योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1682, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ निर्वाण प्रकरण ॐ ८७९
वह भ्रम कहाँ से आया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जगत चित्त के फुरने से भासित होता है। जैसे-जैसे चित्त फुरता है, वैसे ही वैसे यह भी भासित होता है। इसका और कोई कारण नहीं है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो यह चित्त के फुरने से दिखता है, तो यह परस्पर विरुद्ध कैसे दिखता है कि अग्नि को जल नष्ट करता है और जल को अग्नि नष्ट करती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो द्रष्टा पुरुष है, वह दृश्य-भाव को नहीं प्राप्त होता। और ऐसी कुछ वस्तु नहीं, भावरूप आत्मा ही चैतन्यघन सर्वरूप होकर भासित होता है।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! चिन्मात्रतत्त्व आदि-अन्त से रहित है। और जब वह जगत को चिन्ताता है, तब होता है, पर तो भी तो वह कुछ हुआ। जगतरूप चैत्य को असंभव कैसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसका कारण कोई नहीं, इससे चैत्य असंभव है। चैतन्य सदा मुक्त और अवाच्यपद है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो इस प्रकार है तो जगत और तत्त्व कैसे प्रकट होते हैं, और अहं त्वं आदिक द्वैत कहाँ से आये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कारण के अभाव से यह जगत कुछ आदि से उपजा नहीं, सब शान्तरूप है। और नाना जो भासित होता है, सो भ्रममात्र है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! सर्वदा प्रकाशरूप निर्मलतत्त्व निरुल्लेख और अचररूप है। उसमें भ्रान्ति कैसे है और किसको है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निश्चय करके जानो कि कारण के अभाव से भ्रान्ति कुछ वस्तु नहीं। अहं त्वं आदिक सब एक अनामय सत्ता स्थित है। राम ने पूछा, हे ब्राह्मण ! मुझे भ्रम हो रहा है, इसमें इस विषय में और अधिक प्रश्न करना नहीं जानता और अत्यन्त प्रबुद्ध भी नहीं, तो अब क्या पूछूँ ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह प्रश्न करो कि कारण बिना जगत कैसे उत्पन्न हुआ ? जब विचार करके कारण का अभाव जानोगे, तब परम स्वभाव अशब्द पद में विश्रान्ति पाओगे।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! मैं यह जानता हूँ कि कारण के अभाव से जगत कुछ उपजा नहीं, परन्तु चैत्य का फुरना भ्रम कैसे हुआ ?