योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६३
मिट जाती है और अपना अद्वैत आप ही भासित होता है, वैसे ही चित्त के ठहरने से सब भ्रम मिट जाता है। हे राम! सूक्ष्म चित्अणु की भी संज्ञा तब हुई है, जब इसको चित्त का सम्बन्ध हुआ है। जब चित् को अपने स्वभाव में स्थित करोगे, तब द्वैतकल्पना और सूक्ष्म स्थूलभाव मिट जावेंगे। इसकी सूक्ष्म संज्ञा अव्यक्त भाव से है, जो इन्द्रियों का विषय नहीं। इसमें अणुता है। यह जीव सूक्ष्म अणु में भी व्यापा हुआ है, इससे सूक्ष्म अणु कहाता है। और अनन्तता इस कारण है कि सबको धारण कर रहा है।
हे राम! यह जगत् अभावमात्र है। जैसे मरुस्थल में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जब यह जगत् ही नहीं है, तो इसका कारण किसे कहिये ? आदि-सृष्टि बिना कारण के उपजी है और फिर उसमें कारण-कार्य भासित होने लगे हैं, सो आभास की दृढ़ता से ऐसा हुआ है। जैसे बिना कारण के स्वप्न में आदि-सृष्टि बीज, वृक्ष, कुम्हार, मिट्टी और घट इकट्ठे प्रकट हो आते हैं। जब उस स्वप्न की दृढ़ता हो जाती है, तब कारण और कार्य भासित होते हैं, परन्तु जो सोया पड़ा है, उसको दृढ़ रूप से भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञानी को जगत् का कार्य-कारण दृढ़ भासित होता है और ज्ञानवान् को सब अपना रूप ही दिखता है। जैसे स्वप्न से जागने पर स्वप्न की सृष्टि अपना रूप ही दिखती है कि मैं ही था और कुछ न था, वैसे ही ज्ञानवान् को सब जगत् आकाशरूप दिखता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, पर्वत, वृक्ष, नदी आदि सब स्थावर-जङ्गम जगत् आकाशरूप है और संवेदन के फुरने से देख पड़ता है, वास्तव में भिन्न कुछ नहीं है। हे राम! यह जगत् चित्त में स्थित है। जैसे किसी पुरुष ने खम्भे में पुतलियों की कल्पना की तो उन पुतलियों के दो रूप होते हैं, एक शिल्पी के चित्त में फुरती हैं सो आकाशरूप हैं और एक खम्भे में कल्पित हैं, वे स्तम्भरूप हैं, पर शिल्पी के चित्त में नृत्य करती हैं। हे राम! और तो कुछ नहीं बना, सब स्तम्भरूप है और शिल्पी के चित्त में कल्पनामात्र है। वैसे ही चित्तरूपी शिल्पी
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की जगतरूपी पुतलियाँ कल्पनामात्र हैं। पर आत्मरूपी खम्भा ज्यों का त्यों है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसे पट के ऊपर मूर्ति लिखी हो तो उस मूर्ति का रूप पट ही है—पट से भिन्न कुछ नहीं—वह पट ही मूर्तिरूप दिखता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मा ही जगतरूप होकर भासित होता है। आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं—जैसे ब्रह्म आकाशरूप है वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है। जगत् आधार है और उसमें ब्रह्म बसनेवाला है। वैसे ही ब्रह्म आधार है और उसमें जगत् बसनेवाला है।
हे राम! जगत् में जितने विद्या और अविद्यारूप समूह हैं, वे सब संकल्प से रचित हैं और वास्तव में सब आत्मरूप हैं। समता, सत्ता और निर्विकारता आदि और इनसे विपरीत अविद्यारूप सब एक ही रूप हैं। सब एक ही में स्फुरते हैं और एक ही रूप हैं। जैसे अनुभवरूप स्वप्न-जगत् अनुभव में स्थित होता है सो सब आत्मरूप होता है, वैसे ही यह सब जगत् ब्रह्मरूप है—ब्रह्म से भिन्न न कुछ वर की कल्पना है और न शाप की कल्पना है। ब्रह्मसत्ता निर्विकार अपने आपमें स्थित है। उसमें न कारण है, न कार्य। जैसे तालाब, नदी और मेघ जल ही होते हैं, वैसे ही सब ब्रह्मरूप है। राम ने पूछा, हे भगवन्! वर और शाप के कर्त्ता तो परिच्छिन्न हैं और कारण बिना तो कार्य नहीं बनता। तब तुम कैसे कहते हो कि कारण-कार्य कोई नहीं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध आत्मसत्ता चिदाकाश का किञ्चन जगत् होता है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता में जगत् प्रकट होते हैं। और जैसे तरङ्ग जल रूप होते हैं, वैसे ही जगत् आत्मरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। जैसे आदि में परमात्मा से सृष्टि का स्फुरण हुआ है, वैसे ही स्थित है अन्यथा नहीं होता। सब जगत् संकल्प है। अनेक प्रकार की वासना संवेदन में स्फुरती है, पर जिनको स्वरूप का विस्मरण हुआ है, उनको यह जगत् सत्यरूप दिखता है। जो उनको विचार उत्पन्न हो तो वही काम है, जिस काल में विचार उत्पन्न होता है और उसी काल में अज्ञाननिद्रा का अभाव होता है। हे राम! जब विचार अभ्यास करके
- निर्वाण प्रकरण * ८६५
मन तद्रूप होता है, तब यथाभूत दर्शन होता है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपना ही रूप भासित होता है, क्योंकि वह अपने आपमें स्थित है । सबके अधिष्ठान आत्मसत्ता में अहंप्रतीति होती है, इस कारण अपने आपमें सृष्टि भासित होती है । जैसे स्पन्दन फुरते हैं, वैसे ही उनकी सिद्धि होती है । पहले निरावरण-दृष्टि होती है, निरावरण-दृष्टि से सब संकल्प सिद्ध होते हैं, क्योंकि यह सब जगत् आत्मा में संकल्प का रचा हुआ है और उसमें इसको अहंप्रत्यय हुआ है । हे राम ! जो यह संकल्प उठता है कि यह कार्य ऐसे हो तो वह वैसे ही होता है ।
