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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1680, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1680

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right">८७७</span>

वहाँ तो शुद्ध चिन्मात्र सत्ता रहती है, जिसमें वाणी की गति नहीं तो उसमें सूक्ष्म अणु कैसे हों और कारण-कार्यभाव कैसे हो ?

राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो शुद्ध चिन्मात्रसत्ता ही रहती है तो उसमें जगत् कैसे निकल आता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! विश्व यदि उपजा हो तो मैं तुमसे कहूँ कि इस प्रकार जगत् की उत्पत्ति होती है। पर जब जगत् उपजा ही नहीं तो इसकी उत्पत्ति कैसे कहूँ ? जब चिन्मात्र में चेतना जगती है, तब अहं त्वं आदिक जगत् भासित होता है। अतः स्फुरण ही रूप है। कुछ उपजा नहीं—वही रूप है। हे राम ! ज्ञान का दृश्य-भ्रम से मिलाप ही बन्धन का कारण है। उसका अभाव मोक्ष है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान के होने पर जगत् का अभाव कैसे होता है ? यह तो दृढ़ हो रहा है, इसकी शान्ति कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सम्यक्ज्ञान से जो बोध होता है, उस बोध से दृश्य का सम्बन्ध निवृत्त होता है। वह बोध निराकार और शांति रूप है, उसी से जीव मोक्ष में प्रवृत्त होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! बोध तो केवल रूप है। सम्यक्ज्ञान किसको कहते हैं, जिससे यह जीव बन्धन से मुक्त होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस ज्ञान से ज्ञेय दृश्य का संयोग नहीं होता, उसको ज्ञानी अविनाशी रूप कहते हैं। जब ज्ञेय का अभाव होता है, तब सम्यक्ज्ञान कहाता है। जगत् ज्ञेय अविचारसिद्ध है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान से ज्ञेय भिन्न है अथवा अभिन्न, और ज्ञान क्योंकर उत्पन्न होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बोधमात्र का नाम ज्ञान है। ज्ञान और ज्ञेय उससे भिन्न नहीं है। जैसे वायु से वायु का चलना भिन्न नहीं है। राम ने पूछा कि हे भूत, भविष्यत् और वर्तमान के जाननेवाले ! जो खरगोश के सींग की नाईं ज्ञेय असत्य है तो भिन्न होकर क्यों भासित होता है ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बाह्य जगत् ज्ञेय भ्रान्ति से दिखता है। उसका सद्भाव नहीं है। भीतर जगत् है, न बाहर जगत् है। यह अर्थ से रहित भासित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! अहं त्वं आदि तो प्रत्यक्ष दिखते हैं और इनका अर्थ सहित अनुभव होता है। तुम

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