योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1678, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८७५
जब संकल्प की दृढ़ता हुई, तब उसे अपने साथ शरीर और आकार दिखने लगे। परन्तु सब आकाश ही है—कुछ बने नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि को उपजी कहिये तो उपजी नहीं, और उसका कारण भी कोई नहीं, केवल आकाशरूप है, और कोई पदार्थ उपजा नहीं, परन्तु स्वरूप के विस्मरण से आकार भासित होते हैं, वैसे ही यह शरीर और जगत् जो दिखता है, वह केवल आभासमात्र है और असंभावना की दृढ़ता से प्रत्यक्ष भासित होता है। जब स्वरूप का विचार करके देखोगे तब शान्त हो जाओगे। हे राम! अविद्या भी कुछ वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न के पदार्थ अविद्यमान होते हैं और विद्यमान दिखते हैं पर जागने पर विद्यमान हो जाते हैं, वैसे ही यह जगत् अविचारसिद्ध है, विचार से शान्त हो जाता है। जब विचार करके देखोगे तब सब आत्मा ही भासित होगा। हे राम! आत्मसत्ता अव्यभिचारी है, अर्थात सत्तामात्र है, उसका अभाव कभी नहीं होता। वह अच्युत है अर्थात् सदा ज्यों की त्यों है। अपने भाव को कभी नहीं त्यागती। इसलिए जो उससे भिन्न दिखे, उसे भ्रममात्र जानो। हे राम! विचार करके जब दृश्यभ्रम शान्त होना है, तब मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मसत्ता ज्ञानरूप, निराकार और सदा अपने आपमें स्थित है। जब सम्यक् ज्ञान का बोध होता है, तब जगत् का भ्रम नष्ट हो जाता है। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर! सम्यक् ज्ञान और बोध किसको कहते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अनुभव ही बोध कहाता है, और उसका ज्यों-का-त्यों जानना सम्यक् ज्ञान है। राम ने पूछा, हे भगवन्! केवल बोध और केवल ज्ञान किसको कहते हैं।
वशिष्ठजी बोले, हे राघव! दृश्य से रहित चिन्मात्र को तुम केवल बोध जानो-उसमें वाणी की गति नहीं है। इसी प्रकार अचेत चिन्मात्र सत्ता को ज्यों का त्यों जानना ही केवल ज्ञान है। राम ने पूछा, हे भगवन्! केवल बोध अचेत चिन्मात्र है तो उसमें जगद्भ्रम क्यों भासित होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! चिन्मात्र जो द्रष्टारूप है, उसमें जब संवेदन चेतना फुरती है, तब वही चेतना चैत्यरूप दृश्य हो भासित होती है। जैसे स्पन्दन से रहित वायु अलक्ष्यरूप होती है और