हे राम ! शुद्ध संवेदन में जैसा संकल्प होता है, वही होकर भासित होता है । यह जगत् संकल्परूप ही है, संकल्प से भिन्न नहीं । इसलिए वर और शाप का और कोई कारण नहीं; वर और शाप भी संकल्परूप हैं । उस संकल्प से जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे किसी समवायकारण से तो नहीं उत्पन्न हुए, संकल्प ही से हुए हैं, इससे सब अकारण हैं । ब्रह्मरूपी समुद्र में तरङ्ग उठते हैं तो कारण और कार्य मैं तुमसे क्या कहूँ ? सब जगत् ब्रह्मरूप है । द्वैत और एक की कल्पना कुछ नहीं । हे राम ! मुझको सदा ब्रह्मसत्ता ही दिखती है, कार्य कारण कोई नहीं दिखता । जैसे स्वप्न में किसी के घर पुत्र हुआ और वह बड़े उत्साह को प्राप्त हुआ, पर जब जाग्रत् का संस्कार चित्त में आया, तब उसका पिता ही उपजा नहीं, तो पुत्र कैसे कहिये ? तब तो सब अपने आपही हो जाता है, न कोई कारण दिखता है और न कार्य दिखता है । जो स्वप्न में सोया है, उसको जैसे दिखता है, वैसे ही यह भी है । जैसे वर और शाप का आसरा संकल्प है और संकल्प ही वर और शाप होकर भासित होता है और अकारण ही होता है । जिसको शुद्ध संवेदन से एकता हुई है, वह निवरण है और उसमें जैसे फुरने का आभास फुरता है, वैसा ही सिद्ध होता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! एक ऐसे हैं, जिनको आवरण है और उनका संकल्प जैसा फुरता है-वर दें अथवा शाप दें-वैसा ही हो जाता है । स्वरूप का साक्षात्कार उनको नहीं हुआ, पर शुभ कर्म उनमें प्रत्यक्ष मिलते हैं । तो शुभ कर्म ही वर और
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शाप के कारण हुए, तुम कैसे कहते हो कि निरावरण पुरुष का संकल्प सिद्ध होता है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र सत्ता ही चित् धातु कहाती है । उस चित्धातु में जो आभास फुरता है, वही संवेदन कहलाता है । वह संवेदन जब फुरता है, तब जीव जानता है कि 'मैं ब्रह्मा हूँ'। तो संवेदन ने ही अपने को जगत् का पितामह जाना और उसी ने आगे मनोराज्य की कल्पना की । तब पञ्चभूतों का ज्ञान हुआ कि शून्यरूप आकाश है, स्पन्दनरूप वायु है, उष्णरूप अग्नि है, द्रवतारूप जल है और कठोररूप पृथ्वी है । फिर उसी से देश और काल की कल्पना हुई । स्थावर-जङ्गम पदार्थ की कल्पना से वेद शास्त्र, धर्म, अधर्म का स्फुरण हुआ, जिससे यह निश्चय हुआ कि यह तपस्वी है और इसने तप किया है, इसके कहने से वर हो । पर स्वरूप के साक्षात्कार से रहित होने पर भी उसका कहा होना उसके तप का फल है । आदि में संकल्प ऐसे हुआ है तो वर और शाप का कर्त्ता तपस्वी नहीं, उसका अधिष्ठान वही संवेदन है, जिससे आदि संकल्प उपजा है । हे राम ! वर और शाप संकल्परूप हैं, संकल्प संवेदन से फुरा है और संवेदन आत्मा का आभास है, तो मैं कारण और कार्य क्या कहूँ ? और जगत् क्या कहूँ ? आत्मा का आभास संवेदन ब्रह्मा है, जिसने आगे संकल्पपुर की सृष्टि रची है । हम तुम आदि सब उसके संकल्प में हैं । वह ब्रह्मा निराकार, निराधार और निरालम्ब स्थित है । किमी आकार को नहीं प्राप्त हुआ, इससे उसका विश्व भी वही रूप जानो ।
हे राम ! जैसे उसका स्पन्दन हुआ है, वैसे ही वह स्थित है; अन्यथा नहीं होता । जो वही विपर्यय करे तो हो अन्यथा नहीं हो सकता । अग्नि में उष्णता, वायु में स्पन्दन इत्यादि जो गुणधर्म हैं, वे अपने-अपने स्वभाव में स्थित हैं और मुझको सब ब्रह्मरूप हैं । जैसे शरीर में हाड़-मांस से भिन्न कुछ नहीं होता, वैसे ही मुझको ब्रह्म से भिन्न नहीं भासित होता । जैसे घट में मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं होता और काष्ठ की पुतली की काष्ठ से भिन्न चेष्टा नहीं होती, वैसे ही जगत्
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ब्रह्म से भिन्न नहीं होता । हे राम ! यह सब जगत् जो तुमको भासता है, ब्रह्म ही है । ब्रह्म ही फुरने से नाना प्रकार जगत् के रूप में भासित होता है । जैसे समुद्र अपनी द्रवता से तरङ्ग, बुलबुले, फेन आदि होकर भासित होता है, वैसे ही ब्रह्मसंवेदन से जगतरूप होकर दिखता है, पर ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है । जैसे पर्वत में जल गिरता है, सो कण होकर दिखता है, और जब गिरकर ठहर जाता है, तब समुद्ररूप होता है, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं होता, तैसे ही जब चित्त फुरता है, तब नाना प्रकार का जगत् भासित होता है और जब ठहर जाता है, तब सब जगत् एक अद्वैतरूप दिखता है, पर ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं होता । ब्रह्म ही स्थावर जंगमरूप दिखता है । जहाँ पुर्यष्टका का सम्बन्ध नहीं दिखता, वह अजंगम या स्थावर कहाता है, और जहाँ पुर्यष्टका का सम्बन्ध होता है, वह जंगमरूप दिखता है, परन्तु आत्मा में दोनों तुल्य हैं । जैसे एक ही हाथ की अँगुली है, जिसको उष्णता अथवा शीतलता का संयोग होता है, वह फुरने लगती है और जिसको शीत-उष्ण का संयोग नहीं होता वह नहीं फुरती, वैसे ही जिस आकार को पुर्यष्टका का संयोग है, वह फुरता है और चेतनता दिखती है, और जिसको पुर्यष्टका का संयोग नहीं होता, उसमें जड़ता भासित होती है । जड़ भी दो प्रकार के हैं—एक को पुर्यष्टका का संयोग है और जड़ है, और दूसरे को पुर्यष्टका का संयोग नहीं है और जड़ है ।
