योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1687, कुल 1734 में से
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आपमें प्रकाशित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! सर्ग के आदि में देह-चित्त आदिक कैसे फुर आये हैं और आत्मा का प्रकाशरूप जगत् कैसे हैं ? प्रकाश भी उसका होता है, जो साकार होता है, परब्रह्म तो निराकार है, उसका प्रकाश कैसे कहिये ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब ब्रह्मरूप है। प्रकाश और प्रकाशक का भेद भी कुछ नहीं, और दूसरी वस्तु भी कुछ नहीं, वही अपने आपमें स्थित है-इसी से उसको स्वप्रकाश कहा है। सूर्य आदि का प्रकाश त्रिपुटी से भासित होता है सो वह भी उसके आश्रित होकर प्रकाश पाता है, और उसके प्रकाश का आधारभूत कहाता है, जिसके आश्रय से सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है। आत्मसत्ता अद्वैत और विज्ञानघन है। उसमें जो चित्तसंवेदन जगा है, वही जगतरूप होकर स्थित हुआ है। आत्मसत्ता और जगत् में कुछ भेद नहीं है। जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं है, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है-वही इस प्रकार हुए की नाईं स्थित हुआ है। हे राम ! निराकार ही स्वप्नवत् साकाररूप होकर भासित होता है। इस जगत् के आदि में अद्वैत चिन्मात्रसत्ता थी। उर्मी में जो नाना प्रकार का जगत् देख पड़ा, वह वही रूप हुआ। और कारण तो कोई नहीं है। जैसे स्वप्न के आदि में अद्वैतसत्ता निराकार है, और उससे जो सूर्यादिक पदार्थ प्रकट होते हैं, वे भी वही रूप हुए, पर प्रकट दिखते भी हैं, वैसे ही इस जगत् को भी अकारण और निराकार जानो। हे राम ! न कोई जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है, सब आभासमात्र है-वही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। मुझको तो वही सदा विज्ञानघन आत्मसत्ता भासित होती है। जैसे दर्पण में अपना मुख दिखता है, वैसे ही मुझको अपना रूप भासित होता है, पर अज्ञानी को भ्रान्तिरूप जगत् दिखता है। जैसे वृक्ष के ठूठ में दूर से भ्रान्ति वश पुरुष दिखता है, वैसे ही अज्ञानी को जगत् दिखता है।
हे राम ! न कोई द्रष्टा है और न कोई दृश्य है। द्रष्टा तो तब कहिये जो दृश्य हो, और दृश्य तब कहिये जो द्रष्टा हो। जो दृश्य नहीं तो