योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1681, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८७८ * योगवाशिष्ठ *
कैसे इनका अभाव कहते हो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह सब जगत् विराट् पुरुष का शरीर है । जब वह आदि-विराट् ही उपजा नहीं, तो और की उत्पत्ति कैसे कहिये ? राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जगत् का सद्भाव तो तीनों कालों में पाया जाता है, पर तुम कहते हो कि उपजा ही नहीं । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे स्वप्न में जगत् के सब पदार्थ प्रत्यक्ष दीखते हैं, पर कुछ उपजे नहीं । जैसे मृगतृष्णा का जल आकाश में द्वितीय चन्द्रमा और संकल्पनगर भ्रम से दिखता है, वैसे ही अहं त्वं आदि जगत् भ्रम से दिखता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अहं त्वं आदि जगत् दृढ़ भासित होता है, तब कैसे जानिये कि उपजा नहीं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पदार्थ कारण से उपजता है, निश्चय सत्य जाना जाता है । जब महाप्रलय होता है, तब कारणकार्य कुछ नहीं रहता, सब शान्तरूप होता है, और फिर उस महाप्रलय से जगत् प्रकट होता है । इसी से जाना जाता है कि सब आभासमात्र है । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब महाप्रलय होता है, तब अज और अविनाशी सत्ता शेष रहती है । इससे जाना जाता है कि वही जगत् का कारण है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसा कारण होता है, वैसा ही उसका कार्य होता है, उससे उल्टा नहीं होता । जो आत्मसत्ता अद्वैत और आकाशरूप है तो जगत् भी वही रूप है । जैसे घट से पट नहीं उपजता, वैसे ही और कुछ नहीं उपजता ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! जब महाप्रलय होता है, तब जगत् सूक्ष्मरूप होकर स्थित होता है, और उर्मी से फिर प्रवृत्ति होती है । वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप राम ! महाप्रलय में जो तुमने सृष्टि का अनुभव किया, वह कैसी होती है ? राम बोले, हे भगवन् ! ज्ञप्तिरूप सत्ता ही वहाँ स्थित होती है और तुम जैसों ने अनुभव भी किया है कि वह चिदाकाशरूप है । सत्य और असत्य शब्द से नहीं कहा जाता । वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहो ! जो ऐसा हुआ तो भी जगत् तो ज्ञप्तिरूप हुआ--इसलिए वह जन्म-मरण से रहित शुद्ध ज्ञानरूप है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि जगत् उत्पन्न नहीं हुआ, भ्रममात्र है, तो