वृक्ष और पर्वतों को पुर्यष्टका का संयोग है, परन्तु घनसुषुप्ति जड़ता में स्थित हैं, इस कारण जड़ भासित होते हैं और मृत्तिका पुर्यष्टका से रहित है, इस कारण जड़ है, परन्तु वास्तव में स्थावर, जंगम; इष्ट, अनिष्ट; वर, शाप; देश, काल, पदार्थ; सभी ब्रह्मरूप हैं, और ब्रह्मसत्ता ही ऐसे स्थित हुई है, जैसे अपने अनुभव में संकल्पनगर नाना प्रकार का दिखता है, परन्तु संकल्परूप है—संकल्प से भिन्न कुछ नहीं । जैसे मृत्तिका की सेना अनेक प्रकार की होती है, परन्तु मृत्तिकारूप है—मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही सब अर्थ धारण करनेवाली चैतन्य-धातु नाना प्रकार के आकार को प्राप्त होती है, परन्तु चेतनता से भिन्न
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कुछ नहीं होती। हे राम! धातु उसको कहते हैं, जो अर्थ को धारण करे। जितने पदार्थ तुमको दिखते हैं, वे सब अर्थरूप हैं और वस्तुरूप जो धातु है, वह आत्मसत्ता है। उसने दो अर्थ धारण किये हैं-एक स्वप्न-अर्थ और दूसरा बोध-अर्थ-स्वप्न-अर्थ में तो नानात्व भासित होता है और बोध-अर्थ में एक अद्वैत सत्ता भासित होती है। जैसे एक ही धातु मिलने और बिछुड़ने से दो अर्थ रखती है, जो वे परस्पर प्रतियोगी शब्द हैं, परन्तु एक ही ने धारण किये हैं, वैसे ही स्वप्न और बोध-अर्थ, इन दोनों को आत्मसत्ता ने धारण किया है। जैसे तरंग और बुलबुले जल-रूप हैं, वैसे ही जगत् ब्रह्मरूप है। जो ज्ञानवान् हैं, उनको सब ब्रह्मरूप दिखता है और अज्ञानी को नानात्व भासित होता है। इससे तुम स्वभाव में निश्चय रखकर देखो, सब ब्रह्मरूप है-भिन्न कुछ नहीं।
इति श्रीयो० ब्रह्मप्रतिपादनंनाम द्विशताधिकैकोनसप्ततितमसर्गः ॥२६९॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो सब ब्रह्म ही है तो नीति क्या है और नाना प्रकार के पदार्थ क्यों भासित होते हैं? तुम कहते हो कि जगत् संकल्प में रचित है तो हे भगवन्! ये जो असंकरूप पदार्थ हैं, उनकी संज्ञा की नहीं जाती, तब इन पदार्थों में से एक-एक का स्वभाव अचलरूप होकर कैसे स्थित है? सब देवताओं में सूर्य का प्रकाश क्यों अधिक है और एक ही सूर्य में दिन और रात्रि छोटे बड़े क्यों होते हैं, यह विचित्रता क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध चिन्मात्रसत्ता में अकस्मात् जो आभास फुरा है, उस आभास का नाम नीति है। यह सृष्टि भी आभासमात्र है, किसी कारण से नहीं उपजी जिसके आश्रय से आभास फुरता है, वही वस्तु अधिष्ठान होती है। इससे सब जगत् ब्रह्मरूप है और चिन्मात्रसत्ता अपने आप में स्थित है। वह न उदय होती है और न अस्त होती है। वह परिणाम से रहित सदा अद्वैतरूप स्थित है, उसमें न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। तीनों अवस्था आभासमात्र हैं। पर चैतन्यसत्ता में इनसे द्वैत नहीं बना। ये तीनों इसी का स्वभाव और प्रकाशरूप हैं-इससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे आकाश और शून्यता, वायु और निस्पन्द, अग्नि और उष्णता और
❉ निर्वाण प्रकरण ❉ <span style="float:right;">८६६</span>
कपूर और सुगन्ध में भेद नहीं है, वैसे ही जाग्रत् आदि जगत् और ब्रह्म में भेद नहीं है । हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र में जो चित्तभाव हुआ है, उसमें चैतन्य आभास फुरा है, और उसमें जैसा संकल्प फुरा है, वैसे ही स्थित हुआ है कि यह इस प्रकार हो और इतने काल रहे । उसी संकल्प निश्चय का नाम नीति है ।
जैसे आदि संकल्प दृढ़ हुआ है, वैसे ही अबतक पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश अपने-अपने भाव में स्थित हैं और अपने स्वभाव को नहीं त्यागते । जबतक उनकी नीति है, तब तक वे वैसे ही जगत् सत्ता में स्थित हैं । हे राम ! इसका नाम नीति है । जैसे आदि-संकल्प रक्खा है, वैसे ही स्थित है । वह वास्तव में आभासरूप है । अकस्मात् यह आभास फुरा है, सो किसी सूक्ष्म अणु में प्रकट हुआ है । जैसे समुद्र के किसी स्थान में तरङ्ग, बुलबुले आदि उठते हैं, सम्पूर्ण समुद्र में नहीं उठते, वैसे ही जहाँ संवेदन रूप जैसा स्फुरण होता है, वैसे ही स्थित होता है । यही नीति है । जैसे तरङ्ग और बुलबुले समुद्र से भिन्न नहीं है । वैसे ही नीति आत्मा से भिन्न नहीं है । जैसे द्रवता से समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा में संवेदन से नीति और जगत् जो फुरते हैं, वे वही रूप हैं—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे किसी ने कहा कि चन्द्रमा का प्रकाश है तो चन्द्रमा और प्रकाश में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है । यह विश्व आत्मा का स्वभाव है । जैसे एक ही काल की, दिन, पक्ष, वार, मास, वर्ष, युग, कल्प इत्यादि बहुत संज्ञाएँ हैं, परन्तु काल एक ही है, वैसे ही जगत् के भिन्न-भिन्न नाम हैं, सो सब ब्रह्म ही हैं । हे राम ! जब संवेदन चित्तरूप होता है, तब प्रथम शब्द तन्मात्रा जगती है और उससे आकाश उपजता है, जिसका स्वभाव शून्यता है । फिर जब उसने स्पर्शतन्मात्रा को चेता, तब उससे इसमें वायु उपजा । वायु का स्पन्दन स्वभाव है । फिर रूप-तन्मात्रा को चेता, तब उनसे अग्नि प्रकट हुई, जिसका स्वभाव उष्ण है । फिर रसतन्मात्रा को चेता, तब उससे जल प्रकट हुआ, जिसका स्वभाव द्रव है । फिर गन्ध-तन्मात्रा को चेता, तब उससे पृथ्वी प्रकट हुई, जिसका स्वभाव
