योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1686, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✹ निर्वाण प्रकरण ✹
बोले, हे राम ! अज्ञानी को जो जगत् दिखता है, वह सत्य नहीं है और ज्ञानवान् को जो दिखता है, वह अनिर्वचनीयसत्ता अद्वैतरूप है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! अज्ञानी को तीनों जगत् कैसे दिखते हैं और ज्ञानवान् को कैसे दिखते हैं, जो कहे नहीं जा सकते ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानी को द्वैत सघन दृढ़ भासित होता है, और ज्ञानवान् को सघन द्वैत नहीं भासित होता, क्योंकि आदि में तो उपजा नहीं, अद्वैत आत्मतत्त्व अवाच्यपद है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आदि में उपजा नहीं तो अनुभव भी न हो, पर यह तो प्रत्यक्ष अनुभव होता है, इसे असत्य कैसे कहिये ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! असत्य ही सत्य की नाईं होकर भासित होता है-इसी से कारण-रहित भासित होता है । जैसे स्वप्न में पदार्थ का अनुभव होता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, वैसे ही यह असत्य ही अनुभव होता है। रामजी बोले, हे भगवन् ! स्वप्न में संकल्प से जो दृश्य का अनुभव होता है, वह जाग्रत् के संस्कारों से होता है, और कुछ नहीं है। वशिष्ठजी ने पूछा, हे राम ! स्वप्न और संकल्प संस्कार से होता है, सो वह जाग्रत् के संस्कार से कैसे होता है ? वही रूप है अथवा जाग्रत् से अन्य है ? राम बोले, हे भगवन् ! स्वप्न के पदार्थ और मनोराज्य जाग्रत् के संस्काररूप भ्रम से जाग्रत् की नाईं भासित होते हैं। वशिष्ठजी ने कहा, हे राम ! जो स्वप्न में जाग्रत् संस्कार से जगत् जाग्रत् की नाईं भासित होता है, जैसे स्वप्न में किसी का घर लुट गया अथवा जल के प्रवाह में बह गया-तो जाग्रत् में तो कुछ हुआ नहीं, क्योंकि प्रातःकाल उठकर देखता है, तब ज्यों का त्यों दिखता है-ऐसे ही संसार भी कुछ न हुआ। सब कल्पनामात्र जानना। राम बोले, हे भगवन् ! अब मैंने जाना कि यह सब ब्रह्म ही है, न कोई देह है, न जगत् है, न उदय है और न अस्त है। सर्वदा सब प्रकार वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। उससे भिन्न जो कुछ भासित होता है, सो भ्रममात्र है। और भ्रम भी कुछ वस्तु नहीं, सब चिदाकाश ब्रह्मरूप है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ दिखता है, सब ब्रह्म ही का प्रकाश है। वही अपने