और स्वप्न का नगर संकल्प की दृढ़ता से पिण्डाकार भासित होते हैं, परन्तु सब आकाशरूप शून्य हैं, वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है—आत्मा से कुछ भिन्न नहीं है। जो तुम कहो कि दिखता क्यों है? तो जिसमें दिखता है, उसे वही रूप जानो।