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स्थिर है। इस प्रकार पञ्चभूत उपजे। हे राम ! आदि में जो शब्द-तन्मात्रा उपजी है, वह जितने शब्दसमूह हैं, उनका बीज है। सब उसी से उत्पन्न हुए हैं, पदार्थ, वाक्य, वेद, शास्त्र, पुराण सब उसी से उपजे हैं। इसी प्रकार पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश का जो कार्य है, वही उन सबका बीज-तन्मात्रा है। उस तन्मात्रा का बीज वह संवित्सत्ता है।
हे राम ! अब इन तत्त्वों की खानि सुनो। पृथ्वी अणु भी होती है और एकदला भी होती है। पृथ्वी तो एक है और अणु भी वही है। वैसे ही सब तत्त्वों को समझ देखना। पृथ्वी की खानि भू-पीठ है, जो सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करती है। जल की खानि समुद्र है, जो सब पदार्थों में रसरूप होकर स्थित है। अग्नि का तेज जो प्रकाश है, उसकी समष्टि सूर्य है। सब स्पन्दनों की समष्टि पवन है और सम्पूर्ण शून्य पदार्थों की खानि आकाश है। इस प्रकार ये पाँचों तत्त्व संकल्प से उपजे हैं। जैसे बीज से अंकुर उपजता है, वैसे ही ये तत्त्व संकल्प से उपजे हैं। संकल्प संवेदन से उपजा है और संवेदन आत्मा का आभास है। वह अद्वैत, अच्युत, निर्विकल्प और सर्वदा अपने आपमें स्थित है। उसी के आश्रय से संवेदन आभास उपजा है। फिर संवेदन से संकल्प उपजा है और संकल्प से जगत् बन गया है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं और लीन होते हैं, वैसे ही संकल्प से जगत् उपजा है और फिर संकल्प ही में लीन होता है। जैसे तरंग जलरूप है, वैसे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश सब चैतन्यरूप हैं। सब पदार्थ जो देखे सुने जाते हैं और नहीं देखे सुने जाते, वे सब चैतन्यरूप हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। वही आत्मा इस प्रकार होता है। स्वप्न में अपना अनुभव ही पदार्थ होकर दिखता है, परन्तु कुछ बना नहीं। नाना प्रकार का दिखता है, तो भी नाना नहीं है, वैसे ही जगत् नाना प्रकार का दिखता है, तो भी कुछ बना नहीं।
जैसे एक निद्रा के दो रूप हैं-एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति-जब फुरना होता है तब स्वप्न की सृष्टि दिखती है और जब फुरना निवृत्त हो जाता है, तब सुषुप्ति होती है, और जैसे वायु के दो रूप हैं; जब स्पन्दन
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८७१
होता है, तब भासित होती है और जब निस्पन्द होती है तब नहीं भासित होती वैसे ही जब संवेदन फुरता है, तब जगत् दिखता है और जब नहीं फुरता, तब जगत् भी नहीं दिखता—इसी का नाम महाप्रलय है-पर दोनों आत्मा के आभास हैं। हे राम! संकल्परूप ब्रह्मा ने आत्मा में आकाश, पृथ्वी, नक्षत्र, चक्र इत्यादि क्रम से रचे हैं। जैसे बालक अपने में संकल्प रचे, वैसे ही ब्रह्मा ने रचा है। उसने एक भूगोल रचा है, जिस पर नक्षत्रचक्र रचा है और उस चक्र के दो भाग किये हैं, जो अन्योन्य सम्मुख स्थित हैं। जब सूर्य उसके सम्मुख होता है, तब दिन और रात्रि का प्रणाम साठ घड़ी होता है। जब सूर्य उस नक्षत्रचक्र के ऊपर की ओर उदय होता है, तब दिन बड़े होते हैं और जब नीचे की ओर उदय होता है, तब दिन छोटे हो जाते हैं। निदान ज्यों-ज्यों सूर्य क्रमशः ऊपर से नीचे की ओर उदय होता है, त्यों-त्यों दिन छोटे होते जाते हैं और रात्रि बढ़ती जाती है। और जब छः मास के उपरान्त पौष त्रयोदशी से सूर्य क्रमशः ऊपर को उदय होता है, तब दिन बढ़ता जाता है। आषाढ़ की द्वादशी से लेकर पौष की त्रयोदशी तक रात्रि बढ़ती है और दिन घटता है, और फिर रात्रि घटती जाती है और दिन बढ़ता जाता है। जब सूर्य उस चक्र के मध्य में उदय होता है, तब दिन और रात्रि समान हो जाते हैं। परन्तु संवेदनरूप ब्रह्मा का सब संकल्प विलास है। जैसे शिल्पी शिला में पुतलियों की कल्पना करता और चेष्टा करता है, पर बना कुछ नहीं, शिला ही अपने घनस्वभाव में स्थित होती है, वैसे ही चित्तरूपी शिल्पी आत्मारूपी शिला में जगतरूपी पुतलियों की कल्पना करता है, परन्तु बना कुछ नहीं। ब्रह्मसत्ता ही सदा अपने आपमें स्थित है।
संवेदन फुरने से जब उसे रूप देखने की इच्छा होती है, तब चक्षुइन्द्रिय बन जाती है, जो रूप को ग्रहण करती है। जब स्पर्श की इच्छा होती है, तब त्वचा इन्द्रिय बन जाती है, जो स्पर्श को ग्रहण करती है। जब गन्ध की इच्छा होती है, तब घ्राण इन्द्रिय बनकर गन्ध ग्रहण करती है। जब शब्द सुनने की इच्छा होती है, तब श्रवण इन्द्रिय बन जाती
८७२ ✹ योगवाशिष्ठ ✹
है, जो शब्द आदि विषयों को ग्रहण करती है। जब रस की इच्छा होती है, तब रसना इन्द्रिय प्रकट होकर स्वाद ग्रहण करती है। जब वही संवेदन चेतता है तब अपने साथ वायु को देखता है और उस वायु में प्राण फुरते देखता है। हे राम! देखना, सुनना, रस लेना, स्पर्श करना, बोलना और गन्ध लेना आदि जहाँ जहाँ इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करती गईं, वह देश है। इन्द्रियाँ जिस विषय को ग्रहण करने लगती हैं, वे पदार्थ हैं और जिस समय ग्रहण करने लगती हैं वह काल है। इस प्रकार देश, काल और पदार्थ हुए हैं। फिर क्रम से शुभ अशुभ कर्म भासित होने लगे। हे राम! इस प्रकार संवेदन ने फुरकर जगत् को रचा है और वह शरीर को रचकर इष्ट-अनिष्ट को ग्रहण करता है। जो तुम कहो कि इन्द्रियाँ तो भिन्न-भिन्न हैं और अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं, फिर सब इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट इस जीव को कैसे होते हैं, तो इसका उत्तर दृष्टान्त द्वारा सुनो।
