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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1684, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1684

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८८१

आदिक कलना कहाँ से आई और दृढ़ हुई, जिससे जीव उसे भोक्ता की नाईं भोगता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! ज्ञेय जो चित्सत्ता है उसको जानना बन्धन नहीं है, क्योंकि ज्ञान ही सब अर्थरूप होकर स्थित हुआ है। तब बन्धन और मोक्ष कैसे हो?

राम ने पूछा, हे भगवन्! इष्टि बाह्य अर्थ को देखती है—जैसे आकाश में नीलता और स्वप्न में पदार्थ असत्यरूप होकर भी सत्य प्रतीत होते हैं, वैसे ही यह बाह्य अर्थ भी असत्य ही सत्य से लगते हैं। वशिष्ठजी बोले, हे राम! कारण से रहित जो बाह्य अर्थ भासित होते हैं सो भ्रम-मात्र हैं—भिन्न कुछ नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन्! जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न के पदार्थों के दुःख-सुख होते हैं—चाहे वे सत्य हों अथवा असत्य—वैसे ही इस जगत् में सुख-दुःख होता है, परन्तु इसकी निवृत्त का उपाय कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो जगत् स्वप्न की नाईं है तो यह सब पिण्डाकार भ्रममात्र से दिखता है। सब अर्थ शान्तरूप है, नानात्व कुछ नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन्! स्वप्न और जाग्रत् में पिण्डाकार और पर-अपररूप कैसे उत्पन्न और कैसे शान्त होते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! पहले अपर का विचार कीजिये—जगत् आदि में क्या रूप था और अन्त में क्या रूप होता है। जब ऐसा विचार होगा, तब शान्ति हो जायगी। जैसे स्वप्न में स्थूल पदार्थ पिण्डरूप दिखते हैं, वे सब आकाशरूप हैं, वैसे ही जाग्रत्पदार्थ भी आकाशरूप हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब भिन्नभाव की भावना प्राप्त होती है, तब जीव जगत् को कैसे देखता है और संस्कार भ्रम कैसे शान्त होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो निर्वामनिक पुरुष है, उसके हृदय से जगत् का सद्भाव उठ जाता है जैसे संकल्प नगर और कागज की मूर्ति असत् दिखती है, वैसे ही उसको जगत् असत् भासित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब वासना से रहित पिण्डभाव शान्त होने पर जीव जगत् को स्वप्नवत् जानता है, तब उसके उपरान्त क्या अवस्था होती है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जीव जब जगत् को संकल्परूप जानता है तब वासना निर्वाण हो जाती है