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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1677, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1677

=84 🌸 योगवाशिष्ठ 🌸

देश, काल, नदी, पहाड़, पृथ्‍वी, देवता, मनुष्य, दैत्य, ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त जो स्थावर-जङ्गमरूप जगत् दिखता है सो सब ब्रह्मरूप है । वेद, शास्त्र, जगत्, कर्म, स्वर्ग, तीर्थ इत्यादि जो पदार्थ हैं, वे भी सब ब्रह्मरूप हैं । वहां निराकार अद्वैत ब्रह्मसत्ता संवेदन में जगतरूप भासित होती है । जैसे स्वप्न में अपना ही अनुभव सृष्टिरूप भासित होता है, वैसे ही अपना ही अनुभव यह जगत् होकर भासित होता है । जैसे समुद्र द्रवता से तरंग होकर भासित होता है, पर जल ही जल है, वैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में संवेदन से जो जगत् आभास फुरता है, वह ब्रह्म ही ब्रह्म है, भिन्न कुछ नहीं । हे राम ! जो कुछ तुमको दिखता है, सो सब अपने आपमें स्थित अच्युत और अनन्तरूप है ।

इति नि० सर्वब्रह्मरूपप्रतिपादनंनामद्विशताधिकैकसप्ततिमसर्गः॥२७१॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब द्रष्टा दृश्यरूप को चेतता है, तब विश्व होता है । वह विश्व अन्तवाहक रूप है । निराकार संकल्प को अन्तवाहक कहते हैं । जब दृश्य में अहंभाव से चेतनता रहती है, तब अन्तवाहक से आधिभौतिक शरीर हो जाता है । आदि में जो ब्रह्मा नाम का संवेदन फुरा है, वह अन्तवाहक शरीर हुआ है । जब उसने बारम्बार अपने शरीर को देखा, तब वह भी आधिभौतिक चतुर्मुख हो गया । उसने ओंकार का उच्चारण करके वेद और वेद के क्रम को रचा । और संकल्प से विश्व को रचा । जैसे कोई बालक मन में बगीचा रचे और उसमें नाना प्रकार के वृक्ष, फल, फूल, घास और पत्ते रचे, वैसे ही ब्रह्मा ने जगत् को रचा और अन्तवाहक जीव उपजे । जब जीवों को शरीर में दृढ़ अभ्यास हुआ तब वे अन्तवाहक से आधिभौतिक हो गये । राम ने पूछा, हे भगवन् ! ब्रह्मसत्ता तो निराकार था, उसका शरीर का संयोग कैसे हुआ ? उसमें आधिभौतिकता कैसे हो गई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! न कोई शरीर है और न किसी को शरीर का संयोग हुआ है । केवल अद्वैत आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । उसमें जो चैतन्य संवेदन उपजा है, वही संवेदन दृश्य को चेतता रहता है । वही जगतरूप होकर स्थित हुआ है ।