हे राम! जैसे तुम एक हो और माला के दाने बहुत हैं, पर सबका आश्रय सूत्र है, वैसे ही अहंकाररूपी सूत्र में सब इन्द्रियरूपी दाने हैं। इस कारण अहंकाररूप जीव इन्द्रियों के सुख में सुखी और दुःख से दुःखी होता है। इन्द्रियाँ आप ही से कार्य करने को समर्थ नहीं होतीं अहंकार (जीव) की सत्ता से चेष्टा करती हैं। जैसे शङ्ख में आपसे बजने का सामर्थ्य नहीं, पर जब पुरुष बजाता है तो शब्द करता है वैसे ही इन्द्रियों की चेष्टा अहंकार और जीव से होती है। हे राम! वास्तव में न कोई इन्द्रियाँ हैं, न इनके विषय हैं और न मन का फुरना है, सब आभासमात्र है। जब संवेदन फुरता है, तब इतनी संज्ञा धारण करता है और जब संवेदन निर्वाण होता है तब सब कल्पना मिट जाती हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवसंज्ञावर्णनं नाम द्विशताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ २७० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह सम्पूर्ण कल्पना का क्रम मैंने तुमसे कहा है। जितना कुछ जगत् देखते हो, सो संवेदनरूप है। शुद्ध चिन्मात्र सत्ता के आदि आभास और चेतनता के लक्षण चित्त अहं 'अस्मि'
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८७३
का नाम संवेदन है। उसके इतने पर्याय हुए हैं—कोई उसे ब्रह्मा कहते हैं, कोई विष्णु कहते हैं, कोई प्रजापति कहते हैं और कोई शिव आदि नाम लेते हैं। उस संवेदन ने आगे संकल्प से विश्व रचा, जो अकारण है, किसी कारण से नहीं बना। काकतालीयन्याय से अकस्मात् आभास उपजा है और साकार दिखता है, परन्तु अन्तवाहक है। व्यवहार सहित दिखता है, परन्तु अव्यवहार है। हे राम! अन्तवाहकरूप संवेदन ने आगे जो विश्व रचा है, वह भी अन्तवाहकरूप है, परन्तु अज्ञानी को संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिकरूप दिखता है। जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर संकल्प से भिन्न नहीं और संकल्प की दृढ़ता से ही आकाररूप पहाड़, नदियाँ, घट, पट आदि पदार्थ प्रत्यक्ष दिखते हैं, परन्तु बने तो कुछ नहीं, शून्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् शून्यरूप निराकार है। हे राम! आदि अन्तवाहकरूप संवेदन ही बहिर्मुख फुरने से देश, काल, पदार्थ-रूप होकर स्थित हुआ है। जब बहिर्मुख फुरना मिट जाता है, तब जगत् आभास भी मिट जाता है। जैसे स्वप्न का आभास जगत् तबतक दिखता है, जबतक प्राणी निद्रा में सोया होता है, पर जब जागता है तब स्वप्न का जगत् मिट जाता है और एक अद्वैतरूप अपना आप ही भासित होता है, वैसे ही यह जगत् अज्ञान के निवृत्त होने पर लीन हो जाता है। सब जगत् निराकार है, पर संकल्प की दृढ़ता से आकार दिखते हैं।
हे राम! वेदन में जो संकल्प फुरता है, वही अन्तःकरण चतुष्टय होकर भासित होता है। पदार्थों के चिंतन से इसका नाम चित्त है, संकल्प-विकल्प के संस्मरण से इसका नाम मन है, ज्यों का त्यों निश्चय करने से इसका नाम बुद्धि है और वासना के समूह मिलने से इसे पुर्यष्टका कहते हैं। पर सब संकल्पमात्र हैं और उनसे उपजा जगत् भी संकल्परूप है। जैसे इन्द्रजाल की बाजी और स्वप्न का नगर संकल्प की दृढ़ता से पिण्डाकार भासित होते हैं, परन्तु सब आकाशरूप शून्य हैं, वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है—आत्मा से कुछ भिन्न नहीं है। जो तुम कहो कि दिखता क्यों है? तो जिसमें दिखता है, उसे वही रूप जानो।
=84 🌸 योगवाशिष्ठ 🌸
देश, काल, नदी, पहाड़, पृथ्वी, देवता, मनुष्य, दैत्य, ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त जो स्थावर-जङ्गमरूप जगत् दिखता है सो सब ब्रह्मरूप है । वेद, शास्त्र, जगत्, कर्म, स्वर्ग, तीर्थ इत्यादि जो पदार्थ हैं, वे भी सब ब्रह्मरूप हैं । वहां निराकार अद्वैत ब्रह्मसत्ता संवेदन में जगतरूप भासित होती है । जैसे स्वप्न में अपना ही अनुभव सृष्टिरूप भासित होता है, वैसे ही अपना ही अनुभव यह जगत् होकर भासित होता है । जैसे समुद्र द्रवता से तरंग होकर भासित होता है, पर जल ही जल है, वैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में संवेदन से जो जगत् आभास फुरता है, वह ब्रह्म ही ब्रह्म है, भिन्न कुछ नहीं । हे राम ! जो कुछ तुमको दिखता है, सो सब अपने आपमें स्थित अच्युत और अनन्तरूप है ।
इति नि० सर्वब्रह्मरूपप्रतिपादनंनामद्विशताधिकैकसप्ततिमसर्गः॥२७१॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब द्रष्टा दृश्यरूप को चेतता है, तब विश्व होता है । वह विश्व अन्तवाहक रूप है । निराकार संकल्प को अन्तवाहक कहते हैं । जब दृश्य में अहंभाव से चेतनता रहती है, तब अन्तवाहक से आधिभौतिक शरीर हो जाता है । आदि में जो ब्रह्मा नाम का संवेदन फुरा है, वह अन्तवाहक शरीर हुआ है । जब उसने बारम्बार अपने शरीर को देखा, तब वह भी आधिभौतिक चतुर्मुख हो गया । उसने ओंकार का उच्चारण करके वेद और वेद के क्रम को रचा । और संकल्प से विश्व को रचा । जैसे कोई बालक मन में बगीचा रचे और उसमें नाना प्रकार के वृक्ष, फल, फूल, घास और पत्ते रचे, वैसे ही ब्रह्मा ने जगत् को रचा और अन्तवाहक जीव उपजे । जब जीवों को शरीर में दृढ़ अभ्यास हुआ तब वे अन्तवाहक से आधिभौतिक हो गये । राम ने पूछा, हे भगवन् ! ब्रह्मसत्ता तो निराकार था, उसका शरीर का संयोग कैसे हुआ ? उसमें आधिभौतिकता कैसे हो गई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! न कोई शरीर है और न किसी को शरीर का संयोग हुआ है । केवल अद्वैत आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । उसमें जो चैतन्य संवेदन उपजा है, वही संवेदन दृश्य को चेतता रहता है । वही जगतरूप होकर स्थित हुआ है ।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८७५
