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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1685, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1685

८८२ ❈ योगवाशिष्ठ ❈

और पञ्चतत्त्वों का क्रम उपजना और विनष्ट होना लीन हो जाता है । तब केवल परमतत्त्व दिखता है और सब आकाशरूप हो जाता है ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! अनेक जन्मों की वासना दृढ़ हो रही है और अनेक शाखाओं से फैली है, इसलिए संसार का कारण घोर वासना ही है । वह कैसे शान्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब यथा—यथार्थज्ञान होता है, तब आत्मा में भ्रान्तिरूप स्थित हुआ जगत् शान्त होता है । जब पिण्डाकार पदार्थों का अभाव हो जाता है, तब कर्मरूप दृश्यचक्र भी शान्त हो जाता है । जैसे स्वप्न के पदार्थ जाग्रत् में नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही आत्मतत्त्व के बोध से सब वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब पिण्डग्रहण और कर्मरूप दृश्यचक्र निवृत्त हुआ, तब फिर क्या प्राप्त होता है ? वशिष्ठजी बोले हे राम ! जब पिण्डग्रहण भ्रम शान्त हो जाता है, तब जीव निर्मल होकर क्षोभ से रहित होता है, जगत् की आस्था शान्त हो जाती है और चित्त परमात्मतत्त्व को प्राप्त होता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह बालक के संकल्पवत् कैसे स्थित है ? जो संकल्परूप है तो इसके जो पदार्थ हैं, उनके नष्ट होने पर इसको दुःख क्यों प्राप्त होता है और इस जगत् की आस्था कैसे शान्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पदार्थ संकल्प से उत्पन्न हुआ है, उसके नष्ट करने में दुःख नहीं होता । और जो पूर्वापर विचार करके इसे चित्त से रचा जानिये तो भ्रम शान्त हो जाता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! चित्त कैसा है और उससे संसार को कैसे रचा जानिये ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! चित्तसत्ता जो चैत्योन्मुख जगती है उसी को संकल्परूप चित्त कहते हैं । उससे रहित सत् के विचारने से वासना शान्त हो जाती है । राम बोले, हे ब्रह्मन् ! चैत्य से रहित चित्त कैसे होता है और चित्त से उदय हुआ जगत् निर्वाण कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! चित्त कुछ उत्पन्न नहीं हुआ, अनहोता ही द्वैत भासित होता है—कुछ है नहीं । रामजी बोले, हे भगवन् ! जगत् तो प्रत्यक्ष दिखता है । जो उपजा ही नहीं तो इसका अनुभव कैसे होता है ? वशिष्ठजी