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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1683, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1683

८८० ✲ योगवासिष्ठ ✲

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कारण के अभाव से सर्वत्र शान्तिरूप है । तब भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं । जबतक आत्मपद में अभ्यास नहीं होता, तब तक भ्रम भासित होता है और शान्ति नहीं होती । पर जब अभ्यास करके केवल तत्त्व में विश्रान्ति पाओगे, तब भ्रम मिट जायगा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अभ्यास और अनभ्यास कैसे होता है, और एक अद्वैत में अभ्यास अनभ्यास की भ्रान्ति कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अनन्ततत्त्व में शान्ति भी कुछ वस्तु नहीं और जो आभास शान्ति दिखती है, वह महाचिद्घन अविनाशरूप है । राम ने पूछा, हे ब्राह्मण ! उपदेश और उपदेश के अधिकारी, ये जो भिन्न-भिन्न शब्द हैं, वे सर्वात्मा में कैसे भासित होते हैं । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उपदेश और उपदेश के योग्य, ये शब्द भी ब्रह्म में कल्पित हैं । शुद्ध बोध में बन्धन और मोक्ष दोनों का अभाव है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आदि में कुछ उत्पन्न नहीं हुआ तो देश, काल, क्रिया और द्रव्य के भेद कैसे दिखते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! देश, काल, क्रिया और द्रव्य के जो भेद हैं, सो संवेदन दृश्य में हैं, और अज्ञानमात्र भासित होते हैं—अज्ञानमात्र से कुछ भिन्न नहीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! बोध को दृश्य की प्राप्ति कैसे हुई ? जहाँ द्वैत और एकता का अभाव है, वहाँ दृश्य भ्रम कैसे है ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बोध को दृश्य की प्राप्ति और द्वैत-एक का भ्रम मूर्खों का विषय है; हम जैसों का विषय नहीं है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अनन्ततत्त्व तो केवल बोधरूप है, तब अहं त्वं हमारे मन में कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध बोधसत्ता में जो बोध का जानना है, वह अहं त्वं द्वारा कहाता है । जैसे पवन में स्फुरण है वैसे ही उसमें चेतना जगती है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे निर्मल अचल समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले उठते हैं, सो वे कुछ जल से भिन्न नहीं होते, वैसे ही बोध में बोधसत्ता में भिन्न कुछ नहीं । वह अपने आपमें स्थित है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो यह बात है तो किसका किसको दुःख हो ? एक अनन्ततत्त्व अपने आपमें स्थित और पूर्ण है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो वह एक और निर्मल है तो अहं त्वं

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