जब संकल्प की दृढ़ता हुई, तब उसे अपने साथ शरीर और आकार दिखने लगे। परन्तु सब आकाश ही है—कुछ बने नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि को उपजी कहिये तो उपजी नहीं, और उसका कारण भी कोई नहीं, केवल आकाशरूप है, और कोई पदार्थ उपजा नहीं, परन्तु स्वरूप के विस्मरण से आकार भासित होते हैं, वैसे ही यह शरीर और जगत् जो दिखता है, वह केवल आभासमात्र है और असंभावना की दृढ़ता से प्रत्यक्ष भासित होता है। जब स्वरूप का विचार करके देखोगे तब शान्त हो जाओगे। हे राम! अविद्या भी कुछ वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न के पदार्थ अविद्यमान होते हैं और विद्यमान दिखते हैं पर जागने पर विद्यमान हो जाते हैं, वैसे ही यह जगत् अविचारसिद्ध है, विचार से शान्त हो जाता है। जब विचार करके देखोगे तब सब आत्मा ही भासित होगा। हे राम! आत्मसत्ता अव्यभिचारी है, अर्थात सत्तामात्र है, उसका अभाव कभी नहीं होता। वह अच्युत है अर्थात् सदा ज्यों की त्यों है। अपने भाव को कभी नहीं त्यागती। इसलिए जो उससे भिन्न दिखे, उसे भ्रममात्र जानो। हे राम! विचार करके जब दृश्यभ्रम शान्त होना है, तब मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मसत्ता ज्ञानरूप, निराकार और सदा अपने आपमें स्थित है। जब सम्यक् ज्ञान का बोध होता है, तब जगत् का भ्रम नष्ट हो जाता है। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर! सम्यक् ज्ञान और बोध किसको कहते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अनुभव ही बोध कहाता है, और उसका ज्यों-का-त्यों जानना सम्यक् ज्ञान है। राम ने पूछा, हे भगवन्! केवल बोध और केवल ज्ञान किसको कहते हैं।
वशिष्ठजी बोले, हे राघव! दृश्य से रहित चिन्मात्र को तुम केवल बोध जानो-उसमें वाणी की गति नहीं है। इसी प्रकार अचेत चिन्मात्र सत्ता को ज्यों का त्यों जानना ही केवल ज्ञान है। राम ने पूछा, हे भगवन्! केवल बोध अचेत चिन्मात्र है तो उसमें जगद्भ्रम क्यों भासित होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! चिन्मात्र जो द्रष्टारूप है, उसमें जब संवेदन चेतना फुरती है, तब वही चेतना चैत्यरूप दृश्य हो भासित होती है। जैसे स्पन्दन से रहित वायु अलक्ष्यरूप होती है और
८७६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
जब स्पन्दनरूप होती है, तब स्पर्श से भासित होती है, वैसे ही संवेदन में जो दृश्य दिखता है, वह वही संवेदन दृश्य होकर भासित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो द्रष्टा दृश्यरूप भासित होता है, तो दृश्य बाहर क्यों भासित होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी कारण इसे भ्रम कहा है कि यह अपने भीतर है और बाहर भासित होता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने ही भीतर होती है, पर वास्तव में न भीतर है और न बाहर, आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है, वैसे ही यह भी ज्यों का त्यों स्थित है, भीतर और बाहर भ्रम से भासित होती है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है और दृश्य भ्रम से भासित होता है तो खरगोश के सींग भी भ्रममात्र हैं, वे क्यों नहीं दिखते और अहं और त्वं क्यों दिखते हैं ? आखियों की चेष्टा तो प्रत्यक्ष दिखती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अहं त्वं आदिक जगत् भी कल्पनामात्र है। जैसे खरगोश के सींग कल्पनामात्र हैं और आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से दिखता है, वैसे ही यह जगत् भी भ्रममात्र है। जैसे मृगतृष्णा का जल और संकल्पनगर भ्रममात्र है, वैसे ही यह जगत् भ्रममात्र है, किसी कारण से नहीं उपजा। जैसे स्वप्न में खरगोश के सींग नहीं दिखते हैं और जगत् दिखता है, वैसे ही यह भ्रम है।
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! हम भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालों में जगत् की स्मृति अनुभव से जानते हैं, और कारण-कार्यभाव पाते हैं, तब आप उसको भ्रममात्र कैसे कहते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मैं यह कहता हूँ कि जो कारण में कार्य होता है, वह सत्य होता है। तुम कहो कि जगत् का कारण क्या है अर्थात् जैसे बीज में वट होता है, वैसे ही इसका कारण कौन है ? राम बोले, हे भगवन् ! जगत् सूक्ष्म अणु से उपजता है और लीन भी सूक्ष्मतत्त्व के अणु में ही होता है। वशिष्ठजी ने पूछा, हे राम ! सूक्ष्म अणु किस से कहते हैं ? राम बोले, हे मुनीश्वर ! महाप्रलय में शुद्ध चिन्मात्र सत्ता शेष रहती है और उसी में अणु रहते हैं। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! महाप्रलय किसको कहते हैं ? जहाँ सर्व शब्द और अर्थ का अभाव है, उसका नाम महाप्रलय है।
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वहाँ तो शुद्ध चिन्मात्र सत्ता रहती है, जिसमें वाणी की गति नहीं तो उसमें सूक्ष्म अणु कैसे हों और कारण-कार्यभाव कैसे हो ?
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो शुद्ध चिन्मात्रसत्ता ही रहती है तो उसमें जगत् कैसे निकल आता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! विश्व यदि उपजा हो तो मैं तुमसे कहूँ कि इस प्रकार जगत् की उत्पत्ति होती है। पर जब जगत् उपजा ही नहीं तो इसकी उत्पत्ति कैसे कहूँ ? जब चिन्मात्र में चेतना जगती है, तब अहं त्वं आदिक जगत् भासित होता है। अतः स्फुरण ही रूप है। कुछ उपजा नहीं—वही रूप है। हे राम ! ज्ञान का दृश्य-भ्रम से मिलाप ही बन्धन का कारण है। उसका अभाव मोक्ष है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान के होने पर जगत् का अभाव कैसे होता है ? यह तो दृढ़ हो रहा है, इसकी शान्ति कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सम्यक्ज्ञान से जो बोध होता है, उस बोध से दृश्य का सम्बन्ध निवृत्त होता है। वह बोध निराकार और शांति रूप है, उसी से जीव मोक्ष में प्रवृत्त होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! बोध तो केवल रूप है। सम्यक्ज्ञान किसको कहते हैं, जिससे यह जीव बन्धन से मुक्त होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस ज्ञान से ज्ञेय दृश्य का संयोग नहीं होता, उसको ज्ञानी अविनाशी रूप कहते हैं। जब ज्ञेय का अभाव होता है, तब सम्यक्ज्ञान कहाता है। जगत् ज्ञेय अविचारसिद्ध है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान से ज्ञेय भिन्न है अथवा अभिन्न, और ज्ञान क्योंकर उत्पन्न होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बोधमात्र का नाम ज्ञान है। ज्ञान और ज्ञेय उससे भिन्न नहीं है। जैसे वायु से वायु का चलना भिन्न नहीं है। राम ने पूछा कि हे भूत, भविष्यत् और वर्तमान के जाननेवाले ! जो खरगोश के सींग की नाईं ज्ञेय असत्य है तो भिन्न होकर क्यों भासित होता है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बाह्य जगत् ज्ञेय भ्रान्ति से दिखता है। उसका सद्भाव नहीं है। भीतर जगत् है, न बाहर जगत् है। यह अर्थ से रहित भासित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! अहं त्वं आदि तो प्रत्यक्ष दिखते हैं और इनका अर्थ सहित अनुभव होता है। तुम
८७८ * योगवाशिष्ठ *
कैसे इनका अभाव कहते हो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह सब जगत् विराट् पुरुष का शरीर है । जब वह आदि-विराट् ही उपजा नहीं, तो और की उत्पत्ति कैसे कहिये ? राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जगत् का सद्भाव तो तीनों कालों में पाया जाता है, पर तुम कहते हो कि उपजा ही नहीं । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे स्वप्न में जगत् के सब पदार्थ प्रत्यक्ष दीखते हैं, पर कुछ उपजे नहीं । जैसे मृगतृष्णा का जल आकाश में द्वितीय चन्द्रमा और संकल्पनगर भ्रम से दिखता है, वैसे ही अहं त्वं आदि जगत् भ्रम से दिखता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अहं त्वं आदि जगत् दृढ़ भासित होता है, तब कैसे जानिये कि उपजा नहीं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पदार्थ कारण से उपजता है, निश्चय सत्य जाना जाता है । जब महाप्रलय होता है, तब कारणकार्य कुछ नहीं रहता, सब शान्तरूप होता है, और फिर उस महाप्रलय से जगत् प्रकट होता है । इसी से जाना जाता है कि सब आभासमात्र है । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब महाप्रलय होता है, तब अज और अविनाशी सत्ता शेष रहती है । इससे जाना जाता है कि वही जगत् का कारण है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसा कारण होता है, वैसा ही उसका कार्य होता है, उससे उल्टा नहीं होता । जो आत्मसत्ता अद्वैत और आकाशरूप है तो जगत् भी वही रूप है । जैसे घट से पट नहीं उपजता, वैसे ही और कुछ नहीं उपजता ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! जब महाप्रलय होता है, तब जगत् सूक्ष्मरूप होकर स्थित होता है, और उर्मी से फिर प्रवृत्ति होती है । वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप राम ! महाप्रलय में जो तुमने सृष्टि का अनुभव किया, वह कैसी होती है ? राम बोले, हे भगवन् ! ज्ञप्तिरूप सत्ता ही वहाँ स्थित होती है और तुम जैसों ने अनुभव भी किया है कि वह चिदाकाशरूप है । सत्य और असत्य शब्द से नहीं कहा जाता । वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहो ! जो ऐसा हुआ तो भी जगत् तो ज्ञप्तिरूप हुआ--इसलिए वह जन्म-मरण से रहित शुद्ध ज्ञानरूप है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि जगत् उत्पन्न नहीं हुआ, भ्रममात्र है, तो
ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ ८७९
वह भ्रम कहाँ से आया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जगत चित्त के फुरने से भासित होता है। जैसे-जैसे चित्त फुरता है, वैसे ही वैसे यह भी भासित होता है। इसका और कोई कारण नहीं है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो यह चित्त के फुरने से दिखता है, तो यह परस्पर विरुद्ध कैसे दिखता है कि अग्नि को जल नष्ट करता है और जल को अग्नि नष्ट करती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो द्रष्टा पुरुष है, वह दृश्य-भाव को नहीं प्राप्त होता। और ऐसी कुछ वस्तु नहीं, भावरूप आत्मा ही चैतन्यघन सर्वरूप होकर भासित होता है।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! चिन्मात्रतत्त्व आदि-अन्त से रहित है। और जब वह जगत को चिन्ताता है, तब होता है, पर तो भी तो वह कुछ हुआ। जगतरूप चैत्य को असंभव कैसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसका कारण कोई नहीं, इससे चैत्य असंभव है। चैतन्य सदा मुक्त और अवाच्यपद है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो इस प्रकार है तो जगत और तत्त्व कैसे प्रकट होते हैं, और अहं त्वं आदिक द्वैत कहाँ से आये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कारण के अभाव से यह जगत कुछ आदि से उपजा नहीं, सब शान्तरूप है। और नाना जो भासित होता है, सो भ्रममात्र है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! सर्वदा प्रकाशरूप निर्मलतत्त्व निरुल्लेख और अचररूप है। उसमें भ्रान्ति कैसे है और किसको है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निश्चय करके जानो कि कारण के अभाव से भ्रान्ति कुछ वस्तु नहीं। अहं त्वं आदिक सब एक अनामय सत्ता स्थित है। राम ने पूछा, हे ब्राह्मण ! मुझे भ्रम हो रहा है, इसमें इस विषय में और अधिक प्रश्न करना नहीं जानता और अत्यन्त प्रबुद्ध भी नहीं, तो अब क्या पूछूँ ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह प्रश्न करो कि कारण बिना जगत कैसे उत्पन्न हुआ ? जब विचार करके कारण का अभाव जानोगे, तब परम स्वभाव अशब्द पद में विश्रान्ति पाओगे।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! मैं यह जानता हूँ कि कारण के अभाव से जगत कुछ उपजा नहीं, परन्तु चैत्य का फुरना भ्रम कैसे हुआ ?
८८० ✲ योगवासिष्ठ ✲
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कारण के अभाव से सर्वत्र शान्तिरूप है । तब भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं । जबतक आत्मपद में अभ्यास नहीं होता, तब तक भ्रम भासित होता है और शान्ति नहीं होती । पर जब अभ्यास करके केवल तत्त्व में विश्रान्ति पाओगे, तब भ्रम मिट जायगा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अभ्यास और अनभ्यास कैसे होता है, और एक अद्वैत में अभ्यास अनभ्यास की भ्रान्ति कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अनन्ततत्त्व में शान्ति भी कुछ वस्तु नहीं और जो आभास शान्ति दिखती है, वह महाचिद्घन अविनाशरूप है । राम ने पूछा, हे ब्राह्मण ! उपदेश और उपदेश के अधिकारी, ये जो भिन्न-भिन्न शब्द हैं, वे सर्वात्मा में कैसे भासित होते हैं । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उपदेश और उपदेश के योग्य, ये शब्द भी ब्रह्म में कल्पित हैं । शुद्ध बोध में बन्धन और मोक्ष दोनों का अभाव है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आदि में कुछ उत्पन्न नहीं हुआ तो देश, काल, क्रिया और द्रव्य के भेद कैसे दिखते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! देश, काल, क्रिया और द्रव्य के जो भेद हैं, सो संवेदन दृश्य में हैं, और अज्ञानमात्र भासित होते हैं—अज्ञानमात्र से कुछ भिन्न नहीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! बोध को दृश्य की प्राप्ति कैसे हुई ? जहाँ द्वैत और एकता का अभाव है, वहाँ दृश्य भ्रम कैसे है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बोध को दृश्य की प्राप्ति और द्वैत-एक का भ्रम मूर्खों का विषय है; हम जैसों का विषय नहीं है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अनन्ततत्त्व तो केवल बोधरूप है, तब अहं त्वं हमारे मन में कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध बोधसत्ता में जो बोध का जानना है, वह अहं त्वं द्वारा कहाता है । जैसे पवन में स्फुरण है वैसे ही उसमें चेतना जगती है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे निर्मल अचल समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले उठते हैं, सो वे कुछ जल से भिन्न नहीं होते, वैसे ही बोध में बोधसत्ता में भिन्न कुछ नहीं । वह अपने आपमें स्थित है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो यह बात है तो किसका किसको दुःख हो ? एक अनन्ततत्त्व अपने आपमें स्थित और पूर्ण है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो वह एक और निर्मल है तो अहं त्वं
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८८१
आदिक कलना कहाँ से आई और दृढ़ हुई, जिससे जीव उसे भोक्ता की नाईं भोगता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! ज्ञेय जो चित्सत्ता है उसको जानना बन्धन नहीं है, क्योंकि ज्ञान ही सब अर्थरूप होकर स्थित हुआ है। तब बन्धन और मोक्ष कैसे हो?
राम ने पूछा, हे भगवन्! इष्टि बाह्य अर्थ को देखती है—जैसे आकाश में नीलता और स्वप्न में पदार्थ असत्यरूप होकर भी सत्य प्रतीत होते हैं, वैसे ही यह बाह्य अर्थ भी असत्य ही सत्य से लगते हैं। वशिष्ठजी बोले, हे राम! कारण से रहित जो बाह्य अर्थ भासित होते हैं सो भ्रम-मात्र हैं—भिन्न कुछ नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन्! जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न के पदार्थों के दुःख-सुख होते हैं—चाहे वे सत्य हों अथवा असत्य—वैसे ही इस जगत् में सुख-दुःख होता है, परन्तु इसकी निवृत्त का उपाय कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो जगत् स्वप्न की नाईं है तो यह सब पिण्डाकार भ्रममात्र से दिखता है। सब अर्थ शान्तरूप है, नानात्व कुछ नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन्! स्वप्न और जाग्रत् में पिण्डाकार और पर-अपररूप कैसे उत्पन्न और कैसे शान्त होते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! पहले अपर का विचार कीजिये—जगत् आदि में क्या रूप था और अन्त में क्या रूप होता है। जब ऐसा विचार होगा, तब शान्ति हो जायगी। जैसे स्वप्न में स्थूल पदार्थ पिण्डरूप दिखते हैं, वे सब आकाशरूप हैं, वैसे ही जाग्रत्पदार्थ भी आकाशरूप हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब भिन्नभाव की भावना प्राप्त होती है, तब जीव जगत् को कैसे देखता है और संस्कार भ्रम कैसे शान्त होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो निर्वामनिक पुरुष है, उसके हृदय से जगत् का सद्भाव उठ जाता है जैसे संकल्प नगर और कागज की मूर्ति असत् दिखती है, वैसे ही उसको जगत् असत् भासित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब वासना से रहित पिण्डभाव शान्त होने पर जीव जगत् को स्वप्नवत् जानता है, तब उसके उपरान्त क्या अवस्था होती है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जीव जब जगत् को संकल्परूप जानता है तब वासना निर्वाण हो जाती है
८८२ ❈ योगवाशिष्ठ ❈
और पञ्चतत्त्वों का क्रम उपजना और विनष्ट होना लीन हो जाता है । तब केवल परमतत्त्व दिखता है और सब आकाशरूप हो जाता है ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! अनेक जन्मों की वासना दृढ़ हो रही है और अनेक शाखाओं से फैली है, इसलिए संसार का कारण घोर वासना ही है । वह कैसे शान्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब यथा—यथार्थज्ञान होता है, तब आत्मा में भ्रान्तिरूप स्थित हुआ जगत् शान्त होता है । जब पिण्डाकार पदार्थों का अभाव हो जाता है, तब कर्मरूप दृश्यचक्र भी शान्त हो जाता है । जैसे स्वप्न के पदार्थ जाग्रत् में नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही आत्मतत्त्व के बोध से सब वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब पिण्डग्रहण और कर्मरूप दृश्यचक्र निवृत्त हुआ, तब फिर क्या प्राप्त होता है ? वशिष्ठजी बोले हे राम ! जब पिण्डग्रहण भ्रम शान्त हो जाता है, तब जीव निर्मल होकर क्षोभ से रहित होता है, जगत् की आस्था शान्त हो जाती है और चित्त परमात्मतत्त्व को प्राप्त होता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह बालक के संकल्पवत् कैसे स्थित है ? जो संकल्परूप है तो इसके जो पदार्थ हैं, उनके नष्ट होने पर इसको दुःख क्यों प्राप्त होता है और इस जगत् की आस्था कैसे शान्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पदार्थ संकल्प से उत्पन्न हुआ है, उसके नष्ट करने में दुःख नहीं होता । और जो पूर्वापर विचार करके इसे चित्त से रचा जानिये तो भ्रम शान्त हो जाता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! चित्त कैसा है और उससे संसार को कैसे रचा जानिये ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! चित्तसत्ता जो चैत्योन्मुख जगती है उसी को संकल्परूप चित्त कहते हैं । उससे रहित सत् के विचारने से वासना शान्त हो जाती है । राम बोले, हे ब्रह्मन् ! चैत्य से रहित चित्त कैसे होता है और चित्त से उदय हुआ जगत् निर्वाण कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! चित्त कुछ उत्पन्न नहीं हुआ, अनहोता ही द्वैत भासित होता है—कुछ है नहीं । रामजी बोले, हे भगवन् ! जगत् तो प्रत्यक्ष दिखता है । जो उपजा ही नहीं तो इसका अनुभव कैसे होता है ? वशिष्ठजी